हॉरर फिल्मों का अपना एक अलग फैन बेस होता है। लोग डरने के लिए टिकट खरीदते हैं, थिएटर जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि फिल्म उन्हें सीट से उछलने पर मजबूर कर देगी। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि फिल्म डराने के बजाय दर्शकों को बोर कर देती है। विक्रम भट्ट की नई फिल्म ‘Haunted 3D: Echoes of the Past’ कुछ ऐसी ही फिल्मों की लिस्ट में शामिल होती नजर आती है।
इस फिल्म को लेकर काफी चर्चा थी क्योंकि इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही विक्रम भट्ट का नाम भी इससे जुड़ा हुआ है, जिन्होंने पहले कई हॉरर फिल्में बनाई हैं। लेकिन रिलीज के बाद जो रिएक्शन सामने आए हैं, वे फिल्म मेकर्स के लिए ज्यादा अच्छे नहीं कहे जा सकते। कई समीक्षकों का मानना है कि यह फिल्म एक अच्छे आइडिया को बेहद कमजोर तरीके से पेश करने का उदाहरण बन गई है।
कहानी में दम दिखाने की कोशिश, लेकिन असर नहीं
फिल्म की कहानी एक पुराने रहस्य, भूतिया घटनाओं और अतीत के राज के इर्द-गिर्द घूमती है। शुरुआत में ऐसा लगता है कि कहानी कुछ नया करने वाली है। पुराने बंगले, रहस्यमयी आवाजें और अजीब घटनाएं दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ाती हैं।
लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कहानी उलझती चली जाती है। कई सीन ऐसे लगते हैं जिनका आपस में कोई मजबूत कनेक्शन नहीं है। दर्शक यह समझने की कोशिश करते रह जाते हैं कि आखिर फिल्म उन्हें किस दिशा में ले जाना चाहती है। यही वजह है कि शुरुआती उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगता है।
हॉरर कम, कन्फ्यूजन ज्यादा
किसी भी हॉरर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका माहौल होता है। अगर माहौल सही बन जाए तो साधारण कहानी भी दर्शकों को बांधे रख सकती है। लेकिन इस फिल्म में यही चीज सबसे ज्यादा कमजोर नजर आती है।
कई जगह डर पैदा करने की कोशिश तो की गई है, लेकिन ज्यादातर सीन पहले से अनुमान लगाने लायक लगते हैं। अचानक तेज आवाज, अंधेरा कमरा और अचानक सामने आता चेहरा जैसे पुराने फॉर्मूले बार-बार इस्तेमाल किए गए हैं। आज के दर्शक इन चीजों को कई बार देख चुके हैं, इसलिए उनका असर बहुत कम दिखाई देता है। फिल्म खत्म होने के बाद शायद ही कोई ऐसा सीन हो जो लंबे समय तक याद रह जाए।
AI का नाम ज्यादा, असर कम
फिल्म की सबसे बड़ी चर्चा AI को लेकर थी। प्रचार में यह बताया गया कि फिल्म में AI तकनीक का इस्तेमाल किया गया है और इससे दर्शकों को नया अनुभव मिलेगा।
लेकिन स्क्रीन पर इसका असर उतना खास नजर नहीं आता। कई जगह विजुअल्स कृत्रिम लगते हैं और कुछ सीन तो ऐसे महसूस होते हैं जैसे तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ दिखावे के लिए किया गया हो। दर्शकों को कहानी और भावनाओं से जोड़ने के बजाय तकनीक खुद ही केंद्र में आ जाती है। यही वजह है कि AI का प्रयोग फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनने के बजाय उसकी सबसे बड़ी कमजोरी में बदलता दिखाई देता है।
एक्टिंग भी नहीं छोड़ पाई छाप
किसी कमजोर कहानी को कलाकारों की दमदार एक्टिंग कई बार संभाल लेती है। लेकिन यहां वह भी होता नजर नहीं आता। फिल्म के कई किरदार अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाते। संवाद बोलते समय भावनाओं की कमी महसूस होती है और कुछ सीन जरूरत से ज्यादा बनावटी लगते हैं। हॉरर फिल्मों में दर्शकों का किरदारों से जुड़ना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि तभी उनके साथ होने वाली घटनाएं असर डालती हैं। लेकिन यहां दर्शक और किरदारों के बीच वह कनेक्शन बन ही नहीं पाता।
विक्रम भट्ट से ज्यादा उम्मीद थी
विक्रम भट्ट का नाम सुनते ही लोगों को ‘राज’, ‘1920’, ‘हॉन्टेड’ जैसी कई फिल्में याद आ जाती हैं। उन्होंने भारतीय हॉरर सिनेमा को कई यादगार फिल्में दी हैं। इसी वजह से इस फिल्म से भी उम्मीदें काफी ज्यादा थीं। लेकिन फिल्म देखकर लगता है कि पुरानी फिल्मों वाली पकड़ यहां कहीं नजर नहीं आती। ऐसा महसूस होता है कि कहानी, स्क्रीनप्ले और निर्देशन पर उतनी मेहनत नहीं की गई जितनी की जानी चाहिए थी। कई दर्शकों को यह भी लग सकता है कि फिल्म जल्दबाजी में बनाई गई है और इसे बेहतर बनाने के लिए जरूरी समय नहीं दिया गया।
विजुअल्स और तकनीक भी नहीं बचा पाए
फिल्म में कुछ जगह विजुअल इफेक्ट्स अच्छे दिखाई देते हैं, लेकिन केवल इफेक्ट्स के दम पर कोई फिल्म सफल नहीं हो सकती। जब कहानी कमजोर हो और किरदार असर न छोड़ पाएं, तब शानदार तकनीक भी ज्यादा मदद नहीं कर पाती। यही इस फिल्म के साथ भी होता दिखाई देता है। कुछ सीन देखने में अच्छे लगते हैं, लेकिन वे भावनात्मक या डरावना प्रभाव नहीं छोड़ पाते। दर्शकों को सिर्फ अच्छे ग्राफिक्स नहीं चाहिए, उन्हें एक ऐसा अनुभव चाहिए जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में बना रहे।
सोशल मीडिया पर भी मिले मिले-जुले रिएक्शन
फिल्म रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कुछ लोगों ने नए प्रयोग की तारीफ की, लेकिन बड़ी संख्या में दर्शकों ने कहानी और स्क्रीनप्ले को कमजोर बताया।
कई यूजर्स का कहना था कि फिल्म का कॉन्सेप्ट दिलचस्प था, लेकिन उसे सही तरीके से पेश नहीं किया गया। कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि फिल्म डराने से ज्यादा थका देती है। हालांकि हर फिल्म की तरह इसके भी कुछ दर्शक जरूर हैं जिन्हें यह पसंद आई, लेकिन कुल मिलाकर प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं दिखी।
हॉरर फिल्मों के लिए बड़ा सबक
यह फिल्म एक बात जरूर साबित करती है कि केवल नई तकनीक जोड़ देने से कोई फिल्म बेहतर नहीं बन जाती। चाहे AI हो, VFX हो या कोई दूसरी आधुनिक तकनीक, आखिर में दर्शक अच्छी कहानी और मजबूत किरदार ही देखना चाहते हैं। अगर कहानी कमजोर होगी तो सबसे आधुनिक तकनीक भी फिल्म को नहीं बचा पाएगी। वहीं अगर कहानी दमदार हो तो सीमित संसाधनों में बनी फिल्म भी दर्शकों का दिल जीत सकती है।
हमारी राय
‘Haunted 3D: Echoes of the Past’ एक ऐसे आइडिया की मिसाल है जिसमें संभावना तो काफी थी, लेकिन उसे सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया। फिल्म में हॉरर का माहौल कमजोर पड़ता है, कहानी दर्शकों को पूरी तरह बांध नहीं पाती और AI का इस्तेमाल भी उम्मीद के मुताबिक असर नहीं छोड़ता। यह फिल्म उन ऑडियंस को निराश कर सकती है जो एक मजबूत हॉरर अनुभव की उम्मीद लेकर थिएटर पहुंचते हैं। अगर आप सिर्फ तकनीक का प्रयोग देखने के लिए उत्सुक हैं तो एक बार इसे देख सकते हैं, लेकिन अगर आप सच में डराने वाली और लंबे समय तक याद रहने वाली हॉरर फिल्म चाहते हैं, तो शायद यह फिल्म आपकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरेगी।









