भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं है, इमोशन है। शादी हो, त्योहार हो, बच्चे का जन्म हो या फिर कोई मुश्किल वक्त, सोना हर मौके पर काम आता है। यही वजह है कि भारतीय परिवारों के पास हजारों टन सोना घरों और लॉकरों में पड़ा हुआ है। लेकिन अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या यही सोना देश की अर्थव्यवस्था को भी संभाल सकता है? क्या घरों में रखा गोल्ड सिर्फ शोपीस बनकर रहेगा या फिर ये देश के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है? हाल के दिनों में इस बात पर काफी चर्चा हुई है कि अगर लोग नया सोना खरीदने के बजाय पुराने सोने का इस्तेमाल करें या उसका कुछ हिस्सा बाजार में लाएं, तो इससे देश की इकोनॉमी को बड़ा फायदा हो सकता है। सुनने में ये बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन इसके पीछे पूरा आर्थिक गणित छिपा हुआ है।

 

भारत और सोने का पुराना रिश्ता

भारत में सोने का रिश्ता सदियों पुराना है। गांव हो या शहर, हर परिवार में थोड़ा बहुत सोना जरूर मिलता है। खासकर महिलाओं के लिए सोना सिर्फ निवेश नहीं बल्कि सुरक्षा और सम्मान का हिस्सा माना जाता है। यही कारण है कि लोग बैंक बैलेंस से ज्यादा भरोसा गोल्ड पर करते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारतीय परिवारों के पास करीब 25 हजार टन से ज्यादा सोना मौजूद है। ये मात्रा दुनिया के कई देशों के गोल्ड रिजर्व से भी ज्यादा मानी जाती है। लेकिन दिक्कत ये है कि इसका बड़ा हिस्सा सिर्फ लॉकरों में बंद पड़ा रहता है। उससे न तो कोई कमाई हो रही है और न ही वो सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा है। 

 

आखिर इकोनॉमी को कैसे मिलेगा फायदा?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि घरों में रखा सोना देश की मदद कैसे करेगा? इसका जवाब काफी सीधा है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सोना विदेशों से खरीदता है। हर साल सैकड़ों टन गोल्ड इंपोर्ट किया जाता है। जब देश बाहर से ज्यादा सोना खरीदता है, तो डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेक्स रिजर्व प्रभावित होता है और इंपोर्ट बिल बढ़ जाता है। 

अगर लोग नया सोना खरीदने की बजाय घर में रखा पुराना सोना बेचें, एक्सचेंज करें या गोल्ड मोनेटाइजेशन जैसी स्कीमों में डालें, तो बाजार में घरेलू गोल्ड की सप्लाई बढ़ सकती है। इससे बाहर से सोना मंगाने की जरूरत कम होगी। यानी देश का पैसा विदेश जाने से बचेगा और इकोनॉमी पर दबाव कम होगा। एक तरह से समझें तो जो सोना अभी तक बंद पड़ा है, वही अगर बाजार में घूमने लगे तो वो देश की आर्थिक मशीन में ईंधन की तरह काम कर सकता है।

 

सिर्फ 2-3% सोना भी बदल सकता है खेल

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारतीय परिवार अपने कुल गोल्ड का सिर्फ 2 से 4 प्रतिशत हिस्सा भी बाजार में ले आएं, तो इसका असर काफी बड़ा हो सकता है। इससे गोल्ड इंपोर्ट कम होगा, विदेशी मुद्रा बचेगी और रुपए पर दबाव भी कम हो सकता है। अभी स्थिति ये है कि भारत में आने वाला बड़ा विदेशी पैसा भी कई बार गोल्ड इंपोर्ट में चला जाता है। यानी जो पैसा देश की फैक्ट्रियों, कारोबार या रोजगार में लग सकता था, वो सोना खरीदने में इस्तेमाल हो जाता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री लंबे समय से कहते आए हैं कि गोल्ड को ‘डेड एसेट’ बनाकर रखने के बजाय उसे प्रोडक्टिव बनाना जरूरी है।

 

लोग सोना बेचने से डरते क्यों हैं?

भारत में सोना सिर्फ पैसा नहीं बल्कि भावनाओं से जुड़ा हुआ है। बहुत सारे परिवारों के लिए गहने पुरानी यादों और रिश्तों का हिस्सा होते हैं। दादी का हार, मां की चूड़ियां या शादी का मंगलसूत्र लोग आसानी से बेचना नहीं चाहते। यही वजह है कि गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम जैसी सरकारी योजनाएं भी बहुत ज्यादा सफल नहीं हो पाईं। कई लोगों को डर रहता है कि अगर सोना बैंक में जमा किया तो वापस वही गहना नहीं मिलेगा। कुछ लोगों को टैक्स और जांच का डर भी रहता है। वहीं गांव और छोटे शहरों में अभी भी लोगों का भरोसा फिजिकल गोल्ड पर ज्यादा है। यानी असली चुनौती सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है।

 

क्या गोल्ड में पैसा लगाना गलत है?

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सोना खराब निवेश है। मुश्किल समय में सोना हमेशा सुरक्षित विकल्प माना जाता है। जब शेयर बाजार गिरता है या दुनिया में तनाव बढ़ता है, तब लोग गोल्ड की तरफ भागते हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में सोने की कीमतों में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। लेकिन समस्या तब होती है जब लोग अपनी ज्यादातर बचत सिर्फ गोल्ड में डाल देते हैं। क्योंकि सोना खुद से कोई आमदनी पैदा नहीं करता। शेयर बाजार में डिविडेंड मिलता है, बिजनेस रोजगार पैदा करते हैं, बैंक जमा पर ब्याज मिलता है, लेकिन गोल्ड सिर्फ कीमत बढ़ने पर फायदा देता है। यही कारण है कि फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स हमेशा सलाह देते हैं कि निवेश में बैलेंस होना चाहिए। थोड़ा गोल्ड, थोड़ा म्यूचुअल फंड, थोड़ा SIP और दूसरी सेविंग्स — यही सही तरीका माना जाता है।

 

डिजिटल गोल्ड और ETF क्यों हो रहे पॉपुलर?

अब नई पीढ़ी फिजिकल गोल्ड की बजाय डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ETF और दूसरे विकल्पों की तरफ बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह सुविधा और सुरक्षा है। इसमें चोरी का डर नहीं होता और खरीदना-बेचना भी आसान होता है। इसके अलावा सरकार भी चाहती है कि लोग फिजिकल गोल्ड कम खरीदें और वित्तीय गोल्ड प्रोडक्ट्स ज्यादा अपनाएं। इससे बाजार में पारदर्शिता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को भी फायदा होता है। हालांकि भारत में अभी भी ज्यादातर लोग असली गहनों को ही ज्यादा पसंद करते हैं। इसलिए इस बदलाव में समय लगेगा।

 

क्या सरकार कोई बड़ा कदम उठा सकती है?

सरकार पहले भी गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाएं ला चुकी है। लेकिन लोगों की भागीदारी उतनी बड़ी नहीं रही, जितनी उम्मीद थी। अब माना जा रहा है कि आने वाले समय में सरकार लोगों को पुराने गोल्ड को सिस्टम में लाने के लिए और आसान और आकर्षक विकल्प दे सकती है। अगर लोगों को भरोसा दिलाया जाए कि उनका सोना सुरक्षित रहेगा और उन्हें अच्छा रिटर्न भी मिलेगा, तो धीरे-धीरे तस्वीर बदल सकती है।

 

आम लोगों को क्या समझने की जरूरत है?

आज के समय में सिर्फ सोना खरीदते जाना समझदारी नहीं मानी जाती। जरूरी ये है कि आप अपने पैसे को सही जगह इस्तेमाल करें। अगर घर में बहुत ज्यादा गोल्ड पड़ा है और उसका कोई इस्तेमाल नहीं हो रहा, तो उसका कुछ हिस्सा बेहतर निवेश में लगाया जा सकता है। बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए सोना खरीदते रहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यही सबसे सुरक्षित चीज है। लेकिन बदलती दुनिया में स्मार्ट इन्वेस्टमेंट का मतलब सिर्फ गहने जमा करना नहीं बल्कि पैसे को बढ़ाना भी है।

 

हमारी राय

सोना भारतीय परिवारों की पहचान और सुरक्षा दोनों रहा है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन अब वक्त बदल रहा है। सिर्फ लॉकर भरते रहने से न तो परिवार आगे बढ़ेगा और न ही देश की इकोनॉमी को फायदा होगा। जरूरत इस बात की है कि लोग सोने को सिर्फ भावनाओं से नहीं बल्कि समझदारी से भी देखें। अगर घरों में रखा थोड़ा सा गोल्ड भी सही तरीके से आर्थिक सिस्टम में आए, तो इससे देश का इंपोर्ट बिल कम हो सकता है, विदेशी मुद्रा बच सकती है और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। हालांकि इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं कि लोग अपना पूरा सोना बेच दें। बल्कि समझदारी इसी में है कि जरूरत और निवेश के बीच संतुलन बनाया जाए। आने वाले समय में वही लोग ज्यादा फायदे में रहेंगे जो सिर्फ सोना जमा नहीं करेंगे, बल्कि अपने पैसों को स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल भी करेंगे।