हाल ही में All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) की एक स्टडी ने बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को लेकर बड़ी चिंता जताई है। इस रिसर्च में पाया गया कि छोटे बच्चों, खासकर एक साल से कम उम्र के बच्चों को ज्यादा स्क्रीन दिखाना उनके दिमाग के विकास पर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिर्फ आंखों या नींद की समस्या नहीं है, बल्कि इससे व्यवहार और मानसिक विकास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए यह विषय अब माता-पिता के लिए बेहद गंभीर हो गया है। 

 

ज्यादा स्क्रीन टाइम से कैसे बढ़ सकता है ऑटिज्म का खतरा?

स्टडी में यह सामने आया कि जिन बच्चों को बहुत छोटी उम्र में मोबाइल या टीवी की स्क्रीन ज्यादा दिखाई जाती है, उनमें आगे चलकर Autism Spectrum Disorder के लक्षण दिखने का खतरा बढ़ सकता है। खासकर जिन बच्चों को एक साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर मिला, उनमें तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म जैसे लक्षण देखे गए। डॉक्टरों का मानना है कि यह सीधा कारण नहीं है, लेकिन स्क्रीन टाइम एक बड़ा जोखिम फैक्टर बन सकता है। 

 

बच्चों के दिमाग के विकास पर असर

बच्चों का दिमाग जन्म के बाद तेजी से विकसित होता है और इस समय उन्हें असली दुनिया से सीखने की जरूरत होती है। जब बच्चा ज्यादा समय मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है, तो उसका ध्यान, भाषा सीखने की क्षमता और सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो सकता है। रिसर्च में यह भी बताया गया कि ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में फोकस कम होता है और वे लोगों से कम जुड़ पाते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञ छोटे बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने की सलाह देते हैं।

 

कितनी स्क्रीन टाइम को माना गया खतरनाक?

स्टडी के अनुसार, अगर बच्चा दिन में 2 घंटे या उससे ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताता है, तो जोखिम बढ़ सकता है। कुछ रिसर्च में यह भी पाया गया कि 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में ऑटिज्म जैसे लक्षण ज्यादा देखने को मिले। डॉक्टरों का कहना है कि 2 साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन बिल्कुल नहीं दिखानी चाहिए, जबकि बड़े बच्चों के लिए भी इसका समय सीमित होना जरूरी है। 

 

क्यों छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन ज्यादा नुकसानदायक?

छोटे बच्चों का दिमाग अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता, इसलिए वे स्क्रीन पर दिखने वाली चीजों को सही तरीके से समझ नहीं पाते। इससे उनकी सीखने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके अलावा, स्क्रीन देखने से बच्चे कम एक्टिव रहते हैं और उनका शारीरिक विकास भी धीमा हो सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि इस उम्र में बच्चों को ज्यादा से ज्यादा बातचीत, खेल और असली अनुभव की जरूरत होती है, न कि डिजिटल स्क्रीन की। 

 

माता-पिता की आदतें भी बन रही हैं वजह

कई बार बच्चे खुद मोबाइल नहीं मांगते, बल्कि माता-पिता ही उन्हें शांत रखने के लिए फोन दे देते हैं। धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है और बच्चा हर समय स्क्रीन पर निर्भर हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के सामने खुद मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करना भी गलत संदेश देता है। इसलिए जरूरी है कि माता-पिता खुद भी स्क्रीन टाइम कम करें और बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताएं।

 

ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण 

अगर बच्चा आंखों में आंख डालकर बात नहीं करता, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, या बहुत ज्यादा चुप या अलग-थलग रहता है, तो यह ऑटिज्म के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। इसके अलावा, भाषा विकास में देरी और बार-बार एक ही काम करना भी इसके लक्षण हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके। 

 

स्क्रीन टाइम कम करने के आसान तरीके 

बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने के लिए घर में कुछ आसान बदलाव किए जा सकते हैं। जैसे खाने के समय मोबाइल बिल्कुल न दें, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी रखें और बच्चों को आउटडोर खेल के लिए प्रेरित करें। इसके अलावा, किताबें, खिलौने और परिवार के साथ समय बिताना भी बच्चों के विकास के लिए बेहतर होता है। धीरे-धीरे यह आदत बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने में मदद करती है।

 

डॉक्टरों की सलाह

डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिन यानी जन्म से लेकर लगभग 2 साल तक का समय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान दिमाग तेजी से विकसित होता है और हर अनुभव का गहरा असर पड़ता है। इसलिए इस समय बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना और उन्हें वास्तविक दुनिया से जोड़ना बहुत जरूरी है। यही उनकी मानसिक और सामाजिक विकास की मजबूत नींव बनाता है। 

 

क्या मोबाइल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए?

विशेषज्ञ यह नहीं कहते कि मोबाइल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए, लेकिन इसका सही और सीमित इस्तेमाल जरूरी है। बड़े बच्चों के लिए भी स्क्रीन टाइम तय होना चाहिए और कंटेंट पर नजर रखनी चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि मोबाइल बच्चों के विकास का विकल्प नहीं बनना चाहिए, बल्कि सिर्फ एक सीमित साधन के रूप में इस्तेमाल होना चाहिए।

 

सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा

AIIMS की यह स्टडी एक चेतावनी की तरह है, जो बताती है कि छोटी-छोटी आदतें बच्चों के भविष्य पर बड़ा असर डाल सकती हैं। अगर समय रहते स्क्रीन टाइम को कंट्रोल किया जाए, तो कई समस्याओं से बचा जा सकता है। माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को सही माहौल दें, ताकि उनका मानसिक और शारीरिक विकास बेहतर तरीके से हो सके।