आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इससे लोगों की नौकरियां खतरे में हैं या फिर ये नई नौकरियों के मौके लेकर आएगा। इसी बहस के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन के बयान ने काफी चर्चा छेड़ दी है। सैम ऑल्टमैन ने खुद माना है कि AI को लेकर उनकी पहले की जो सोच थी, वो पूरी तरह सही नहीं निकली। उन्होंने कहा कि उन्हें जितना बड़ा ‘जॉब क्राइसिस’ दिख रहा था, वैसा अभी तक हुआ ही नहीं है।
AI को लेकर पहले क्या डर था?
जब ChatGPT और दूसरे AI टूल्स तेजी से पॉपुलर होने लगे थे, तब दुनिया भर के टेक एक्सपर्ट्स ये मान रहे थे कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में व्हाइट कॉलर जॉब्स खत्म हो सकती हैं। खासकर कस्टमर सपोर्ट, डेटा एंट्री और बेसिक ऑफिस वर्क जैसे कामों को लेकर ये डर था कि मशीनें इंसानों की जगह ले लेंगी। सैम ऑल्टमैन खुद भी शुरू में इसी सोच के साथ आगे बढ़े थे कि AI कई एंट्री लेवल नौकरियों को जल्दी खत्म कर सकता है। लेकिन अब उनका कहना बदल चुका है। उन्होंने साफ कहा है कि जितनी तेजी से लोगों ने नौकरी खत्म होने का डर बनाया था, असल में उतनी तेजी से ऐसा कुछ नहीं हुआ।
सैम ऑल्टमैन ने क्यों माना कि वो गलत थे?
सैम ऑल्टमैन ने हाल ही में एक बातचीत के दौरान कहा कि उन्होंने AI के टेक्निकल ग्रोथ को तो सही समझा था, लेकिन इसका असर समाज और नौकरियों पर कितना होगा, ये उन्होंने गलत आंका था। उनका कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि 2022 में ChatGPT आने के बाद एंट्री लेवल जॉब्स में बड़ी गिरावट दिखेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने ये भी माना कि लोग अभी भी इंसानी बातचीत, भरोसे और पर्सनल टच को बहुत अहमियत देते हैं। सिर्फ मशीन से काम करवाना हर जगह पूरी तरह संभव नहीं है। कई काम ऐसे हैं जहां इंसान की समझ, भावनाएं और निर्णय लेने की क्षमता जरूरी होती है, जिसे AI पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकता।
PM मोदी की AI को लेकर सोच क्या है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले भी कई बार AI को लेकर अपनी राय दे चुके हैं। उनका मानना है कि AI सिर्फ नौकरी खत्म करने वाली तकनीक नहीं है, बल्कि ये एक “फोर्स मल्टीप्लायर” की तरह काम करेगी। यानी जो लोग और संस्थाएं इसका सही इस्तेमाल करेंगे, उनकी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। PM मोदी का कहना रहा है कि जैसे इंटरनेट आने के बाद कई नई नौकरियां और इंडस्ट्री बनी थीं, वैसे ही AI भी नए अवसर पैदा करेगा। उनका फोकस इस बात पर भी रहा है कि देश को AI के साथ-साथ स्किलिंग और री-स्किलिंग पर ध्यान देना चाहिए ताकि लोग बदलते वर्क कल्चर के लिए तैयार रहें।
मोदी और ऑल्टमैन की सोच में क्या समानता दिखती है?
अगर ध्यान से देखा जाए तो दोनों की सोच में एक बड़ी समानता निकलकर आती है। दोनों ही अब इस बात पर सहमत दिखते हैं कि AI से पूरी तरह नौकरियां खत्म होने जैसा डर शायद बढ़ा-चढ़ाकर देखा गया था। ऑल्टमैन जहां ये मानते हैं कि उनका शुरुआती अनुमान गलत था, वहीं PM मोदी पहले से ही इस बात पर जोर देते रहे हैं कि तकनीक को डर की नजर से नहीं, बल्कि अवसर की तरह देखना चाहिए। दोनों ही इस बात पर सहमत नजर आते हैं कि AI इंसानों को पूरी तरह रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उनके काम करने के तरीके को बदल देगा।
क्या AI से सच में नौकरियां नहीं जाएंगी?
यहां एक बात समझना जरूरी है कि सैम ऑल्टमैन का बयान ये नहीं कहता कि AI का कोई असर नहीं होगा। असर जरूर होगा, लेकिन वो उतना ‘अचानक और बड़ा’ नहीं होगा जितना पहले माना जा रहा था। कई रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ सेक्टर जैसे कस्टमर सर्विस, बेसिक डेटा प्रोसेसिंग और रिपीट होने वाले कामों में बदलाव जरूर आ रहा है। लेकिन साथ ही नए तरह के काम भी पैदा हो रहे हैं जैसे AI ऑपरेटर, डेटा ट्रेनर, AI ऑडिटिंग और टेक सपोर्ट रोल्स। यानी तस्वीर पूरी तरह खत्म होने की नहीं, बल्कि बदलने की है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत जैसे देश के लिए ये बहस और भी जरूरी हो जाती है क्योंकि यहां युवा आबादी बहुत बड़ी है। अगर AI को सही तरीके से अपनाया गया तो ये देश के लिए बहुत बड़ा अवसर बन सकता है। लेकिन अगर स्किलिंग पर ध्यान नहीं दिया गया तो कुछ सेक्टरों में दिक्कतें भी आ सकती हैं। इसलिए सरकार और टेक कंपनियों दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि लोगों को नए जमाने की स्किल्स सिखाई जाएं। खासकर डिजिटल स्किल, AI टूल्स की समझ और डेटा से जुड़े काम आने वाले समय में बहुत जरूरी होंगे।
क्या ये सिर्फ एक टेक बदलाव है या बड़ा सोशल बदलाव?
AI सिर्फ एक टेक्नोलॉजी नहीं है, बल्कि ये काम करने के पूरे तरीके को बदल रहा है। पहले जहां किसी काम को पूरा करने में कई लोग लगते थे, अब वही काम कुछ AI टूल्स से जल्दी हो सकता है। इसका मतलब ये है कि काम की क्वालिटी और स्पीड तो बढ़ेगी, लेकिन लोगों की भूमिका भी बदल जाएगी। अब इंसान का काम ज्यादा क्रिएटिव, डिसीजन मेकिंग और मैनेजमेंट की तरफ शिफ्ट होता दिख रहा है। यानी “काम खत्म” नहीं हो रहा, बल्कि 'काम का तरीका' बदल रहा है।
आगे की तस्वीर कैसी हो सकती है?
आने वाले समय में AI और ज्यादा एडवांस होगा, लेकिन इसके साथ ही रेगुलेशन और ह्यूमन कंट्रोल भी जरूरी होगा। कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि AI इंसानों की मदद करने के लिए है, न कि उन्हें हटाने के लिए। अगर सही बैलेंस बना रहा तो ये टेक्नोलॉजी बड़ी प्रोडक्टिविटी ग्रोथ दे सकती है। सैम ऑल्टमैन की बदली हुई सोच भी यही इशारा करती है कि अभी कहानी पूरी नहीं हुई है, और आने वाले सालों में असली असर धीरे-धीरे सामने आएगा।
हमारी राय
हमारी राय में AI को लेकर जो शुरू में ‘नौकरी खत्म होने का डर’ था, वो अब थोड़ा संतुलित नजर आ रहा है। सैम ऑल्टमैन का खुद मानना कि उनका अनुमान गलत था, ये दिखाता है कि टेक्नोलॉजी का असर हमेशा सीधा नहीं होता। सच ये है कि AI कुछ नौकरियां बदलेगा जरूर, लेकिन साथ ही नए मौके भी बनाएगा। असली चुनौती टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि लोगों की तैयारी है। जो लोग समय के साथ अपनी स्किल्स अपडेट करेंगे, उनके लिए AI खतरा नहीं बल्कि एक बड़ा मौका बन सकता है।









