ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में गिना जाता है। यहां हर साल निकलने वाली रथ यात्रा लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती है। लेकिन इस मंदिर की एक ऐसी परंपरा भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इस परंपरा का नाम है नवकलेवर।
जब भी नवकलेवर होता है, तब भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की नई काष्ठ (लकड़ी) की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। ऐसे में लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर पुरानी प्रतिमाओं का क्या किया जाता है? क्या उन्हें किसी संग्रहालय में रखा जाता है, नदी में विसर्जित किया जाता है या फिर किसी और जगह ले जाया जाता है? इसका जवाब मंदिर की सदियों पुरानी परंपरा में छिपा हुआ है।
क्या है नवकलेवर?
'नवकलेवर' दो शब्दों से मिलकर बना है, 'नव' यानी नया और 'कलेवर' यानी शरीर। इसका मतलब हुआ नया शरीर धारण करना। हिंदू मान्यता के अनुसार जिस तरह इंसान आत्मा को छोड़कर नया शरीर धारण करता है, उसी तरह भगवान जगन्नाथ भी एक निश्चित समय के बाद नया कलेवर धारण करते हैं। यही कारण है कि इस अनुष्ठान को बेहद पवित्र और रहस्यमयी माना जाता है।यह आयोजन हर साल नहीं होता। आमतौर पर यह 12 से 19 साल के बीच तब होता है, जब आषाढ़ महीने में अधिकमास (मलमास) पड़ता है। इसी विशेष योग में नई प्रतिमाएं बनाई जाती हैं।
नई प्रतिमाएं कैसे बनती हैं?
नवकलेवर की प्रक्रिया कई हफ्तों तक चलती है। मंदिर के सेवायत और दैतापति समाज के लोग विशेष पूजा-पाठ के बाद पवित्र नीम के पेड़ों की खोज करते हैं। इन पेड़ों को साधारण पेड़ नहीं माना जाता, बल्कि इनके चयन के लिए कई धार्मिक और पारंपरिक नियम होते हैं।
पेड़ मिलने के बाद उसी लकड़ी से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की नई प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय माहौल में होती है और इसमें केवल कुछ चुनिंदा सेवायतों को ही शामिल होने की अनुमति होती है।
सबसे रहस्यमयी होता है ‘ब्रह्म परिवर्तन’
नवकलेवर का सबसे अहम और रहस्यमयी हिस्सा 'ब्रह्म परिवर्तन' माना जाता है। मान्यता है कि भगवान की पुरानी प्रतिमाओं में जो दिव्य तत्व या 'ब्रह्म पदार्थ' मौजूद होता है, उसे आधी रात के समय बेहद गोपनीय तरीके से नई प्रतिमाओं में स्थापित किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं।
कहा जाता है कि इस अनुष्ठान को करने वाले दैतापति सेवायतों की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है और उनके हाथों में भी कपड़ा लपेटा जाता है, ताकि वे उस दिव्य तत्व को सीधे देख या छू न सकें। इस पूरे अनुष्ठान को मंदिर की सबसे बड़ी धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है।
फिर पुरानी प्रतिमाओं का क्या होता है?
ब्रह्म परिवर्तन पूरा होने के बाद पुरानी प्रतिमाओं को कभी भी फेंका या विसर्जित नहीं किया जाता। उन्हें मंदिर परिसर के भीतर स्थित कोइली बैकुंठ नाम की पवित्र जगह पर पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ दफनाया जाता है। इसे भगवान जगन्नाथ का दिव्य विश्राम स्थल माना जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के अंतिम संस्कार के बाद पूरे सम्मान के साथ उसकी अंत्येष्टि की जाती है, उसी तरह भगवान की पुरानी प्रतिमाओं को भी पूरे सम्मान और वैदिक परंपराओं के अनुसार समाधि दी जाती है।
कोइली बैकुंठ क्यों है खास?
कोइली बैकुंठ मंदिर परिसर का बेहद पवित्र हिस्सा माना जाता है। आम श्रद्धालुओं की यहां सीधी पहुंच नहीं होती। इसी स्थान पर हर नवकलेवर के बाद पुरानी प्रतिमाओं को दफनाया जाता है। कई सदियों से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। इसलिए इस जगह को भगवान जगन्नाथ के पुराने स्वरूपों का विश्राम स्थल भी कहा जाता है।
क्या पुरानी प्रतिमाएं दोबारा दिखाई जाती हैं?
नहीं। एक बार जब पुरानी प्रतिमाओं का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है, तो उन्हें दोबारा सार्वजनिक रूप से नहीं निकाला जाता। उनकी जगह नई प्रतिमाएं मंदिर के गर्भगृह में स्थापित हो जाती हैं और फिर श्रद्धालु उन्हीं के दर्शन करते हैं। यही कारण है कि नवकलेवर को भगवान के नए जीवन की शुरुआत माना जाता है।
इस परंपरा का धार्मिक संदेश
नवकलेवर सिर्फ प्रतिमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है। हिंदू दर्शन के अनुसार आत्मा अमर होती है, लेकिन शरीर नश्वर होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी कहा गया है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी तरह आत्मा भी पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर ग्रहण करती है। भगवान जगन्नाथ का नवकलेवर इसी दर्शन का प्रतीक माना जाता है। इससे यह संदेश मिलता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और आत्मा हमेशा शाश्वत रहती है।
नवकलेवर के समय उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
जिस वर्ष नवकलेवर होता है, उस समय पुरी में लाखों नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। देश-विदेश से भक्त भगवान के नए स्वरूप के दर्शन करने आते हैं। मंदिर में विशेष पूजा, धार्मिक अनुष्ठान और कई पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान पुरी शहर का माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।
क्यों माना जाता है इतना दुर्लभ?
नवकलेवर हर साल नहीं होता। यह केवल उस विशेष ज्योतिषीय संयोग में होता है, जब आषाढ़ महीने में अधिकमास आता है। यही वजह है कि कभी 12 साल बाद, कभी 15 साल बाद तो कभी 19 साल बाद यह अवसर आता है। इसी कारण बहुत से लोगों को जीवन में केवल एक या दो बार ही नवकलेवर देखने का मौका मिल पाता है।
हमारी राय
पुरी के जगन्नाथ मंदिर की नवकलेवर परंपरा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और दर्शन का अद्भुत संगम है। नई प्रतिमाओं की स्थापना जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही सम्मान पुरानी प्रतिमाओं को भी दिया जाता है। उन्हें फेंका नहीं जाता, बल्कि मंदिर परिसर के पवित्र कोइली बैकुंठ में पूरे विधि-विधान से समाधि दी जाती है। यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि शरीर बदल सकता है, लेकिन आत्मा और आस्था हमेशा अमर रहती है। यही संदेश भगवान जगन्नाथ की नवकलेवर परंपरा को दुनिया की सबसे अनोखी धार्मिक परंपराओं में शामिल करता है।









