गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों के चेहरे पर खुशी आ जाती है। न स्कूल जाने की चिंता, न होमवर्क का दबाव और न सुबह जल्दी उठने की टेंशन। लेकिन छुट्टियों के साथ एक नई समस्या भी घरों में दिखाई देने लगती है। बच्चे घंटों मोबाइल, टैबलेट, टीवी या वीडियो गेम में व्यस्त हो जाते हैं। कई बार माता-पिता को लगता है कि बच्चा घर में सुरक्षित है, इसलिए मोबाइल देखने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन जब यह आदत धीरे-धीरे पूरे दिन का हिस्सा बन जाती है, तब परेशानी शुरू होती है। 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की आंखों, नींद, शारीरिक गतिविधियों और सामाजिक व्यवहार पर असर डाल सकता है। यही वजह है कि छुट्टियों के दौरान बच्चों के स्क्रीन टाइम को संतुलित रखना बेहद जरूरी माना जाता है। 

 

छुट्टियों में क्यों बढ़ जाता है स्क्रीन टाइम?

स्कूल खुला रहता है तो बच्चों का अधिकतर समय पढ़ाई, दोस्तों और अन्य गतिविधियों में निकल जाता है। लेकिन छुट्टियों में अचानक उनके पास काफी खाली समय आ जाता है। बाहर तेज धूप होने की वजह से कई परिवार बच्चों को लंबे समय तक बाहर खेलने भी नहीं भेजते। ऐसे में मोबाइल और टीवी उनके लिए सबसे आसान मनोरंजन बन जाते हैं। 

समस्या तब बढ़ती है जब बच्चे एक वीडियो के बाद दूसरा और फिर तीसरा वीडियो देखने लगते हैं। सोशल मीडिया, गेम्स और वीडियो प्लेटफॉर्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि बच्चे ज्यादा समय तक उनसे जुड़े रहें। धीरे-धीरे यह आदत में बदल सकता है।

 

जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम का क्या असर पड़ सकता है?

हाल में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार कई घंटों तक मोबाइल या टीवी देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है, शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और नींद का पैटर्न भी प्रभावित हो सकता है। 

इसके अलावा जब बच्चे पूरा दिन स्क्रीन पर बिताते हैं तो उनका ध्यान किताबों, खेलकूद और परिवार के साथ बातचीत जैसी गतिविधियों से हटने लगता है। इससे उनका सामाजिक और भावनात्मक विकास भी प्रभावित हो सकता है।

 

स्क्रीन टाइम पूरी तरह बंद करना समाधान नहीं

कई माता-पिता गुस्से में बच्चों से मोबाइल छीन लेते हैं या टीवी देखने पर पूरी तरह रोक लगा देते हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तरीका हमेशा कारगर नहीं होता। आज के दौर में डिजिटल डिवाइस पूरी तरह खत्म करना संभव भी नहीं है। असल जरूरत संतुलन बनाने की है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि मोबाइल और टीवी मनोरंजन का साधन हैं, लेकिन पूरी जिंदगी नहीं। इसलिए स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना ज्यादा प्रभावी तरीका माना जाता है। 

 

समय सीमा तय करना सबसे पहला कदम

अगर बच्चा सुबह से रात तक मोबाइल मांगता रहता है तो सबसे पहले स्क्रीन इस्तेमाल करने का एक तय समय बनाइए। उदाहरण के तौर पर दिन में एक या दो घंटे का समय निर्धारित किया जा सकता है। जब नियम पहले से तय होते हैं तो बच्चों को भी समझ आ जाता है कि उन्हें कब मोबाइल मिलेगा और कब नहीं। कई अभिभावकों ने ऑनलाइन चर्चा में भी बताया कि उन्होंने ‘पहले काम, फिर स्क्रीन’ का नियम अपनाया। यानी पढ़ाई, पढ़ने की आदत, खेलकूद या घर के छोटे काम पूरे होने के बाद ही स्क्रीन टाइम दिया जाता है। 

 

बच्चों को आउटडोर गतिविधियों से जोड़ें

जितना ज्यादा बच्चा खाली रहेगा, उतनी ही ज्यादा उसकी रुचि मोबाइल में होगी। इसलिए छुट्टियों में उसे किसी न किसी शारीरिक गतिविधि में शामिल करना जरूरी है। पार्क में घूमना, साइकिल चलाना, क्रिकेट खेलना, बैडमिंटन या स्विमिंग जैसी गतिविधियां बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने में मदद करती हैं। शारीरिक गतिविधियां सिर्फ स्क्रीन टाइम कम नहीं करतीं बल्कि बच्चों की फिटनेस और आत्मविश्वास भी बढ़ाती हैं।

 

घर के अंदर भी हैं कई विकल्प

हर समय बाहर खेलना संभव नहीं होता, खासकर तब जब तापमान बहुत ज्यादा हो। ऐसे में बच्चों को घर के अंदर रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखा जा सकता है। ड्राइंग, पेंटिंग, कहानी की किताबें पढ़ना, पजल्स सुलझाना, क्राफ्ट बनाना, संगीत सीखना या डायरी लिखना जैसी गतिविधियां बच्चों की रचनात्मकता बढ़ाती हैं और उन्हें मोबाइल से दूर रखती हैं। कई माता-पिता का अनुभव है कि जब बच्चों को हाथों से कुछ बनाने या सीखने का मौका मिलता है तो उनका स्क्रीन पर बिताया समय अपने आप कम होने लगता है। 

 

परिवार के साथ बिताया गया समय भी जरूरी

आजकल कई परिवारों में ऐसा देखने को मिलता है कि बच्चे मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं और बड़े अपने फोन में। ऐसे माहौल में बच्चों से स्क्रीन टाइम कम करने की उम्मीद करना मुश्किल हो जाता है। अगर परिवार साथ बैठकर बोर्ड गेम खेले, कहानियां सुनाए, बातचीत करे या किसी सामूहिक गतिविधि में हिस्सा ले तो बच्चों का ध्यान स्क्रीन से हट सकता है। विशेषज्ञ भी परिवार के साथ स्क्रीन-फ्री समय बिताने की सलाह देते हैं। 

 

माता-पिता को भी बनना होगा उदाहरण

बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। अगर माता-पिता हर समय मोबाइल पर रहेंगे तो बच्चा भी वैसा ही करेगा। इसलिए बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करने से पहले बड़ों को अपनी डिजिटल आदतों पर भी ध्यान देना होगा। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता भी फोन छोड़कर किताब पढ़ रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं या किसी अन्य गतिविधि में व्यस्त हैं, तो वह भी उसी व्यवहार को अपनाने की कोशिश करता है।

 

धीरे-धीरे करें बदलाव

स्क्रीन टाइम कम करने की कोशिश एक दिन में सफल नहीं होती। अगर बच्चा अचानक रोज छह घंटे मोबाइल चलाता है और आप उसे सीधे एक घंटे पर ले आएं, तो विरोध होना स्वाभाविक है।

बेहतर तरीका यह है कि धीरे-धीरे समय कम किया जाए। पहले आधा घंटा घटाइए, फिर कुछ दिनों बाद और कम कीजिए। इससे बच्चा नए नियमों को आसानी से स्वीकार कर पाता है। कई अभिभावकों ने भी यही रणनीति सबसे प्रभावी बताई है। 

 

हमारी राय

गर्मी की छुट्टियां बच्चों के लिए सिर्फ आराम करने का समय नहीं बल्कि नई चीजें सीखने और यादगार अनुभव बनाने का मौका भी होती हैं। अगर पूरा समय मोबाइल और टीवी में निकल जाए तो छुट्टियों का असली मकसद कहीं न कहीं खो जाता है। स्क्रीन टाइम को पूरी तरह खत्म करने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसे नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। सही रूटीन, आउटडोर खेल, रचनात्मक गतिविधियां और परिवार के साथ बिताया गया समय बच्चों को डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकता है। यही संतुलन उन्हें स्वस्थ, सक्रिय और खुशहाल बनाए रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।