अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump एक बार फिर विवादों के बीच घिर गए हैं। इस बार मामला राजनीति का नहीं, बल्कि शेयर बाजार का है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों में दावा किया गया कि ट्रंप या उनके निवेश सलाहकारों ने साल 2026 के शुरुआती तीन महीनों में करीब 3700 शेयर सौदे किए। यानी औसतन हर दिन 40 से ज्यादा ट्रेड। इस खुलासे के बाद अमेरिका के बड़े निवेशकों से लेकर वॉल स्ट्रीट के दिग्गज तक हैरान हैं।
आखिर मामला क्या है?
ब्लूमबर्ग और कई अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जनवरी से मार्च 2026 के बीच ट्रंप से जुड़े खातों में हजारों खरीद-बिक्री के सौदे हुए। इन सौदों में टेक्नोलॉजी, फाइनेंस, मीडिया और एयरोस्पेस सेक्टर की बड़ी कंपनियों के शेयर शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया कि यह ट्रेडिंग गतिविधि इतनी ज्यादा थी कि कई अनुभवी बाजार विशेषज्ञों ने इसे किसी बड़े हेज फंड की तरह बताया। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि पिछली तिमाही में जहां करीब 380 ट्रेड दर्ज हुए थे, वहीं इस बार यह संख्या सीधे 3700 के पार पहुंच गई। यानी कुछ ही महीनों में ट्रेडिंग गतिविधि लगभग दस गुना बढ़ गई। इसी वजह से अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतनी तेजी से सौदे क्यों किए गए और इनके पीछे रणनीति क्या थी।
किन कंपनियों में हुआ बड़ा निवेश?
रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप से जुड़े खातों में जिन कंपनियों के शेयर खरीदे और बेचे गए, उनमें कई बड़ी अमेरिकी कंपनियां शामिल थीं। इनमें NVIDIA, Microsoft, Amazon, Meta, Boeing और Oracle जैसी दिग्गज कंपनियों के नाम सामने आए। दस्तावेजों के मुताबिक कई कंपनियों में कम से कम दस-दस लाख डॉलर तक के निवेश किए गए। इतना ही नहीं, फरवरी में माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेजन के शेयरों में करोड़ों डॉलर की हिस्सेदारी बेचने की भी जानकारी सामने आई। इससे यह बहस और तेज हो गई कि क्या राष्ट्रपति पद पर रहते हुए इस तरह की भारी ट्रेडिंग उचित मानी जा सकती है।
वॉल स्ट्रीट क्यों हुआ हैरान?
अमेरिका के बड़े निवेश विशेषज्ञों का कहना है कि किसी मौजूदा राष्ट्रपति के लिए इतनी बड़ी मात्रा में ट्रेडिंग करना बेहद असामान्य है। टटल कैपिटल मैनेजमेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू टटल ने कहा कि यह किसी इंसान की सामान्य निवेश गतिविधि नहीं लगती, बल्कि किसी बड़े एल्गोरिदम आधारित फंड जैसी दिखाई देती है। वहीं कई अन्य विशेषज्ञों ने भी माना कि उन्होंने अपने दशकों लंबे करियर में ऐसा मामला बहुत कम देखा है।
दरअसल अमेरिका में राष्ट्रपति के पास ऐसी कई गोपनीय जानकारियां होती हैं, जिनका असर सीधे बाजार पर पड़ सकता है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति या उनसे जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शेयर खरीदें या बेचें, तो लोगों के मन में इनसाइडर जानकारी के इस्तेमाल का शक पैदा होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि अब ट्रंप की ट्रेडिंग गतिविधियों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
क्या यह इनसाइडर ट्रेडिंग का मामला है?
फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक आरोप साबित नहीं हुआ है कि ट्रंप ने इनसाइडर जानकारी का इस्तेमाल किया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की ट्रेडिंग से बचना चाहिए, ताकि हितों के टकराव का सवाल ही न उठे। अमेरिका में पहले के कई राष्ट्रपति अपने निवेश को ब्लाइंड ट्रस्ट में डाल देते थे, ताकि उन पर किसी तरह का शक न हो। लेकिन ट्रंप पर पहले भी यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने राजनीति और अपने कारोबारी हितों को अलग नहीं रखा। इस बार भी आलोचकों का कहना है कि जिन कंपनियों में निवेश हुआ, उनमें से कई कंपनियां सीधे सरकारी नीतियों और फैसलों से प्रभावित होती हैं। ऐसे में यह मामला सिर्फ शेयर बाजार का नहीं, बल्कि नैतिकता और पारदर्शिता का भी बन जाता है।
ट्रंप की टीम ने क्या सफाई दी?
ट्रंप संगठन और व्हाइट हाउस की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया है। उनका कहना है कि ट्रंप की संपत्तियों का प्रबंधन स्वतंत्र वित्तीय संस्थाएं करती हैं और निवेश संबंधी फैसले स्वचालित प्रक्रियाओं के जरिए लिए जाते हैं। ट्रंप या उनके परिवार का इन सौदों में कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि चाहे फैसले किसी भी संस्था ने लिए हों, लेकिन जब खातों का मालिक देश का राष्ट्रपति हो, तब सवाल उठना लाजिमी है। खासतौर पर तब, जब उन्हीं कंपनियों से जुड़े सरकारी फैसले भी राष्ट्रपति के दफ्तर से निकल रहे हों।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप के कारोबारी लेन-देन चर्चा में आए हों। इससे पहले भी अमेरिकी बाजार में कुछ संदिग्ध ट्रेडिंग गतिविधियों को लेकर बहस छिड़ चुकी है। मार्च 2026 में ईरान तनाव से जुड़ी एक बड़ी खबर आने से ठीक पहले अमेरिकी बाजार में भारी खरीद-बिक्री हुई थी, जिसके बाद इनसाइडर ट्रेडिंग की आशंकाएं उठी थीं। हालांकि उस मामले में भी कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया, लेकिन लगातार ऐसे मामलों का सामने आना ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा रहा है। अमेरिकी एजेंसियां अब इन गतिविधियों पर और ज्यादा नजर रख सकती हैं।
आम निवेशकों के लिए क्या सबक?
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह दिखाया है कि शेयर बाजार सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि भरोसे का भी मामला है। जब बाजार में बड़े पदों पर बैठे लोगों की ट्रेडिंग चर्चा में आती है, तो छोटे निवेशकों का भरोसा डगमगाने लगता है। यही कारण है कि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में नेताओं और बड़े अधिकारियों की निवेश गतिविधियों को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं।
आम निवेशकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि बाजार में तेजी से होने वाली बड़ी खरीद-बिक्री हमेशा सामान्य नहीं होती। कई बार ऐसी खबरें बाजार की दिशा बदल देती हैं। इसलिए किसी भी चर्चा या अफवाह के आधार पर निवेश करने से बचना चाहिए और हमेशा लंबी अवधि की सोच के साथ ही बाजार में उतरना चाहिए।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल ट्रंप की ट्रेडिंग गतिविधियों को लेकर राजनीतिक और कारोबारी हलकों में बहस तेज हो गई है। अगर जांच एजेंसियों को किसी तरह की अनियमितता का संकेत मिलता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है। वहीं ट्रंप समर्थकों का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों द्वारा मुद्दा बनाया जा रहा है। लेकिन इतना तय है कि 90 दिनों में 3700 ट्रेड का खुलासा अमेरिका की राजनीति और वॉल स्ट्रीट दोनों में हलचल पैदा कर चुका है। आने वाले दिनों में यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है, क्योंकि सवाल सिर्फ शेयर खरीदने-बेचने का नहीं, बल्कि सत्ता, पारदर्शिता और भरोसे का है।









