देश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। लोकसभा के अंदर जो संख्या बल कुछ महीने पहले तक NDA के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा था, वही अब धीरे-धीरे उसके पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है। खास तौर पर विपक्षी दलों में बढ़ती टूट और बगावत ने संसद का पूरा गणित बदल दिया है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुई टूट और अब शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) में सामने आई बगावत के बाद NDA उन संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित कराने की स्थिति में पहुंच सकता है, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। इनमें महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़ा विधेयक और परिसीमन (Delimitation) बिल सबसे अहम माने जा रहे हैं।
अप्रैल में यहीं अटक गया था NDA
दरअसल अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण को लागू करने और परिसीमन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन से जुड़ा विधेयक पेश किया था। लेकिन उस समय सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। मतदान में 298 सांसदों ने समर्थन किया जबकि 230 सांसद विरोध में खड़े रहे। संवैधानिक संशोधन पारित करने के लिए आवश्यक संख्या नहीं जुट सकी और बिल पास नहीं हो पाया।
उस हार को NDA सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया था। विपक्ष ने इसे अपनी एकजुटता की जीत बताया था, जबकि सरकार का कहना था कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिया गया।
TMC में बगावत ने बदली तस्वीर
लेकिन अप्रैल के बाद हालात तेजी से बदलने लगे। सबसे पहले पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों ने अलग रुख अपनाना शुरू किया। राजनीतिक रिपोर्टों में दावा किया गया कि TMC के भीतर बने असंतुष्ट समूह ने NDA को समर्थन देने की इच्छा जताई। यही वह मोड़ था जहां से संसद का गणित बदलना शुरू हुआ। जिन वोटों की कमी अप्रैल में सरकार को महसूस हो रही थी, वे धीरे-धीरे उपलब्ध होते दिखाई देने लगे।
अब शिवसेना उद्धव गुट में भी बड़ी दरार
TMC के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भी बड़ा घटनाक्रम सामने आया। शिवसेना (UBT) के कई सांसदों ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व से दूरी बनानी शुरू कर दी। रिपोर्टों के मुताबिक छह सांसदों ने अलग समूह बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जाने की तैयारी दिखाई।
यह घटनाक्रम सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर लोकसभा की संख्या पर पड़ता है। अगर ये सांसद औपचारिक रूप से NDA समर्थक खेमे का हिस्सा बनते हैं तो सरकार की ताकत और बढ़ जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही वजह है कि दिल्ली की राजनीति में इन घटनाओं को बेहद ध्यान से देखा जा रहा है।
क्यों अहम है दो-तिहाई बहुमत?
सामान्य विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक में बड़ा अंतर होता है। संविधान संशोधन के लिए केवल साधारण बहुमत काफी नहीं होता। इसके लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। महिला आरक्षण के क्रियान्वयन और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को इसी विशेष बहुमत की जरूरत है। अप्रैल में यही संख्या NDA के पास नहीं थी, लेकिन अब विपक्षी दलों में टूट के कारण तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।
महिला आरक्षण और परिसीमन का क्या है कनेक्शन?
सरकार का तर्क है कि महिला आरक्षण को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए परिसीमन प्रक्रिया जरूरी है। गृह मंत्री अमित शाह पहले भी कह चुके हैं कि महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था परिसीमन के साथ लागू की जाएगी। सरकार ने यह भी प्रस्ताव रखा था कि लोकसभा सीटों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जाए ताकि किसी राज्य का प्रतिनिधित्व कम न हो। हालांकि विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा इस मॉडल से सहमत नहीं था। कई दलों ने महिला आरक्षण का समर्थन किया लेकिन परिसीमन को उससे जोड़ने का विरोध किया। यही वजह रही कि अप्रैल में विपक्ष एकजुट होकर सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया था।
NDA के सहयोगियों की भूमिका भी बदली
एक और दिलचस्प पहलू यह है कि विपक्षी दलों से आने वाले समर्थन की वजह से NDA के भीतर सहयोगी दलों की राजनीतिक ताकत का संतुलन भी बदल सकता है।हाल के घटनाक्रमों के बाद माना जा रहा है कि अगर NDA का संख्या बल और बढ़ता है तो कुछ प्रमुख सहयोगी दलों की मोलभाव की क्षमता पहले जैसी नहीं रहेगी। राजनीतिक विश्लेषक इसे NDA के अंदर शक्ति संतुलन में बदलाव के तौर पर देख रहे हैं।
विपक्ष के सामने नई चुनौती
विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ सीटों का नुकसान नहीं है। असली चुनौती यह है कि जो एकजुटता अप्रैल में दिखाई दी थी, क्या वह आगे भी बनी रहेगी? अगर अलग-अलग दलों में टूट का सिलसिला जारी रहता है तो भविष्य में किसी बड़े संवैधानिक विधेयक पर विपक्ष के लिए पहले जैसी एकजुट रणनीति बनाना मुश्किल हो सकता है। यही कारण है कि कई विपक्षी दल अब अपने सांसदों को एकजुट रखने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल राजनीतिक संकेत यही बताते हैं कि NDA आने वाले सत्रों में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों को फिर से आगे बढ़ाने की तैयारी कर सकता है। सरकार को उम्मीद है कि बदले हुए राजनीतिक समीकरण उसके लिए पहले से ज्यादा अनुकूल साबित होंगे। हालांकि अंतिम फैसला संसद के पटल पर ही होगा। संख्या बल बढ़ना एक बात है, लेकिन संवैधानिक संशोधन जैसे बड़े मुद्दों पर राजनीतिक सहमति बनाना दूसरी बात। फिर भी इतना तय है कि विपक्षी दलों में आई दरार ने NDA के आत्मविश्वास को बढ़ा दिया है।
हमारी राय
पिछले दो महीनों में भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव विपक्षी दलों के भीतर बढ़ती टूट रही है। TMC और शिवसेना (UBT) में सामने आए घटनाक्रमों ने लोकसभा का गणित बदल दिया है। अगर यह सिलसिला आगे भी जारी रहा तो NDA के लिए महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधेयकों को दोबारा पेश करना पहले से कहीं आसान हो सकता है। हालांकि ऐसे संवैधानिक मुद्दों पर सिर्फ संख्या ही नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति भी जरूरी होती है। आने वाले महीनों में यही देखना सबसे दिलचस्प होगा कि क्या NDA अपनी बढ़ती ताकत को विधायी सफलता में बदल पाता है या नहीं।









