भगवान शिव के भक्तों के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा सिर्फ एक तीर्थ यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, तप और आत्मिक शांति का अनुभव मानी जाती है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है कैलाश परिक्रमा, जिसे तिब्बती भाषा में कोरा (Kora) भी कहा जाता है। हर साल हजारों श्रद्धालु माउंट कैलाश की परिक्रमा करने के लिए कठिन पहाड़ी रास्तों और ऊंची चोटियों को पार करते हैं।
लेकिन यह परिक्रमा आसान नहीं होती। करीब 52 से 54 किलोमीटर लंबी यह यात्रा तीन दिनों में पूरी की जाती है और रास्ते में 18,000 फीट से ज्यादा ऊंचाई वाले दर्रे भी पार करने पड़ते हैं। ऐसे में जो लोग पहली बार इस यात्रा पर जाने की सोच रहे हैं, उनके मन में कई सवाल होते हैं, रास्ता कैसा होता है, कहां रुकना पड़ता है, क्या घोड़े की सुविधा मिलती है और कितनी तैयारी करनी चाहिए।
क्या है कैलाश परिक्रमा?
कैलाश परिक्रमा का मतलब है माउंट कैलाश के चारों ओर पैदल चक्कर लगाना। हिंदू मान्यता के अनुसार माउंट कैलाश भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य निवास है। इसलिए इस पर्वत पर चढ़ाई नहीं की जाती, बल्कि श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करते हैं।
यह पर्वत सिर्फ हिंदू धर्म में ही नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन और बोन धर्म के अनुयायियों के लिए भी बेहद पवित्र माना जाता है। माना जाता है कि श्रद्धा और नियमों के साथ परिक्रमा करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग खुलता है।
कितनी लंबी होती है यात्रा?
कैलाश परिक्रमा की कुल लंबाई लगभग 52 से 54 किलोमीटर मानी जाती है। इसे आमतौर पर तीन दिनों में पूरा किया जाता है। यह यात्रा समुद्र तल से काफी अधिक ऊंचाई पर होती है, इसलिए यहां ऑक्सीजन सामान्य जगहों की तुलना में कम होती है। इसी वजह से यह सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण यात्रा मानी जाती है।
पहले दिन का सफर
परिक्रमा की शुरुआत दर्चेन (Darchen) से होती है, जिसे कैलाश यात्रा का बेस कैंप माना जाता है। पहले दिन श्रद्धालु दर्चेन से निकलकर दिरापुक (Dirapuk) पहुंचते हैं। इस दौरान रास्ता घाटियों, पत्थरीले ट्रैक और पहाड़ी इलाकों से होकर गुजरता है। पहले दिन की पैदल दूरी अपेक्षाकृत कम होती है ताकि यात्री ऊंचाई के अनुसार खुद को ढाल सकें। दिरापुक से माउंट कैलाश का उत्तरी भाग बेहद करीब से दिखाई देता है और इसे यात्रा के सबसे सुंदर पड़ावों में गिना जाता है।
दूसरे दिन सबसे कठिन परीक्षा
पूरी यात्रा का सबसे कठिन दिन दूसरा माना जाता है। इस दिन यात्रियों को डोल्मा ला दर्रा (Dolma La Pass) पार करना पड़ता है, जिसकी ऊंचाई लगभग 5,630 मीटर (करीब 18,500 फीट) है। यहां ऑक्सीजन काफी कम होती है और चढ़ाई भी बेहद कठिन होती है। इसी रास्ते में प्रसिद्ध गौरी कुंड भी दिखाई देता है, जिसे हिंदू श्रद्धालु बेहद पवित्र मानते हैं। डोल्मा ला पार करने के बाद उतराई शुरू होती है और श्रद्धालु जुतुलपुक (Zutulpuk) पहुंचते हैं। यह पूरा दिन सबसे ज्यादा थकाने वाला माना जाता है।
तीसरे दिन पूरी होती है परिक्रमा
तीसरे दिन की यात्रा अपेक्षाकृत आसान होती है। जुतुलपुक से कुछ किलोमीटर पैदल चलने के बाद श्रद्धालु सड़क मार्ग तक पहुंचते हैं, जहां से वाहन द्वारा फिर दर्चेन लौटाया जाता है। इसी के साथ कैलाश परिक्रमा पूरी मानी जाती है।
कहां रुकते हैं श्रद्धालु?
कैलाश परिक्रमा के दौरान किसी लग्जरी होटल की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यात्रा के दौरान ज्यादातर जगहों पर साधारण डॉर्मिटरी, गेस्टहाउस या सामूहिक ठहरने की व्यवस्था होती है। कमरे सामान्य होते हैं, कई जगह साझा बिस्तर मिलते हैं और गर्म पानी या नहाने की सुविधा सीमित हो सकती है। भोजन भी साधारण रखा जाता है ताकि यात्रियों को ऊर्जा मिलती रहे।
क्या घोड़े या याक की सुविधा मिलती है?
हर श्रद्धालु पूरी परिक्रमा पैदल नहीं कर पाता। ऐसे लोगों के लिए कई जगह घोड़े और सामान ढोने के लिए याक या पोर्टर उपलब्ध होते हैं। हालांकि कुछ हिस्सों में, खासकर डोल्मा ला दर्रे के आसपास, यात्रियों को खुद पैदल चलना पड़ सकता है। इसलिए पूरी तरह घोड़े पर निर्भर रहना सही नहीं माना जाता।
कौन-सी परिक्रमा सबसे ज्यादा की जाती है?
कैलाश की दो तरह की परिक्रमा का जिक्र मिलता है।पहली आउटर कोरा (Outer Kora) है, जिसे अधिकांश श्रद्धालु करते हैं। यही सामान्य 52-54 किलोमीटर की परिक्रमा है। दूसरी इनर कोरा (Inner Kora) है, जो ज्यादा कठिन और सीमित लोगों के लिए होती है। इसमें श्रद्धालु कैलाश पर्वत के और अधिक नजदीक पहुंचते हैं। कुछ भक्त चरण स्पर्श के लिए भी विशेष मार्ग अपनाते हैं।
यात्रा से पहले कैसी तैयारी जरूरी है?
कैलाश परिक्रमा पर जाने से पहले अच्छी शारीरिक तैयारी बेहद जरूरी मानी जाती है। एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि यात्रा से पहले नियमित पैदल चलना, सीढ़ियां चढ़ना और हल्की एक्सरसाइज शुरू कर देनी चाहिए। जिन लोगों को हृदय रोग, अस्थमा या गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हैं, उन्हें डॉक्टर की सलाह लेकर ही यात्रा करनी चाहिए। ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने के कारण शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
मानसरोवर झील का भी होता है विशेष महत्व
अधिकांश श्रद्धालु कैलाश परिक्रमा के साथ मानसरोवर झील भी जाते हैं। मान्यता है कि इस पवित्र झील में स्नान और पूजा करने से जीवनभर के पापों से मुक्ति मिलती है। इसलिए कैलाश यात्रा और मानसरोवर दर्शन को एक-दूसरे का पूरक माना जाता है।
हमारी राय
कैलाश परिक्रमा सिर्फ पहाड़ों पर की जाने वाली एक ट्रैकिंग नहीं, बल्कि आस्था, धैर्य और आत्मिक शक्ति की परीक्षा मानी जाती है। तीन दिनों की यह कठिन यात्रा शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन लाखों श्रद्धालु इसे भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं।
अगर आप भी भविष्य में कैलाश मानसरोवर यात्रा का सपना देख रहे हैं, तो पहले अच्छी शारीरिक तैयारी करें, ऊंचाई पर होने वाली दिक्कतों की जानकारी लें और मानसिक रूप से भी खुद को तैयार रखें। सही तैयारी के साथ की गई यह यात्रा जीवन का एक अविस्मरणीय और आध्यात्मिक अनुभव बन सकती है।









