मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला में 17 मई 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। सुबह करीब साढ़े छह बजे भोज उत्सव समिति की ओर से गर्भगृह में मां वाग्देवी के चित्र और प्रतीकात्मक स्वरूप की स्थापना पूरे वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के साथ की गई। जैसे ही गर्भगृह में मां वाग्देवी की स्थापना हुई, पूरा परिसर “जय मां सरस्वती” और “हर हर महादेव” के नारों से गूंज उठा। सालों से इस पल का इंतजार कर रहे श्रद्धालुओं की आंखों में खुशी और भावुकता साफ दिखाई दे रही थी। भोजशाला लंबे समय से धार्मिक और ऐतिहासिक विवाद का केंद्र रही है। लेकिन मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद पहली बार ऐसा माहौल बना जब हिंदू पक्ष ने इसे अपनी बड़ी जीत के रूप में देखा। कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना और हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिए जाने की बात कही। इसी फैसले के बाद रविवार सुबह भोजशाला परिसर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए।

 

सुबह से ही भक्ति में डूबा रहा पूरा परिसर

रविवार सुबह सूरज निकलने से पहले ही श्रद्धालुओं की भीड़ भोजशाला परिसर के बाहर जुटने लगी थी। महिलाएं सिर पर पूजा की थालियां लेकर पहुंचीं तो युवाओं और बुजुर्गों में भी अलग उत्साह दिखाई दिया। गर्भगृह को फूलों, दीपों और रंगोली से सजाया गया था। जैसे ही मां वाग्देवी के चित्र को गर्भगृह में स्थापित किया गया, शंखध्वनि और घंटियों की आवाज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। पूरे दिन यहां पूजा-अर्चना, हवन और धार्मिक कार्यक्रम चलते रहे। श्रद्धालुओं ने इसे सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक गौरव की वापसी बताया। कई लोग अपने परिवार के साथ यहां पहुंचे और इसे ऐतिहासिक क्षण बताया।

 

हाईकोर्ट के फैसले ने बदल दिया माहौल

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने 15 मई 2026 को भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग यानी एएसआई की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट को सही मानते हुए भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी का मंदिर माना। कोर्ट ने कहा कि यहां मिले स्थापत्य प्रमाण, संस्कृत शिलालेख, कमल, घंटियां और धार्मिक प्रतीक इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह स्थान हिंदू धार्मिक और शैक्षणिक परंपरा से जुड़ा रहा है। कोर्ट के इस फैसले के बाद हिंदू संगठनों और श्रद्धालुओं में खुशी की लहर दौड़ गई। भोज उत्सव समिति ने इसे “सदियों की प्रतीक्षा का अंत” बताया। वहीं मुस्लिम पक्ष ने फैसले पर असहमति भी जताई है, लेकिन प्रशासन ने पूरे मामले में शांति बनाए रखने की अपील की है।

 

आखिर क्या है भोजशाला का इतिहास?

भोजशाला का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका संबंध परमार वंश के राजा भोज से जोड़ा जाता है, जिन्हें विद्या, कला और संस्कृति का बड़ा संरक्षक माना जाता था। माना जाता है कि यहां संस्कृत शिक्षा दी जाती थी और मां सरस्वती की पूजा होती थी। यही कारण है कि हिंदू पक्ष इसे मां वाग्देवी का मंदिर मानता रहा है। वहीं समय के साथ इस परिसर का उपयोग कमाल मौला मस्जिद के रूप में भी होने लगा। इसी वजह से वर्षों से यहां धार्मिक अधिकारों को लेकर विवाद चलता रहा। पहले एएसआई की व्यवस्था के अनुसार हिंदुओं को मंगलवार और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी जाती थी। लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद स्थिति बदलती दिखाई दे रही है।

 

सुरक्षा व्यवस्था रही बेहद कड़ी

भोजशाला विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। धार शहर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। भोजशाला परिसर के आसपास बैरिकेडिंग की गई और हर आने-जाने वाले व्यक्ति पर नजर रखी गई। जिला प्रशासन लगातार हालात की निगरानी करता रहा ताकि किसी तरह की अफवाह या तनाव की स्थिति पैदा न हो। हालांकि भारी भीड़ के बावजूद पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। पुलिस अधिकारियों ने कहा कि लोगों ने संयम और समझदारी दिखाई, जिसकी वजह से माहौल पूरी तरह सामान्य बना रहा।

 

श्रद्धालुओं के लिए भावुक कर देने वाला पल

भोजशाला पहुंचे कई श्रद्धालुओं ने कहा कि उन्होंने वर्षों से इस दिन का इंतजार किया था। कुछ लोगों की आंखों में आंसू भी दिखाई दिए। उनका कहना था कि मां वाग्देवी की पुनर्स्थापना सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है। एक श्रद्धालु ने कहा कि यह सिर्फ मंदिर में तस्वीर स्थापित करने का कार्यक्रम नहीं बल्कि “आस्था की वापसी” है। वहीं महिलाओं ने मां सरस्वती के भजन गाए और पूरे परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा। सोशल मीडिया पर भी भोजशाला से जुड़े वीडियो और तस्वीरें तेजी से वायरल होते रहे।

 

राजनीति में भी तेज हुई चर्चा

भोजशाला का मामला हमेशा से राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील रहा है। हाईकोर्ट के फैसले और मां वाग्देवी की स्थापना के बाद प्रदेश की राजनीति में भी इस मुद्दे की चर्चा तेज हो गई है। कई हिंदू संगठनों और नेताओं ने फैसले का स्वागत किया है। वहीं विपक्षी दलों ने प्रशासन से शांति बनाए रखने और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी भोजशाला को लेकर सकारात्मक बयान दिए हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि भविष्य में मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस लाने की दिशा में भी प्रयास किए जा सकते हैं।

 

अयोध्या फैसले से भी की जा रही तुलना

कई कानूनी विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन भोजशाला फैसले की तुलना अयोध्या मामले से भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि अदालत ने यहां भी ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को काफी महत्व दिया। अदालत ने अपने फैसले में एएसआई सर्वे और ऐतिहासिक दस्तावेजों को आधार माना, ठीक वैसे ही जैसे अयोध्या मामले में पुरातात्विक तथ्यों पर जोर दिया गया था। इसी वजह से भोजशाला का यह मामला अब सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर में इसकी चर्चा हो रही है।

 

आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है महत्व

मां वाग्देवी की स्थापना के बाद अब भोजशाला को लेकर लोगों की भावनाएं और ज्यादा जुड़ती दिखाई दे रही हैं। आने वाले दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ सकती है। धार्मिक संगठनों ने इसे हिंदू संस्कृति और शिक्षा परंपरा का प्रतीक बताया है। धार की यह ऐतिहासिक भोजशाला अब फिर से राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन चुकी है। 17 मई 2026 की सुबह यहां जो दृश्य देखने को मिला, उसे वहां मौजूद लोग शायद कभी नहीं भूल पाएंगे। मां वाग्देवी की स्थापना ने इस ऐतिहासिक परिसर को एक बार फिर आस्था, इतिहास और संस्कृति के केंद्र में ला खड़ा किया है।