15 फरवरी को महाशिवरात्रि है। इस दिन शिव भक्त की भक्ती देखने लायक होती है। इसी मौके पर आज हम आपको भगवान शिव और कुबेर से जुड़ी एक ऐसी कहानी बताएंगे जिससे आप यह जान सकेंगे कि कुबरे, शिव के सबसे बड़े भक्त कैसे बने। दरअसल, भारतीय पौराणिक कथाओं में केवल देवी और देवताओं की कहानियां ही नहीं हैं बल्कि वे मानव मन, मानव के अहंकार, लालसा और अंततः आत्मबोध की गहरी व्याख्या भी करती है। इन्हीं कथाओं में से एक है कुबेर की। जो धन के देवता हैं लेकिन उससे पहले उन्हें अपने ही अहंकार से संघर्ष करना पड़ा था। आज जो कहानी हम आपको बताने वाले हैं उससे आप समझ सकेंगे कि सच्ची भक्ति क्या होती है। मैं महान आत्मा हूं का भाव कैसे पतन की शुरुवात बनता है, इस कहानी के माध्यम से समझेंगे।

 

सद्गुरु ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि कुबेर यक्षों के राजा थे। यक्ष एक तरह की मध्यवर्ती जीवन श्रेणी मानी जाती है। न वे पूरी तरह इस लोक के होते हैं और न ही परलोक के। वे दोनों के बीच की एक अवस्था कही जा सकती है। कुबेर का राज्य लंका में था लेकिन समय बदला और रावण ने लंका पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। रावण ने कुबेर को उनके ही राज्य से निष्कासित कर दिया। जिसके बाद अपना साम्राज्य, अपना वैभव और अपने लोगों को खोकर कुबेर गहरे संकट में पड़ गए।

 

राज्य छीन जाने के बाद कुबेर के सामने अस्तित्व का प्रश्न उठ खड़ा हुआ। हताशा और पीड़ा के उस क्षण में उन्होंने भगवान शिव की शरण ली। शिव की शरण केवल पूजा तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन की आखिरी उम्मीद भी बन चुकी थी। कुबेर ने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ शिव की आराधना की और धीरे धीरे वे शिवभक्त बन गए। भगवान शिव करुणा के सागर थे। उन्होंने कुबेर की भक्ति और पीड़ा को जैसे ही देखा तो कुबेर को न सिर्फ नया राज्य दिया बल्कि उन्हें संसार का समस्त वैभव भी सौंप दिया। इसी क्षण से कुबेर धन के देवता कहलाए जाने लगे। तब से कुबेर धन, ऐश्वर्य और समृद्धि का पर्याय बन गए। संसार में जहां भी धन होता है वहां कुबेर की पूजा की जाती है और प्रार्थना की जाती है कि ये धन हमेशा बना रहे।

 

यहां से शुरू हुई थी समस्या

 

समस्या तब शुरू हुई जब कुबेर के पास अपार धन का गया। ऐसे में उनकी भक्ति का स्वरूप भी बदलने लगा। वे शिव को भारी भरकम भेंट चढ़ाने लगे। जैसे कि स्वर्ण, रत्न, अनगिनत संपत्तियां आदि। कुबेर को लगने लगा कि इतनी बड़ी बड़ी भेंट चढ़ाने वाला भक्त निश्चित ही महान होगा।

 

धीरे धीरे उनके मन में ये भाव घर करने लगा कि वे कोई साधारण भक्त नहीं, बल्कि महान भक्त हैं।

 

लेकिन शिव का स्वभाव अलग है। वे भौतिक वस्तुओं से परे हैं। वे न सोने चांदी में रुचि रखते हैं, न वैभव में। कहा जाता है कि शिव केवल भस्म विभूति को ही स्वीकार करते हैं। फिर भी कुबेर अपनी भेंटों के कारण स्वयं को। श्रेष्ठ समझने लगे। यही वो क्षण था जब भक्ति में अहंकार ने घर कर लिया।

 

एक दिन कुबेर शिव के पास गए। बोले...महादेव, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? मैं कुछ करना चाहता हूं, जिससे मेरी भक्ति सिद्ध हो। इसपर शिव मुस्कुराए और कहा... तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?

 

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मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है। मैं पूर्ण हूं। फिर उन्होंने अपने पुत्र गणपति की ओर इशारा करते हुए कहा, लेकिन ये बालक हमेशा भूखा रहता है। यदि तुम कुछ करना ही चाहते हो तो इसे अच्छे से भरपेट भोजन करा दो।

 

कुबेर को ये काम बहुत आसान लगा। उन्होंने सोचा कि भोजन कराना तो मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है। वे गणपति को अपने महल के आए और भव्य भोज की व्यवस्था कर दी। एक के बाद एक व्यंजन परोसे जाने लगे। गणपति भगवान खाते गए और खाते ही गए। जिसके बाद कुबेर को आश्चर्य होने लगा। उन्होंने और रसोइए बुलवाए और अधिक भोजन बनवाया। सैकड़ों रसोइए दिन रात भोजन पकाने लगे। जिसके बाद भी गणपति को भूख कम नहीं हुई।

 

घबराते हुए कुबेर ने कहा कि बस करो, इतना खाने से तुम्हारा पेट फट जाएगा। गणपति हंसते हुए बोले कि देखिए मेरे पेट पर नाग का पट्टा है जो मेरे पेट को संभल लेगा। मै तो भूखा हूं और आपने ही कहा था कि मेरी भूख का ध्यान रखेंगे।

 

धीरे धीरे कुबेर का सारा धन समाप्त हो गया। कहा जाता है कि उन्होंने दूसरे लोकों में भी दूत भेजे ताकि वहां से भोजन मंगवाया जा सके। लेकिन गणपति जी फिर भी तृप्त नहीं हुए।

 

जिसके बाद कुबेर समझ गए कि उनका सारा धन और वैभव शिव की धूल के बराबर भी नहीं है। जिसके बाद वे शिव के चरणों में गिर पड़े और कहा, प्रभु। मैने भूख कर दी। मैने ये कैसे सोच लिया कि मैं आपका महान भक्त हूं, क्योंकि मैं आपको बहुत कुछ समर्पित करता हूं। लेकिन सच तो ये है कि जो कुछ भी अब मेरे पास था वो सब आपने ही दिया था।

 

जिसके बाद बदल गया कुबेर का जीवन

 

उस दिन के बाद से कुबेर का जीवन एकदम बदल गया। वो विनम्र और कृतज्ञता से भर गया। उन्होंने ये जान लिया कि सच्ची भक्ति में 'मैं' शब्द नहीं आता।