पेट्रोल की बढ़ती कीमतें हमेशा आम लोगों की जेब पर असर डालती हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है। लेकिन हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने लोगों को चौंका दिया। दुनिया के कई देशों में पेट्रोल की कीमत 200 रुपये से भी ज्यादा पहुंच चुकी है। सबसे ज्यादा चर्चा हांगकांग की हो रही है, जहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब 295 रुपये बताई जा रही है। वहीं भारत में कई शहरों में पेट्रोल अभी भी करीब 95 से 105 रुपये प्रति लीटर के बीच बिक रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत में कीमतें कैसे कंट्रोल में हैं?
हांगकांग में पेट्रोल इतना महंगा क्यों?
हांगकांग दुनिया के उन देशों और क्षेत्रों में शामिल है जहां पेट्रोल की कीमत सबसे ज्यादा है। वहां एक लीटर पेट्रोल के लिए लोगों को करीब 295 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं।
सबसे बड़ी वजह टैक्स है। हांगकांग में सरकार पेट्रोल पर भारी टैक्स लगाती है। इसके अलावा वहां जमीन की कीमतें और ऑपरेशन कॉस्ट भी काफी ज्यादा हैं। यानी पेट्रोल पंप चलाने से लेकर ट्रांसपोर्ट तक सबकुछ महंगा पड़ता है। इसी वजह से वहां ईंधन की कीमतें आसमान छूती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि हांगकांग जैसे शहरों में सरकारें निजी वाहनों का इस्तेमाल कम करना चाहती हैं ताकि ट्रैफिक और प्रदूषण पर नियंत्रण रखा जा सके। इसलिए भी पेट्रोल को महंगा रखा जाता है।
दुनिया के कई देशों में तेजी से बढ़े दाम
सिर्फ हांगकांग ही नहीं, यूरोप और अफ्रीका के कई देशों में भी पेट्रोल की कीमतें काफी ज्यादा हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ देशों में बीते एक साल के दौरान पेट्रोल के दामों में 35 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
यूरोप के कई देशों में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ऊर्जा संकट गहरा गया था। इसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी पड़ा। कई देशों को तेल आयात करने में ज्यादा खर्च करना पड़ा, जिसका सीधा असर जनता पर दिखाई दिया।
इसके अलावा डॉलर की मजबूती भी तेल आयात करने वाले देशों के लिए परेशानी बनती है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का व्यापार डॉलर में होता है। अगर किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है तो उसे तेल खरीदने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है।
भारत में कैसे कंट्रोल में हैं कीमतें?
भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल की कीमतें कई देशों के मुकाबले कम दिखाई देती हैं।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह सरकार की रणनीति मानी जाती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना शुरू किया। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने डिस्काउंट पर रूसी तेल खरीदकर बड़ा फायदा उठाया। सस्ते कच्चे तेल की वजह से भारतीय ऑयल कंपनियों पर दबाव कुछ कम हुआ। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत में कीमतें पूरी तरह बेकाबू नहीं हुईं।
टैक्स का भी बड़ा रोल
भारत में पेट्रोल की कीमत में सबसे बड़ा हिस्सा टैक्स का होता है। केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी और वैट लगाती हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने कई बार एक्साइज ड्यूटी घटाई भी है ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
अगर सरकार टैक्स पूरी तरह कम कर दे तो पेट्रोल और सस्ता हो सकता है, लेकिन इससे सरकारी कमाई पर असर पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल से मिलने वाला टैक्स सरकारों के लिए बड़ा राजस्व स्रोत माना जाता है। इसी पैसे से सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी योजनाओं पर खर्च किया जाता है। राज्यों में भी पेट्रोल की कीमत अलग-अलग होती है क्योंकि हर राज्य का वैट अलग होता है। यही वजह है कि दिल्ली, मुंबई, पटना और चेन्नई में पेट्रोल के दाम अलग दिखाई देते हैं।
कच्चे तेल की कीमत कैसे तय करती है पेट्रोल का भाव?
जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो उसका असर धीरे-धीरे पेट्रोल और डीजल पर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड जैसे अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के आधार पर तेल की कीमत तय होती है।
अगर वैश्विक संकट, युद्ध या सप्लाई में दिक्कत होती है तो कच्चा तेल महंगा हो जाता है। इससे तेल कंपनियों की लागत बढ़ती है और फिर पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ जाते हैं। हालांकि भारत में तेल कंपनियां हर दिन कीमतों की समीक्षा करती हैं। लेकिन कई बार सरकार और कंपनियां बाजार की स्थिति देखकर तुरंत पूरा बोझ जनता पर नहीं डालतीं।
क्या भारत में पेट्रोल और सस्ता हो सकता है?
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि जब भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है तो फिर पेट्रोल 50 या 60 रुपये लीटर क्यों नहीं होता? इसका जवाब टैक्स और दूसरी लागत में छिपा है। कच्चे तेल की कीमत सिर्फ एक हिस्सा होती है। इसके अलावा रिफाइनिंग, ट्रांसपोर्ट, मार्केटिंग और टैक्स जैसी कई चीजें जुड़ती हैं। तब जाकर पेट्रोल की अंतिम कीमत तय होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लंबे समय तक सस्ता बना रहे और सरकार टैक्स में कटौती करे, तभी भारत में पेट्रोल के दाम में बड़ी गिरावट संभव है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ रही दुनिया
पेट्रोल की बढ़ती कीमतों की वजह से दुनिया अब तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ रही है। भारत में भी EV यानी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार कई तरह की सब्सिडी और योजनाओं के जरिए लोगों को इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदने के लिए प्रेरित कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में अगर इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ता है तो पेट्रोल पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे लोगों को महंगे ईंधन से राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि फिलहाल भारत जैसे बड़े देश में पेट्रोल और डीजल की जरूरत पूरी तरह खत्म होना आसान नहीं माना जा रहा। करोड़ों लोग अब भी पेट्रोल वाहनों पर निर्भर हैं।
आम आदमी पर सबसे ज्यादा असर
पेट्रोल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। जब ईंधन महंगा होता है तो ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ जाता है। इसका असर सब्जियों, दूध, राशन और दूसरी जरूरी चीजों की कीमत पर भी पड़ता है।
यही वजह है कि सरकारें पेट्रोल की कीमतों को लेकर काफी सावधानी बरतती हैं। भारत में फिलहाल कीमतें कई देशों की तुलना में नियंत्रित दिखाई देती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में हालात कब बदल जाएं, यह कहना आसान नहीं है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत में पेट्रोल की स्थिति अभी अपेक्षाकृत बेहतर है। हांगकांग जैसे देशों में जहां लोग 295 रुपये लीटर तक पेट्रोल खरीद रहे हैं, वहीं भारत में अभी भी कीमतें काफी कम हैं। लेकिन भविष्य में वैश्विक हालात, टैक्स नीति और कच्चे तेल के बाजार पर ही आगे की तस्वीर निर्भर करेगी।









