धरती पर इंसान का असर कितना बढ़ चुका है, इसका अंदाजा शायद हम रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं लगा पाते। लेकिन हाल ही में सामने आई एक स्टडी ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इंसानों द्वारा जमीन के नीचे से बड़े पैमाने पर पानी निकालने की वजह से धरती के घूमने के तरीके और उसके झुकाव पर भी असर पड़ा है।
सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन रिसर्च में कहा गया है कि भूजल के अत्यधिक दोहन ने धरती के रोटेशनल पोल यानी घूर्णन धुरी की स्थिति को बदलने में अहम भूमिका निभाई है। इस बदलाव में भारत और अमेरिका जैसे देशों की बड़ी हिस्सेदारी बताई गई है, जहां वर्षों से बड़े पैमाने पर भूजल का इस्तेमाल खेती, उद्योग और घरेलू जरूरतों के लिए किया जाता रहा है।
आखिर मामला क्या है?
वैज्ञानिकों के अनुसार धरती का झुकाव और उसकी घूर्णन धुरी पूरी तरह स्थिर नहीं होती। ग्रह के अंदर और बाहर होने वाले कई बदलावों की वजह से इसमें समय-समय पर हल्का बदलाव आता रहता है। जब पृथ्वी पर किसी हिस्से में बड़े पैमाने पर द्रव्यमान यानी मास इधर-उधर होता है, तो उसका असर ग्रह के घूमने के तरीके पर पड़ सकता है।
भूजल भी पृथ्वी के कुल द्रव्यमान का हिस्सा है। जब लाखों-करोड़ों टन पानी जमीन के नीचे से निकालकर खेतों, शहरों और उद्योगों में इस्तेमाल किया जाता है और बाद में वह नदियों तथा समुद्रों में पहुंच जाता है, तो पृथ्वी पर पानी का वितरण बदल जाता है। यही बदलाव धरती की घूर्णन धुरी को प्रभावित करता है।
स्टडी में क्या पता चला?
वैज्ञानिकों की स्टडी के मुताबिक 1993 से 2010 के बीच दुनिया भर में करीब 2,150 गीगाटन भूजल निकाला गया। यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि इससे वैश्विक समुद्र स्तर में भी बढ़ोतरी हुई। शोधकर्ताओं ने पाया कि इसी अवधि में पृथ्वी की घूर्णन धुरी लगभग 80 सेंटीमीटर यानी करीब 31.5 इंच खिसक गई।
शोध में यह भी कहा गया कि अगर भूजल दोहन को मॉडल से हटा दिया जाए तो वैज्ञानिकों द्वारा देखे गए वास्तविक ध्रुवीय बदलाव को समझाना मुश्किल हो जाता है। यानी धरती के झुकाव में आए इस परिवर्तन के पीछे भूजल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही।
भारत और अमेरिका का नाम क्यों आया?
स्टडी में विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम भारत और पश्चिमी उत्तर अमेरिका का जिक्र किया गया है। इन क्षेत्रों में लंबे समय से बड़े पैमाने पर भूजल निकाला जा रहा है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अभी भी भूजल पर निर्भर है। कई राज्यों में किसान सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल का इस्तेमाल करते हैं।
वहीं अमेरिका के कई कृषि क्षेत्रों में भी दशकों से भूजल का भारी उपयोग किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन इलाकों से निकाला गया पानी पृथ्वी के द्रव्यमान के वितरण को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त था।
क्या इससे धरती खतरे में है?
यह खबर पढ़कर कई लोगों के मन में सवाल आ सकता है कि क्या अब धरती का संतुलन बिगड़ जाएगा या दिन-रात का समय बदल जाएगा? वैज्ञानिकों का जवाब है कि ऐसा नहीं होने वाला। हालांकि धुरी में बदलाव मापा जा सकता है और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कल से मौसम पूरी तरह बदल जाएंगे या पृथ्वी किसी बड़े संकट में फंस जाएगी। यह बदलाव बहुत धीमा और बेहद सूक्ष्म स्तर पर है। आम लोगों को इसका सीधा असर महसूस नहीं होगा। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि चिंता की कोई बात नहीं है। वैज्ञानिक इसे एक चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं कि इंसानी गतिविधियां अब ग्रह के प्राकृतिक सिस्टम को भी प्रभावित करने लगी हैं।
समुद्र स्तर बढ़ने से भी जुड़ा है मामला
भूजल दोहन का असर सिर्फ धरती के झुकाव तक सीमित नहीं है। जब जमीन के नीचे का पानी निकाला जाता है और आखिरकार समुद्र तक पहुंचता है, तो समुद्र का जलस्तर भी बढ़ता है।
स्टडी के अनुसार 2,150 गीगाटन भूजल निकालने से वैश्विक समुद्र स्तर में लगभग 6.24 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई। पहली नजर में यह संख्या छोटी लग सकती है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने के साथ मिलकर इसका प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है।
खेती और बढ़ती आबादी बनी बड़ी वजह
दुनिया भर में भूजल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल खेती में होता है। बढ़ती आबादी के कारण खाद्यान्न की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किसान अधिक उत्पादन के लिए ज्यादा सिंचाई करते हैं। भारत जैसे देशों में कई इलाकों में बारिश पर पूरी तरह निर्भर रहना संभव नहीं होता। इसलिए भूजल का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है। यही कारण है कि कई राज्यों में जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पानी के उपयोग को लेकर बेहतर योजना नहीं बनाई गई तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
वैज्ञानिकों ने क्या चेतावनी दी?
शोधकर्ताओं का मानना है कि भूजल सिर्फ स्थानीय संसाधन नहीं है, बल्कि इसका संबंध पूरी पृथ्वी के सिस्टम से जुड़ा हुआ है। इसलिए जल संरक्षण को केवल पानी बचाने का अभियान मानना पर्याप्त नहीं है। भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल से जमीन धंसने, समुद्री जलस्तर बढ़ने और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भूजल प्रबंधन दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकता है।
समाधान क्या हो सकता है?
एक्सपर्ट्स के अनुसार वर्षा जल संचयन, आधुनिक सिंचाई तकनीक, पानी की बर्बादी रोकना और भूजल पुनर्भरण जैसे उपाय बेहद जरूरी हैं। कई देशों में ऐसे प्रयासों से भूजल स्तर में सुधार भी देखा गया है। भारत में भी जल संरक्षण को लेकर कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन बढ़ती आबादी और बढ़ती मांग को देखते हुए इन प्रयासों को और मजबूत बनाने की जरूरत है।
हमारी राय
यह स्टडी सिर्फ एक वैज्ञानिक खोज नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए चेतावनी है। जिस भूजल को हम असीमित संसाधन समझकर इस्तेमाल करते हैं, उसका असर अब पृथ्वी के व्यवहार में भी दिखाई देने लगा है। भले ही धरती के झुकाव में आया बदलाव आम लोगों को सीधे महसूस न हो, लेकिन यह साफ संकेत है कि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन लंबे समय में गंभीर परिणाम ला सकता है। अगर अभी से जल संरक्षण और भूजल प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।









