सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) ने अब स्कूलों में छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर बड़ा फैसला लिया है। बोर्ड ने सभी संबद्ध स्कूलों को निर्देश दिया है कि टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ को साल में कम से कम दो बार मेंटल हेल्थ ट्रेनिंग लेनी होगी। यह ट्रेनिंग सर्टिफाइड मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स की तरफ से दी जाएगी। इसका मकसद है कि टीचर्स और स्टाफ छात्रों में तनाव के शुरुआती संकेत पहचान सकें, उन्हें प्राथमिक मनोवैज्ञानिक मदद दे सकें और जरूरत पड़ने पर सही जगह रेफर कर सकें।

 

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के 25 जुलाई 2025 के एक जजमेंट के बाद आया है, जिसमें छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर गाइडलाइंस जारी की गई थीं। सीबीएसई ने 20 फरवरी 2026 को जारी सर्कुलर (ट्रेनिंग यूनिट/TRG-03/2026) में साफ कहा है कि आज के समय में पढ़ाई का दबाव बहुत ज्यादा है, इसलिए छात्रों की भावनात्मक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य पर सबको ध्यान देना होगा।

 

ट्रेनिंग में क्या-क्या सिखाया जाएगा?

 

  • सीबीएसई के सर्कुलर के मुताबिक, ट्रेनिंग में मुख्य रूप से ये टॉपिक्स शामिल होंगे:
  • साइकोलॉजिकल फर्स्ट एड (प्राथमिक मनोवैज्ञानिक मदद)
  • छात्रों में तनाव या परेशानी के वार्निंग साइन्स पहचानना
  • सेल्फ-हार्म या खुद को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में कैसे रिस्पॉन्स दें
  • जरूरत पड़ने पर सही जगह या प्रोफेशनल को रेफर करना

 

ट्रेनिंग के बाद टीचर्स, नॉन-टीचिंग स्टाफ और एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ को छात्रों से संवेदनशील, समावेशी और बिना भेदभाव के तरीके से बात करने की ट्रेनिंग मिलेगी। बोर्ड चाहता है कि स्कूल में ऐसा माहौल बने जहां हर बच्चा खुद को सुरक्षित, सम्मानित और सपोर्टेड महसूस करे।

 

अभिभावकों के लिए भी जागरूकता कार्यक्रम जरूरी

 

स्कूलों को अब अभिभावकों के लिए नियमित सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाने होंगे। इन प्रोग्राम्स में माता-पिता को बताया जाएगा कि बच्चों पर अनावश्यक पढ़ाई का दबाव न डालें। उन्हें छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को समझना सिखाया जाएगा। साथ ही, माता-पिता को तनाव के संकेत पहचानने और सहानुभूति से रिस्पॉन्स करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। सीबीएसई ने स्कूलों से कहा है कि छात्रों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम्स और रोजाना की पढ़ाई में मेंटल हेल्थ लिटरेसी, इमोशनल रेगुलेशन, लाइफ स्किल्स एजुकेशन और सपोर्ट सर्विसेज की जानकारी शामिल की जाए।

 

सोशल इमोशनल लर्निंग (SEL) को पढ़ाई का हिस्सा बनाना

 

बोर्ड ने 'सोशल इमोशनल लर्निंग' (SEL) पर खास जोर दिया है। SEL का मतलब है भावनाओं को समझना, खुद को मैनेज करना, दूसरों के साथ अच्छे रिश्ते बनाना और जिम्मेदार फैसले लेना। स्कूलों को SEL को रोजमर्रा की पढ़ाई में शामिल करना होगा।

 

इसके अलावा, खेल, कला, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट और अन्य को-करिकुलर एक्टिविटीज को बढ़ावा देना होगा। बोर्ड ने कहा है कि एग्जाम पैटर्न की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि छात्रों की पहचान सिर्फ मार्क्स और रैंक तक सीमित न रहे।

 

काउंसलिंग और रिकॉर्ड रखना अनिवार्य

 

स्कूलों को नियमित काउंसलिंग की व्यवस्था करनी होगी। पहले जनवरी 2026 में सीबीएसई ने निर्देश दिया था कि हर स्कूल में दो अलग-अलग भूमिकाओं वाले काउंसलर रखे जाएं – एक सोशियो-इमोशनल काउंसलर (काउंसलिंग एंड वेलनेस टीचर) और दूसरा करियर काउंसलर। हर 500 छात्रों पर एक काउंसलर अनिवार्य होगा। अब नए सर्कुलर में कहा गया है कि स्कूल अनॉनिमस रिकॉर्ड रखें। सालाना रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें वेलनेस इंटरवेंशंस, छात्र रेफरल्स, ट्रेनिंग सेशंस और मेंटल हेल्थ से जुड़ी एक्टिविटीज की संख्या बताई जाए।

 

यह फैसला क्यों जरूरी है?

 

आजकल छात्रों में तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं। बोर्ड एग्जाम का प्रेशर, कॉम्पिटिशन और सोशल मीडिया का असर बच्चों पर पड़ रहा है। कई मामलों में छात्र खुद को नुकसान पहुंचाने या सुसाइड जैसी चरम स्थिति तक पहुंच जाते हैं।

 

सीबीएसई का यह कदम छात्रों को सिर्फ पढ़ाई में नहीं, बल्कि ओवरऑल डेवलपमेंट में मदद करेगा। टीचर्स अगर ट्रेंड होंगे तो वे छात्रों की परेशानी जल्दी पकड़ सकेंगे और सही समय पर मदद पहुंचा सकेंगे। अभिभावक भी समझेंगे कि मार्क्स से ज्यादा बच्चे की खुशी और सेहत महत्वपूर्ण है।

 

स्कूलों पर क्या जिम्मेदारी आएगी?

 

  • सभी स्टाफ को साल में दो बार ट्रेनिंग दिलवाना
  • सर्टिफाइड प्रोफेशनल्स से ट्रेनिंग करवाना
  • अभिभावक मीटिंग्स में मेंटल हेल्थ पर चर्चा
  • SEL को क्लासरूम में लागू करना
  • एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज बढ़ाना
  • सालाना रिपोर्ट CBSE को सबमिट करना

 

बोर्ड ने स्कूलों से कहा है कि वे CBSE के ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कैपेसिटी बिल्डिंग प्रोग्राम्स में टीचर्स और स्टाफ को नामांकित करें। ये प्रोग्राम मेंटल हेल्थ और SEL पर फोकस करते हैं।

 

छात्रों और समाज पर क्या असर पड़ेगा?

 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ये नियम सख्ती से लागू हुए तो छात्रों की मेंटल हेल्थ में काफी सुधार आएगा। स्कूल सिर्फ पढ़ाई का केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि एक सुरक्षित जगह बनेंगे जहां बच्चे अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर सकेंगे।

 

सीबीएसई का यह प्रयास NEP 2020 की भावना के अनुरूप है, जो होलिस्टिक डेवलपमेंट पर जोर देता है। अगर स्कूल और अभिभावक मिलकर काम करेंगे तो आने वाली पीढ़ी ज्यादा मजबूत और खुशहाल होगी।