भारत अब सिर्फ मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामान का बड़ा बाजार बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि दुनिया के सामने खुद को टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर स्थापित करने की तैयारी में है। इसी दिशा में एक बड़ा कदम तब देखने को मिला जब टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और नीदरलैंड की दिग्गज कंपनी एएसएमएल के बीच सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को लेकर अहम समझौता हुआ। यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की मौजूदगी में हुआ, जिसने इस साझेदारी को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया। यह समझौता सिर्फ दो कंपनियों के बीच कारोबारी डील नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत के टेक्नोलॉजी भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर मोबाइल, ऑटोमोबाइल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कंप्यूटर और डिफेंस सेक्टर तक दिखाई दे सकता है।

 

आखिर सेमीकंडक्टर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

आज की दुनिया में लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस सेमीकंडक्टर चिप पर चलती है। चाहे स्मार्टफोन हो, लैपटॉप हो, कार हो या फिर आधुनिक मेडिकल मशीनें, हर जगह चिप की जरूरत पड़ती है। कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा था कि जब चिप की सप्लाई कम हुई तो कार से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री तक प्रभावित हो गई थी। भारत अभी तक बड़ी मात्रा में चिप आयात करता है। यानी हमें दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में अगर देश के भीतर ही सेमीकंडक्टर निर्माण शुरू होता है तो भारत की तकनीकी ताकत काफी बढ़ सकती है। यही वजह है कि सरकार पिछले कुछ वर्षों से सेमीकंडक्टर मिशन पर लगातार जोर दे रही है।

 

ASML कंपनी क्यों मानी जाती है खास?

दुनिया में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री की बात हो और एएसएमएल का नाम न आए, ऐसा लगभग नामुमकिन है। यह कंपनी लिथोग्राफी मशीन बनाती है, जिसे चिप निर्माण की सबसे अहम तकनीक माना जाता है। आसान भाषा में समझें तो यही मशीन चिप के भीतर बेहद छोटे सर्किट बनाने का काम करती है। दुनिया की बड़ी चिप कंपनियां एएसएमएल की तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। खास बात यह है कि एडवांस्ड चिप बनाने वाली मशीनों में एएसएमएल का लगभग दबदबा माना जाता है। यही कारण है कि टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ उसकी साझेदारी को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 

 

गुजरात के धोलेरा में बनेगा बड़ा फैब प्लांट

इस समझौते के तहत गुजरात के धोलेरा में भारत का पहला कमर्शियल तीन सौ मिलीमीटर सेमीकंडक्टर फैब लगाया जाएगा। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स इस परियोजना पर करीब ग्यारह अरब डॉलर यानी लगभग इक्यानवे हजार करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। यह फैब सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बाजार को ध्यान में रखकर तैयार किया जा रहा है। यहां बनने वाली चिप का इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, मोबाइल डिवाइस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दूसरे एडवांस्ड टेक्नोलॉजी सेक्टर में किया जाएगा। इससे भारत की पहचान सिर्फ सॉफ्टवेयर देश के रूप में नहीं बल्कि हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग ताकत के तौर पर भी बन सकती है।

 

प्रधानमंत्री मोदी ने क्यों बताया अहम कदम?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान पर जोर दे रहे हैं। सेमीकंडक्टर सेक्टर को भी सरकार ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी खुद इस समझौते के दौरान मौजूद रहे। सरकार का मानना है कि अगर भारत को भविष्य की टेक्नोलॉजी महाशक्ति बनना है तो चिप निर्माण में आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है। अभी तक अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश इस क्षेत्र में आगे रहे हैं। भारत अब उसी दिशा में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाना चाहता है। 

 

रोजगार और स्किल डेवलपमेंट को मिलेगा बढ़ावा

इस साझेदारी का एक बड़ा फायदा रोजगार के रूप में भी देखा जा रहा है। सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री सिर्फ इंजीनियरों तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें हजारों तकनीकी और गैर तकनीकी नौकरियां पैदा होती हैं। प्लांट बनने से स्थानीय युवाओं को ट्रेनिंग और रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। समझौते में यह भी कहा गया है कि दोनों कंपनियां स्थानीय प्रतिभाओं को ट्रेनिंग देने और रिसर्च डेवलपमेंट को मजबूत करने पर भी काम करेंगी। यानी भारत में नई पीढ़ी को एडवांस्ड चिप टेक्नोलॉजी सीखने का मौका मिलेगा। 

 

दुनिया की नजर अब भारत पर

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां चीन के अलावा दूसरे विकल्प तलाश रही हैं। ग्लोबल सप्लाई चेन को मजबूत बनाने के लिए कंपनियां अब भारत को गंभीरता से देखने लगी हैं। टाटा और एएसएमएल की साझेदारी इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत सरकार पहले ही सेमीकंडक्टर सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए अरबों डॉलर की सहायता योजना शुरू कर चुकी है और कई परियोजनाओं पर काम भी चल रहा है। इससे यह साफ है कि भारत सिर्फ बाजार नहीं बल्कि भविष्य का मैन्युफैक्चरिंग सेंटर बनने की कोशिश कर रहा है। अगर यह परियोजना सफल रहती है तो आने वाले समय में दूसरी वैश्विक कंपनियां भी भारत में निवेश बढ़ा सकती हैं।

 

लोगों के बीच भी दिख रहा उत्साह

सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी इस साझेदारी को लेकर काफी चर्चा हो रही है। कई लोग इसे भारत के टेक्नोलॉजी इतिहास का बड़ा मोड़ मान रहे हैं। रेडिट जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स ने कहा कि एएसएमएल जैसी कंपनी के साथ साझेदारी होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है क्योंकि एडवांस्ड लिथोग्राफी मशीनों में उसका दबदबा माना जाता है।  हालांकि कुछ लोगों ने चुनौतियों की तरफ भी ध्यान दिलाया। उनका कहना है कि सेमीकंडक्टर फैब चलाना आसान काम नहीं है। इसके लिए हाई लेवल रिसर्च, अनुभवी इंजीनियर, लगातार बिजली और मजबूत सप्लाई चेन की जरूरत होती है। 

 

चुनौतियां भी कम नहीं होंगी

सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री दुनिया की सबसे जटिल इंडस्ट्री में गिनी जाती है। एक छोटी सी चिप बनाने के लिए हजारों चरणों से गुजरना पड़ता है। इसके लिए अत्याधुनिक मशीनें, साफ-सुथरा वातावरण और बेहद प्रशिक्षित स्टाफ चाहिए होता है। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह इस स्तर का इकोसिस्टम कितनी तेजी से तैयार कर पाता है। इसके अलावा वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी काफी कठिन है क्योंकि ताइवान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया पहले से इस क्षेत्र में काफी आगे हैं। लेकिन जानकार मानते हैं कि शुरुआत करना सबसे जरूरी कदम होता है। अगर भारत लगातार निवेश और रिसर्च पर ध्यान देता है तो आने वाले वर्षों में वह इस क्षेत्र में मजबूत खिलाड़ी बन सकता है।

 

भारत के टेक्नोलॉजी भविष्य की नई शुरुआत

टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और एएसएमएल की साझेदारी को सिर्फ एक कारोबारी समझौते के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भारत के टेक्नोलॉजी भविष्य की नई शुरुआत माना जा रहा है। यह समझौता बताता है कि अब भारत हाई टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग में भी अपनी जगह बनाने के लिए गंभीर है। अगर धोलेरा फैब समय पर तैयार होकर सफलतापूर्वक काम शुरू कर देता है तो यह देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और टेक्नोलॉजी सेक्टर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया के बड़े सेमीकंडक्टर केंद्रों में शामिल हो पाएगा या नहीं, इसका जवाब भविष्य देगा, लेकिन इतना तय है कि यह कदम देश के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।