आज हम जितना ज्यादा डिजीटल तकनीक की तरफ आगे बढ़ रहे हैं खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं। चौंकाने वाली बात सामने आई है कि 5000 ऑनलाइन दोस्त होने के बाद भी कोई कैसे इतना अकेला महसूस कर सकता है...आज हम इसी सवाल का जवाब जानने की कोशिश करेंगे। आज के युवा पीढ़ी की जिंदगी से समझने की कोशिश करेंगे कि इस डिजिटल दुनिया में अच्छी तकनीक, एक्स्ट्रा एडवांस सिस्टम और अच्छे खासे ऑनलाइन दोस्त होने के बावजूद वो खुद को अकेला क्यों महसूस कर रहा है। सच में अगर ऐसा है तो ये आने वाले समय की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। आने वाले समय में ये युवा पीढ़ी की मानसिक स्थिति पर नकारात्मक असर डाल सकती है। यहीं वजह है कि आज इस मुद्दे पर खुलकर बात करने की जरूरत है। इस आर्टिकल में हम जानने की कोशिश करेंगे कि इसकी वजह क्या है, ये परिवर्तन कैसे हुआ, इसका मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा आदि।
डिजिटल युग से इसानों का ज्यादा जुड़ाव
आज के युग में डिजिटलाइजेशन की जरूरत बढ़ गई है। ऑफिस ग्रुप पर काम हो या सोशल मीडिया पर फेमस होने की हौड़...हर कोई इस डिजिटल दुनिया में अपनी खास पहचान बनाना चाहता है। इंस्टाग्राम में यदि किसी के 5 हजार फॉलोअर हैं तो लोग समझते हैं कि उसने लंबी बाजी मार ली। उसे कोलैब के ऑफर मिल रहे हैं...अतिरिक्त आय के स्रोत भी बन गए हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। लेकिन जब बात अकेलेपन की आती है तो ये 5000 ऑनलाइन दोस्त क्या ही कर लेंगे। लेकिन आश्चर्य की बात तो ये है कि लोग इन दोस्तों से इतना जुड़ाव महसूस करने लगे हैं कि इनकी छोटी-मोटी बातें दिल तक ठेस पहुंचा जाती हैं। कई तो ऑनलाइन रिलेशनशीप में फंस जाते हैं...कोई हनीट्रैप का शिकार होता है तो कोई ट्रेड के नाम पर ठग लिया जाता है। डिजिटल होना अच्छी बात है लेकिन फोन की दुनिया में खुद की एक अलग दुनिया बना लेना ये हानिकारक है।
मोबाइल स्क्रीन पर 5000 दोस्त, सैकड़ों ग्रुप, अनगिनत नोटिफिकेशन बस एक चमचमाती दुनिया मात्र है। लेकिन आज लोग पहले से कई ज्यादा अकेले हो चुके हैं। रात के सन्नाटे में इंसान को यही दुख सताता रहता है कि मेरे रील पर लाइक्स और फॉलोअर क्यों नहीं बढ़ रहे हैं। आज के समय में ये कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं बल्कि उस पीढ़ी की है जो ये मानती है कि डिजिटल दुनिया के बिना जीवन अधूरा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं GEN Z की।
GEN Z उन्हें कहते हैं जिनका जन्म 1998 से 2013 के बीच में हुआ है। इन्होंने इंटरनेट को करीब से देखा। ऐसे में इनका कहना है कि इंटरनेट और मोबाइल के बिना जीवन अधूरा है। आज के युग में फोन और इंटरनेट के बिना न ऑफिस का काम हो सकता है न ही डिजिटल पेमेंट। हर चीज के लिए लोगों की इन डिवाइस पर आत्मनिर्भरता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
डिजिटल दोस्ती और फिर हनीट्रैप
कई लोग सोशल मीडिया पर आपस में इतने करीब हो जाते हैं कि बिना सोचे-समझे एक-दूसरे से फोन नंबर शेयर कर लेते हैं। फिर देर रात फोन कॉल्स पर बातें करते हैं। इतना ही नहीं उनके साथ शादी करने तक की सोचने लग जाते हैं। लेकिन जब धोखा मिलता है तो सदमे में चले जाते हैं। उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। ध्यान रहे, किसी भी ऐसे इंसान पर इतना भरोसा करने से बचे जिनसे आप कभी मिले भी नहीं है और उनके साथ आपने जिंदगी एक साथ गुजारने के बड़े-बड़े सपने तक देख रहे हैं। भावनात्मक रूप से बहकर कोई भी फैसला न लें। कई बार लोग इन सब में फंस जाते है। एक-दूसरे को पैसे भी ट्रांसफर कर देते हैं। आजकल हनीट्रैप के कई मामले सामने आ रहे हैं। ये इस कारण हो रहा है क्योंकि हम डिजिटल दोस्तों को अपना समझ बैठते हैं। ऐसे में जब हमारे साथ धोखा होता है तो हम खुद को संभाल नहीं पाते।
डिजिटल दुनिया में दोस्ती की क्या है परिभाषा

Image Credit: canva
सोशल मीडिया पर दोस्ती की परिभाषा बिल्कुल अलग है। इस बात को जितना जल्दी हो जाए यदि आप समझ जाएं तो बेहतर है। फेसबुक, इंस्टाग्राम पर हजारों फॉलोअर्स होना अब सामाजिक सफलता का पैमाना बन गया है। लेकिन आज का सवाल ये है कि क्या ये दोस्ती असल में मौजूद भी है ? सच तो ये है कि ये ऑनलाइन दोस्ती एल्गोरिदम आधारित होती है। आप किसे देखते हैं, किससे बात करते हैं, किसे भूल जाते हैं- ये सब प्लेफॉर्म तय करता है। ऑनलाइन रिश्ते ट्रेंड और रीच के हिसाब से बनते-टूटते हैं।
न चाहते हुए भी ऑनलाइन आने की समस्या
ऐसे कई लोग हैं जो ऑनलाइन कम आना चाहते हैं लेकिन सोशल मीडिया का लत लग जाने के बाद आप न चाहते हुए भी ऑनलाइन आने पर मजबूर हो ही जाते हैं। ये आदत आपके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। आज का इंसान केवल जी रहा है, वो खुद को सोशल मीडिया पर अच्छा प्रेजेंट करवाना चाहता है, सोशल मीडिया पर खुश दिखना चाहता है और खुद को सफल व्यक्ति बताना चाहता है...जबकि असल जिंदगी में बेहद ऐसा न हो। ऐसे में आपके लिए ये जरूरी है कि सोशल मीडिया वाली दुनिया को अपनी वास्तविक दुनिया से अलग ही रखें।
डिजिटलाइजेशन और अकेलापन
अकेलापन अब सिर्फ बुज़ुर्गों या छोटे शहरों की समस्या नहीं रही। अच्छी नौकरी करने वाला व्यक्ति, सोशल मीडिया पर एक्टिव युवा भी भीतर से खुद को अकेला महसूस कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया पर उसका अकेलापन दिखता नहीं, क्योंकि वे फिल्टरों के पीछे छिप जाता है।









