भारत दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म बनाने वाले देशों में से एक है। हर साल यहां हिंदी समेत तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और कई दूसरी भाषाओं में बड़ी संख्या में फिल्में रिलीज होती हैं। भारतीय फिल्मों की पॉपुलरिटी सिर्फ देश तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में भी कई फिल्में शानदार कमाई करती हैं। लेकिन इसके बावजूद भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सामने एक बड़ी समस्या है और वह है सिनेमा स्क्रीन की कमी। यानी फिल्में तो बहुत बन रही हैं, दर्शक भी हैं, लेकिन उन्हें बड़े पर्दे तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त थिएटर नहीं हैं। यही वजह है कि कई फिल्मों की कमाई उनकी असली क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। 

 

भारत में आखिर कितने सिनेमा स्क्रीन हैं?

भारत की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन इसके मुकाबले देश में सिनेमाघरों की संख्या काफी कम है। उपलब्ध इंडस्ट्री आंकड़ों के अनुसार भारत में स्क्रीन डेंसिटी दुनिया के कई बड़े देशों की तुलना में काफी कम है। चीन और अमेरिका जैसे देशों में थिएटर नेटवर्क भारत से काफी बड़ा है।

यही वजह है कि वहां फिल्मों को ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने का मौका मिलता है। भारत में एक समय सिंगल स्क्रीन थिएटरों की संख्या बहुत ज्यादा थी। 1990 के दशक में देशभर में हजारों सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ इनमें से बड़ी संख्या बंद हो गई। 

 

सिंगल स्क्रीन थिएटर क्यों बंद होते गए?

एक दौर था जब फिल्म देखने का मतलब होता था परिवार के साथ सिनेमा हॉल जाना। छोटे शहरों और कस्बों में सिंगल स्क्रीन थिएटर मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन थे। लेकिन धीरे-धीरे कई वजहों से इन पर मुश्किलें आने लगीं:

1. मल्टीप्लेक्स कल्चर

बड़े शहरों में मल्टीप्लेक्स बढ़ने लगे। बेहतर सीटिंग, ज्यादा स्क्रीन और प्रीमियम अनुभव की वजह से दर्शक मल्टीप्लेक्स की तरफ जाने लगे। लेकिन मल्टीप्लेक्स ज्यादातर बड़े शहरों तक सीमित रहे। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में थिएटर की पहुंच कम होती गई। 

2. बढ़ते खर्च

सिंगल स्क्रीन थिएटर चलाना आसान नहीं रहा। बिजली, मेंटेनेंस, प्रोजेक्टर, स्टाफ और अन्य खर्च लगातार बढ़ते गए। कम दर्शक आने की वजह से कई थिएटर मालिकों के लिए इन्हें चलाना मुश्किल हो गया।

3. OTT प्लेटफॉर्म का बढ़ता असर

आज फिल्मों और वेब सीरीज के लिए लोगों के पास घर बैठे कई विकल्प हैं। Netflix, Amazon Prime Video जैसे OTT प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन देखने का तरीका बदल दिया है। कई दर्शक अब फिल्म के थिएटर रिलीज के कुछ समय बाद OTT पर आने का इंतजार करते हैं।

 

कम स्क्रीन का असर फिल्मों की कमाई पर कैसे पड़ता है?

किसी भी फिल्म की कमाई काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितने स्क्रीन पर रिलीज हो रही है। अगर किसी बड़ी फिल्म को ज्यादा स्क्रीन मिलती हैं तो ज्यादा लोग उसे देख पाते हैं और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बढ़ता है। लेकिन भारत में स्क्रीन कम होने की वजह से कई फिल्मों को सीमित जगह मिलती है। इससे अच्छी फिल्मों को भी दर्शकों तक पहुंचने में परेशानी होती है। यही वजह है कि कई भारतीय फिल्में विदेशों में शानदार प्रदर्शन करती हैं क्योंकि वहां उन्हें ज्यादा स्क्रीन और ज्यादा दर्शक मिल जाते हैं। 

 

आमिर खान और शाहरुख खान ने भी उठाया मुद्दा

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने भी कई बार भारत में कम स्क्रीन की समस्या पर बात की है। उनका कहना रहा है कि भारत जैसे बड़े देश में सिनेमाघरों की संख्या काफी कम है, जिससे फिल्म इंडस्ट्री की कमाई की क्षमता प्रभावित होती है। 

शाहरुख खान ने भी छोटे शहरों और आम दर्शकों तक सिनेमा की पहुंच बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। फिल्म इंडस्ट्री के लोगों का मानना है कि अगर ज्यादा थिएटर होंगे तो सिर्फ बड़े सितारों की फिल्में नहीं बल्कि छोटे बजट और अच्छी कहानियों वाली फिल्मों को भी फायदा मिलेगा।

 

चीन और अमेरिका आगे क्यों हैं?

चीन ने पिछले कुछ सालों में तेजी से अपने थिएटर नेटवर्क का विस्तार किया। वहां स्क्रीन की संख्या भारत से कई गुना ज्यादा है। ज्यादा स्क्रीन का मतलब है कि एक फिल्म ज्यादा शहरों और ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती है। यही वजह है कि कई बार भारतीय फिल्मों की विदेशों में कमाई बहुत अच्छी हो जाती है। उदाहरण के तौर पर दंगल ने चीन में शानदार प्रदर्शन किया था।

 

सिर्फ स्क्रीन की कमी ही समस्या नहीं 

हालांकि थिएटर की कमी एक बड़ी वजह है, लेकिन इसके अलावा कुछ और कारण भी हैं।

  • टिकट की बढ़ती कीमतें
  • खाने-पीने की चीजों का महंगा होना
  • कमजोर कंटेंट वाली फिल्मों की संख्या
  • दर्शकों की बदलती पसंद

इन वजहों से भी लोग बार-बार थिएटर जाने से बचते हैं।आज दर्शक सिर्फ बड़ी फिल्म या बड़े स्टार के लिए थिएटर जाना पसंद करता है।

 

सरकार क्या कर रही है?

भारत सरकार भी इस समस्या को पहचान रही है। सिनेमा स्क्रीन की कमी दूर करने के लिए नियमों को आसान बनाने और नए थिएटर खोलने की प्रक्रिया को सरल करने पर काम किया जा रहा है। मकसद यह है कि छोटे शहरों और ऐसे इलाकों में भी सिनेमाघर बढ़ें जहां अभी इसकी पहुंच कम है।

 

भविष्य में क्या बदल सकता है?

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के पास दर्शकों की कमी नहीं है। भारत में फिल्मों को लेकर लोगों का जुनून आज भी कायम है। जरूरत है कि थिएटर नेटवर्क बढ़ाया जाए, टिकट को ज्यादा लोगों की पहुंच में रखा जाए और छोटे शहरों तक सिनेमा पहुंचाया जाए। अगर स्क्रीन की संख्या बढ़ती है तो इसका फायदा सिर्फ बड़े प्रोडक्शन हाउस को नहीं बल्कि छोटे फिल्म निर्माताओं, कलाकारों और दर्शकों सभी को मिलेगा।

 

हमारी राय 

भारत में सिनेमा का संकट फिल्मों की कमी का नहीं बल्कि उन्हें दिखाने के प्लेटफॉर्म की कमी का है। एक तरफ देश में हर साल सैकड़ों फिल्में बनती हैं, वहीं दूसरी तरफ थिएटर स्क्रीन की संख्या सीमित है। सिंगल स्क्रीन थिएटरों का बंद होना, OTT का बढ़ना और बढ़ते खर्च ने इस समस्या को और बढ़ाया है। आने वाले समय में अगर भारत को अपनी फिल्म इंडस्ट्री की पूरी क्षमता हासिल करनी है तो ज्यादा से ज्यादा सिनेमाघरों और सस्ती थिएटर सुविधाओं की जरूरत होगी।