साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब इस चर्चित मामले में दिल्ली की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और चार अन्य दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने यह सजा हत्या और दंगों से जुड़े आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद सुनाई।
इस फैसले के बाद एक बार फिर 2020 के दिल्ली दंगों और अंकित शर्मा हत्याकांड की चर्चा शुरू हो गई है। बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि आखिर यह मामला क्या था, कोर्ट ने किन आधारों पर फैसला दिया और मौत की सजा की मांग के बावजूद उम्रकैद क्यों सुनाई गई।
क्या था अंकित शर्मा हत्याकांड?
फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान कई लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में संपत्ति का नुकसान हुआ। इसी हिंसा के दौरान 26 वर्षीय IB अधिकारी अंकित शर्मा लापता हो गए थे। बाद में उनका शव एक नाले से बरामद हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर कई चोटों के निशान मिलने की बात सामने आई, जिसके बाद यह मामला देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल हो गया।
ताहिर हुसैन पर क्या आरोप थे?
जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि उस समय आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद रहे ताहिर हुसैन हिंसा के दौरान भीड़ का हिस्सा थे और उनके घर का इस्तेमाल दंगों के दौरान किया गया। पुलिस ने अदालत में गवाहों के बयान, वीडियो फुटेज, तकनीकी सबूत और अन्य साक्ष्य पेश किए। जांच के आधार पर ताहिर हुसैन समेत कई लोगों पर हत्या, दंगा, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
दिल्ली की अदालत ने पहले ताहिर हुसैन और चार अन्य आरोपियों को दोषी करार दिया। इसके बाद सजा पर सुनवाई हुई और अदालत ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने माना कि मामले में पेश किए गए साक्ष्य और गवाहों के आधार पर अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा। अदालत ने कहा कि यह एक गंभीर अपराध था और दोषियों की भूमिका साबित हुई है।
मौत की सजा क्यों नहीं मिली?
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस और अभियोजन पक्ष ने अदालत से ताहिर हुसैन और अन्य दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की थी। उनका तर्क था कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी सबसे दुर्लभ मामलों में आता है।
हालांकि अदालत ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि दोषियों में सुधार की कोई संभावना नहीं है। भारतीय कानून के अनुसार फांसी की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जाती है जिन्हें ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ माना जाता है। इसी वजह से अदालत ने उम्रकैद की सजा को उचित माना।
कोर्ट ने किन बातों पर जोर दिया?
फैसला सुनाते समय अदालत ने कहा कि दंगों के दौरान हुई हिंसा बेहद गंभीर थी और कानून अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त संदेश जाना चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा तय करते समय सिर्फ अपराध की गंभीरता ही नहीं, बल्कि कानून के तय मानकों और उपलब्ध साक्ष्यों को भी ध्यान में रखा जाता है। इसी आधार पर उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
मामला इतना चर्चित क्यों रहा?
अंकित शर्मा एक केंद्रीय खुफिया एजेंसी में कार्यरत अधिकारी थे और उनकी मौत ऐसे समय हुई थी जब दिल्ली में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा चल रही थी। यही वजह रही कि इस मामले पर पूरे देश की नजर बनी रही। जांच से लेकर कोर्ट की कार्यवाही और अब सजा तक, हर चरण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना रहा।
दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों पर क्या असर पड़ेगा?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है। हालांकि हर मामले की सुनवाई उसके अपने साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर होती है, इसलिए इसका असर सीधे दूसरे मामलों के फैसलों पर नहीं पड़ेगा। फिर भी यह फैसला यह दिखाता है कि लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालतें दंगा मामलों में भी अंतिम निर्णय तक पहुंच रही हैं।
क्या आगे भी कानूनी विकल्प मौजूद हैं?
भारतीय न्याय व्यवस्था में दोषी ठहराए गए लोगों के पास उच्च अदालत में अपील करने का अधिकार होता है। ऐसे मामलों में सजा और दोषसिद्धि दोनों को चुनौती दी जा सकती है। इसलिए यह मामला आगे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक भी जा सकता है। अंतिम कानूनी स्थिति आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
इस फैसले का क्या संदेश है?
कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला बताता है कि हिंसा और हत्या जैसे गंभीर मामलों में अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाती हैं। साथ ही सजा तय करते समय भारतीय कानून के स्थापित सिद्धांतों का पालन किया जाता है। यह भी स्पष्ट हुआ कि मौत की सजा हर गंभीर अपराध में नहीं दी जाती। इसके लिए अदालत को यह संतुष्ट होना पड़ता है कि मामला वास्तव में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में आता है और दोषी के सुधार की संभावना नहीं बची है।
हमारी राय
अंकित शर्मा हत्याकांड का फैसला भारत की न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे मामलों में अदालत का दायित्व भावनाओं के बजाय कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देना होता है। यह फैसला भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। साथ ही यह याद दिलाता है कि किसी भी तरह की हिंसा और कानून हाथ में लेने की घटनाओं का समाधान केवल न्यायिक प्रक्रिया के जरिए ही संभव है।









