रिटायरमेंट के बाद ज्यादातर लोगों को लगता है कि अब नौकरी खत्म हो गई है, इसलिए टैक्स की झंझट भी खत्म हो गई होगी। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। आज भी लाखों पेंशनर्स ऐसी छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं जिनकी वजह से उनका टैक्स बोझ बढ़ जाता है। कई बार तो इन गलतियों के कारण इनकम टैक्स विभाग की तरफ से नोटिस तक आ जाता है। यही वजह है कि रिटायरमेंट के बाद भी टैक्स नियमों को समझना उतना ही जरूरी है जितना नौकरी के दौरान था। हाल के सालों में टैक्स सिस्टम पहले से ज्यादा डिजिटल और ऑटोमेटेड हो गया है। अब विभाग बैंक अकाउंट, पेंशन, ब्याज की कमाई और निवेश से जुड़ी जानकारी को आसानी से ट्रैक कर सकता है। ऐसे में अगर कोई जानकारी गलत भर दी जाए या किसी इनकम को रिपोर्ट करने में गलती हो जाए तो परेशानी बढ़ सकती है।
पेंशन और फैमिली पेंशन को लेकर सबसे ज्यादा होती है गलती
सबसे आम गलती पेंशन और फैमिली पेंशन को लेकर होती है। बहुत से लोग दोनों को एक जैसा मान लेते हैं, जबकि टैक्स नियमों में दोनों का ट्रीटमेंट अलग-अलग है। रिटायर्ड कर्मचारी को मिलने वाली पेंशन को सैलरी इनकम माना जाता है, जबकि किसी कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को मिलने वाली फैमिली पेंशन को ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज’ के तहत रखा जाता है। अगर कोई व्यक्ति इन दोनों को गलत कैटेगरी में दिखा देता है तो उसकी टैक्स कैलकुलेशन प्रभावित हो सकती है। यही छोटी सी गलती बाद में अतिरिक्त टैक्स या नोटिस की वजह बन सकती है। टैक्स एक्सपर्ट भी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि रिटर्न फाइल करते समय पेंशन की सही कैटेगरी चुनना बेहद जरूरी है।
स्टैंडर्ड डिडक्शन का फायदा नहीं लेना पड़ सकता है महंगा
कई पेंशनर्स ऐसे भी हैं जो अपने लिए उपलब्ध टैक्स छूट का पूरा फायदा नहीं उठा पाते। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्टैंडर्ड डिडक्शन है। पेंशन पाने वाले वरिष्ठ नागरिकों को भी स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ मिलता है, लेकिन जानकारी के अभाव में कई लोग इसे क्लेम ही नहीं करते। जब कोई व्यक्ति अपने अधिकार वाली कटौतियों को क्लेम नहीं करता तो उसकी टैक्सेबल इनकम बढ़ जाती है और सीधे तौर पर ज्यादा टैक्स देना पड़ता है। इसलिए रिटर्न भरने से पहले यह जरूर जांच लेना चाहिए कि कौन-कौन सी डिडक्शन आपके लिए लागू होती हैं।
बैंक ब्याज की इनकम को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी
रिटायरमेंट के बाद अधिकतर लोग अपनी बचत को फिक्स्ड डिपॉजिट, पोस्ट ऑफिस स्कीम या सेविंग अकाउंट में रखते हैं। इन निवेशों से मिलने वाला ब्याज भी टैक्स के दायरे में आ सकता है। कई पेंशनर्स सिर्फ पेंशन की इनकम को ही ध्यान में रखते हैं और ब्याज से हुई कमाई को रिटर्न में शामिल करना भूल जाते हैं। यही गलती बाद में परेशानी का कारण बन सकती है। आजकल बैंक की जानकारी सीधे इनकम टैक्स विभाग तक पहुंचती है। अगर आपके द्वारा दिखाई गई आय और विभाग के पास उपलब्ध डेटा में अंतर मिलता है तो विभाग स्पष्टीकरण मांग सकता है। इसलिए ब्याज से हुई कमाई की जानकारी सही तरीके से देना बेहद जरूरी है।
सही टैक्स रिजीम चुनना भी है जरूरी
आज के समय में टैक्सपेयर्स के पास पुरानी और नई टैक्स व्यवस्था में से किसी एक को चुनने का विकल्प होता है। कई पेंशनर्स बिना सही गणना किए कोई भी विकल्प चुन लेते हैं और बाद में उन्हें महसूस होता है कि उन्होंने ज्यादा टैक्स दे दिया। अगर किसी व्यक्ति के पास 80C, 80D, 80TTB जैसी कई कटौतियां हैं तो पुरानी टैक्स व्यवस्था ज्यादा फायदेमंद हो सकती है। वहीं जिन लोगों के पास ज्यादा निवेश या कटौतियां नहीं हैं, उनके लिए नई टैक्स व्यवस्था बेहतर साबित हो सकती है। इसलिए रिटर्न भरने से पहले दोनों व्यवस्थाओं की तुलना करना समझदारी होती है।
मेडिकल खर्च और हेल्थ इंश्योरेंस पर मिलने वाली राहत को न भूलें
बढ़ती उम्र के साथ मेडिकल खर्च भी बढ़ जाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुछ खास टैक्स छूट दी हैं। हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर मिलने वाली कटौती और गंभीर बीमारियों के इलाज पर मिलने वाली टैक्स राहत काफी उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन बड़ी संख्या में लोग इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते। कई बार दस्तावेज पूरे नहीं होते और कई बार जानकारी के अभाव में क्लेम ही नहीं किया जाता। इसका सीधा असर टैक्स देनदारी पर पड़ता है। इसलिए रिटर्न भरते समय मेडिकल खर्चों से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां एक बार जरूर जांच लेनी चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली रकम को पूरी तरह टैक्स फ्री मानना गलत
बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली हर रकम टैक्स फ्री होती है। जबकि ऐसा हमेशा नहीं होता। कुछ मामलों में ग्रेच्युटी, एन्युटी इनकम या एनपीएस से मिलने वाली रकम पर टैक्स नियम लागू हो सकते हैं। यही गलतफहमी कई लोगों को मुश्किल में डाल देती है। अगर किसी आय को टैक्स फ्री समझकर रिटर्न में शामिल नहीं किया गया और बाद में विभाग को उसकी जानकारी मिल गई तो अतिरिक्त टैक्स के साथ ब्याज और जुर्माना भी देना पड़ सकता है। इसलिए किसी भी रिटायरमेंट बेनिफिट को टैक्स फ्री मानने से पहले उसके नियम अच्छी तरह समझ लेना जरूरी है।
ITR फाइल नहीं करना भी बन सकता है समस्या
कुछ पेंशनर्स सोचते हैं कि अगर टैक्स नहीं बन रहा तो रिटर्न भरने की जरूरत नहीं है। लेकिन कई मामलों में ITR फाइल करना फायदेमंद होता है। इससे टैक्स रिफंड क्लेम करना आसान होता है, वित्तीय रिकॉर्ड मजबूत रहता है और भविष्य में लोन या वीजा जैसी जरूरतों में मदद मिलती है। इसके अलावा अगर आपकी कुल आय निर्धारित सीमा से अधिक है तो ITR फाइल करना अनिवार्य भी हो सकता है। समय पर रिटर्न न भरने पर लेट फीस और अन्य दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।
आखिर पेंशनर्स को क्या करना चाहिए?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि रिटायरमेंट के बाद टैक्स प्लानिंग को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पेंशन, ब्याज से हुई आय, मेडिकल खर्च, निवेश और उपलब्ध टैक्स छूटों की पूरी जानकारी रखनी चाहिए। साथ ही रिटर्न भरने से पहले AIS, Form 26AS और अन्य दस्तावेजों का मिलान जरूर करना चाहिए ताकि किसी तरह की गलती न रह जाए।
हमारी राय
हमारी राय में पेंशनर्स के लिए सबसे बड़ी जरूरत टैक्स नियमों की सही जानकारी है। अक्सर लोग यह सोचकर लापरवाही कर देते हैं कि अब नौकरी नहीं है तो टैक्स की चिंता भी नहीं होगी। लेकिन आज के डिजिटल दौर में छोटी सी गलती भी अतिरिक्त टैक्स, नोटिस या जुर्माने की वजह बन सकती है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद भी वित्तीय मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और जरूरत पड़ने पर किसी टैक्स विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए। सही जानकारी और थोड़ी सावधानी आपको अनावश्यक टैक्स बोझ से बचा सकती है।









