आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला देश में आम उत्पादन और प्रोसेसिंग का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां खासकर तोतापुरी आम की खेती बड़े पैमाने पर होती है, जिसका इस्तेमाल जूस और पल्प बनाने में होता है। लेकिन साल 2026 में यह पूरी ‘मैंगो इकॉनमी’ गंभीर संकट से गुजर रही है।
कम उत्पादन, खराब मौसम और सबसे अहम, पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव, इन सबने मिलकर इस पूरे सेक्टर को झकझोर दिया है। इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, निर्यात कारोबार और हजारों मजदूरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है।
भारत का मैंगो हब चित्तूर
चित्तूर जिला आम उत्पादन के लिहाज से देश के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। यहां हजारों हेक्टेयर में आम की खेती होती है और औसतन प्रति हेक्टेयर 10–12 टन तक उत्पादन होता है। यहां लगभग 47 बड़े प्रोसेसिंग यूनिट हैं, जो हर साल लाखों टन आम को पल्प में बदलते हैं। इस उद्योग का बड़ा हिस्सा निर्यात पर निर्भर है, खासकर खाड़ी देशों (Gulf countries) पर, जहां भारतीय आम पल्प की भारी मांग रहती है।
पश्चिम एशिया संकट का सीधा असर
इस समय सबसे बड़ी समस्या पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव है। इस वजह से दुबई, ओमान और अन्य खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 300 करोड़ रुपए का आम पल्प बंदरगाहों पर फंसा हुआ है और लगभग 1000 करोड़ रुपए का माल अनिश्चितता में है। स्थिति इतनी खराब है कि इस साल कई विदेशी खरीदारों ने नए ऑर्डर देने से भी मना कर दिया है, यानी जो बाजार इस उद्योग की रीढ़ था, वही अब सबसे बड़ा संकट बन गया है।
मौसम ने भी दिया झटका
इस साल आम के उत्पादन में भी भारी गिरावट देखने को मिल रही है। अचानक मौसम बदलाव, अनियमित बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव के कारण फूल और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के कई हिस्सों में आम उत्पादन 50–60% तक घट सकता है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है, क्योंकि कम उत्पादन का मतलब कम बिक्री और ज्यादा नुकसान है।
किसान दोहरी मार झेल रहे
चित्तूर के आम किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं।एक तरफ उत्पादन कम हुआ है, तो दूसरी तरफ जो फसल तैयार है, उसके खरीदार नहीं मिल रहे हैं। कई किसानों का कहना है कि पल्प फैक्ट्रियां पर्याप्त मात्रा में आम खरीद नहीं रही हैं, क्योंकि उनके पास पिछले साल का स्टॉक पहले से पड़ा हुआ है। इस वजह से बाजार में मांग घट गई है और कीमतें भी गिर रही हैं, जिससे किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है।
पल्प इंडस्ट्री भी संकट में
यह संकट सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है। चित्तूर की पल्प इंडस्ट्री, जो हर साल लाखों टन आम प्रोसेस करती है, वह भी भारी दबाव में है। निर्यात रुकने से फैक्ट्रियों में तैयार माल जमा हो गया है और नई खरीद नहीं हो पा रही है। कई यूनिट्स को उत्पादन घटाना पड़ा है, जिससे हजारों मजदूरों के रोजगार पर असर पड़ा है।
खाड़ी देशों पर ज्यादा निर्भरता बनी समस्या
इस संकट ने एक और बड़ी कमजोरी को उजागर किया है, खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता। चित्तूर का आम पल्प उद्योग मुख्य रूप से UAE, सऊदी अरब, ओमान जैसे देशों पर निर्भर है। जब इन देशों में संकट आया, तो पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो गई। यह दिखाता है कि अगर निर्यात बाजार सीमित हो, तो किसी भी वैश्विक संकट का असर बहुत गहरा हो सकता है।
सरकार से मदद की मांग
इस संकट के बीच उद्योग और किसान दोनों सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं। प्रोसेसर्स और एसोसिएशन्स ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और निर्यात को सामान्य करने के लिए कदम उठाएं। इसके अलावा, किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सब्सिडी जैसी योजनाओं को और मजबूत करने की मांग भी उठ रही है।
पुराने मुद्दे भी बने संकट की वजह
यह पहली बार नहीं है जब चित्तूर के आम किसानों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। पहले भी खराब मौसम, कीमतों में गिरावट और बाजार की अनिश्चितता जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। कभी ज्यादा उत्पादन होने पर कीमत गिर जाती है, तो कभी कम उत्पादन होने पर लागत बढ़ जाती है। ऐसे में किसान हमेशा जोखिम में रहते हैं और स्थिर आय नहीं मिल पाती।
समाधान क्या हो सकता है?
इस संकट से निकलने के लिए कई स्तर पर काम करने की जरूरत है। सबसे पहले, निर्यात के लिए नए बाजार खोजने होंगे, ताकि खाड़ी देशों पर निर्भरता कम हो सके। इसके अलावा, प्रोसेसिंग और स्टोरेज की बेहतर व्यवस्था करनी होगी, ताकि फसल खराब न हो और किसान को बेहतर दाम मिल सके। सरकार को भी किसानों के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम तैयार करना होगा, जिससे वे ऐसे संकटों से उबर सकें।
चित्तूर की मैंगो इकॉनमी इस समय एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। पश्चिम एशिया संकट, कम उत्पादन और बाजार की अनिश्चितता ने मिलकर इस पूरे सेक्टर को कमजोर कर दिया है। अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे कृषि और निर्यात तंत्र पर पड़ेगा। यह संकट एक चेतावनी भी है कि कृषि को सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं रखा जा सकता, इसके लिए मजबूत बाजार, विविध निर्यात और स्थिर नीति की भी उतनी ही जरूरत है।









