भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में अब सरकार और सरकारी तेल कंपनियां एलपीजी (LPG) की खरीद को लेकर बड़ी रणनीति पर काम कर रही हैं। खबर है कि भारत अमेरिका से एलपीजी आयात को लगभग दोगुना करने की तैयारी कर रहा है। इसका सबसे बड़ा मकसद खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करना और किसी भी वैश्विक संकट के दौरान देश में रसोई गैस की सप्लाई को प्रभावित होने से बचाना है।
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से जुड़े जोखिमों ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए किसी भी तरह की आपूर्ति बाधित होने का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ सकता है। यही वजह है कि अब सरकार वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान दे रही है।
आखिर भारत को क्यों बदलनी पड़ रही है रणनीति?
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ताओं में शामिल है। देश के करोड़ों घरों में खाना बनाने के लिए एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल होता है। लेकिन घरेलू उत्पादन देश की पूरी जरूरत को पूरा नहीं कर पाता, इसलिए बड़ी मात्रा में एलपीजी विदेशों से मंगाई जाती है।
अब तक भारत अपनी एलपीजी जरूरत का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से खरीदता रहा है। लेकिन हाल में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने यह साफ कर दिया कि किसी एक क्षेत्र पर ज्यादा निर्भर रहना भविष्य में जोखिम भरा साबित हो सकता है। इसी वजह से अब अमेरिका को एक बड़े विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका से क्यों बढ़ाई जा रही है LPG की खरीद?
अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में एलपीजी का बड़ा निर्यातक बनकर उभरा है। वहां पर्याप्त उत्पादन होने के कारण भारत को लगातार सप्लाई मिलने की संभावना रहती है। इसके अलावा अमेरिका से लंबी अवधि के समझौते करने से भारत को सप्लाई की स्थिरता भी मिल सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत पहले जहां हर साल करीब 22 लाख टन एलपीजी अमेरिका से खरीद रहा था, अब इस मात्रा को और बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। इससे भारत की आयात रणनीति ज्यादा संतुलित होगी और किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?
ऊर्जा सुरक्षा का मतलब सिर्फ तेल और गैस खरीदना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान देश में ईंधन की कमी न हो। अगर किसी कारण से खाड़ी क्षेत्र में युद्ध, समुद्री रास्तों में रुकावट या राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो सबसे पहले एलपीजी और कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। ऐसे में अमेरिका, अफ्रीका और दूसरे देशों से आयात बढ़ाकर भारत इस जोखिम को कम करना चाहता है। यही वजह है कि सरकार ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने पर जोर दे रही है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और एलपीजी इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। अगर किसी वजह से इस समुद्री मार्ग पर आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका सीधा असर पड़ता है। हाल के तनाव के दौरान भी इसी तरह की आशंकाएं सामने आई थीं। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह चिंता का विषय है, इसलिए सरकार पहले से ही वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने में जुटी है।
सिर्फ अमेरिका ही नहीं, दूसरे विकल्पों पर भी नजर
सरकार सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने की योजना नहीं बना रही है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत भविष्य में कई अलग-अलग देशों से एलपीजी खरीद बढ़ाना चाहता है ताकि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता न रहे। इसी स्ट्रेटजी के तहत नए सप्लायर देशों से बातचीत, दीर्घकालिक अनुबंध और बेहतर लॉजिस्टिक्स नेटवर्क पर भी काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान घरेलू बाजार को सुरक्षित रखना है।
सरकार बना रही है बड़ा स्टोरेज प्लान
आयात के साथ-साथ भारत अपने एलपीजी भंडारण की क्षमता भी बढ़ाने पर काम कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार देश में एलपीजी का रणनीतिक भंडार 18 दिनों से बढ़ाकर करीब 30 दिनों तक करने की योजना बना रही है।
अगर यह योजना सफल होती है तो किसी भी आपूर्ति संकट की स्थिति में देश के पास पर्याप्त गैस उपलब्ध रहेगी और आम लोगों को सिलेंडर की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके लिए सरकारी तेल कंपनियां नए स्टोरेज टर्मिनल और गोदाम विकसित करने की तैयारी कर रही हैं।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
अगर भारत की आयात रणनीति सफल रहती है तो सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भविष्य में वैश्विक संकट के बावजूद घरेलू एलपीजी सप्लाई ज्यादा स्थिर रह सकती है। इससे सिलेंडर की उपलब्धता प्रभावित होने की संभावना कम होगी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कई अन्य कारणों से भी तय होती हैं, इसलिए केवल अमेरिका से आयात बढ़ाने से एलपीजी सस्ती हो जाएगी, ऐसा कहना सही नहीं होगा। लेकिन सप्लाई सुरक्षित रहने से अचानक आने वाले बड़े संकटों का असर जरूर कम किया जा सकता है।
भारत की ऊर्जा नीति में क्या बदलाव दिख रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में भारत लगातार अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव कर रहा है। एक तरफ रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई गई, दूसरी तरफ नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश किया जा रहा है। अब एलपीजी के मामले में भी सरकार स्रोतों को विविध बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि मजबूत सप्लाई चेन, पर्याप्त भंडारण और कई देशों के साथ संतुलित आयात व्यवस्था से सुनिश्चित होगी।
हमारी राय
भारत जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है। अगर देश सिर्फ कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भर रहेगा तो किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट का असर सीधे आम लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे में अमेरिका समेत कई देशों से एलपीजी आयात बढ़ाने की रणनीति दूरदर्शी कदम मानी जा सकती है।
हालांकि इसके साथ-साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाना, एलपीजी का पर्याप्त स्टोरेज तैयार करना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी है। अगर सरकार इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करती है तो आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकती है।









