देशभर में लोग गर्मी से परेशान हैं और मॉनसून का इंतजार कर रहे हैं। आमतौर पर जून की शुरुआत तक केरल में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून दस्तक दे देता है, लेकिन इस बार मॉनसून की रफ्तार उम्मीद से धीमी नजर आ रही है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पीछे सिर्फ एक वजह नहीं बल्कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में बन रही कई मौसमीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं।
दरअसल, 2026 का मॉनसून मौसम विभाग और जलवायु विशेषज्ञों के लिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है। पहले अनुमान लगाया गया था कि मॉनसून सामान्य समय से पहले आ सकता है, लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं और इसकी प्रगति धीमी पड़ गई। इसका असर सिर्फ बारिश पर नहीं बल्कि खेती, जल भंडारण और आम लोगों की दिनचर्या पर भी पड़ सकता है।
आखिर मॉनसून के लेट होने का क्या मतलब है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मॉनसून का ‘लेट’ होना हमेशा यह नहीं बताता कि पूरे सीजन में कम बारिश होगी। मॉनसून केरल में देर से पहुंचे और बाद में तेजी से आगे बढ़ जाए, ऐसा भी कई बार हो चुका है।
हालांकि इस बार मौसम विभाग ने माना है कि मॉनसून के आधिकारिक आगमन के लिए जरूरी सभी परिस्थितियां अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई हैं। केरल में कुछ इलाकों में बारिश जरूर हुई है, लेकिन व्यापक बारिश, पर्याप्त बादल और ऊपरी स्तर की मजबूत हवाएं अभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हुई हैं।
हिंद महासागर में क्या हो रहा है?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार हिंद महासागर के ऊपर बनने वाली कुछ महत्वपूर्ण वायुमंडलीय गतिविधियां सामान्य तरीके से विकसित नहीं हुईं। मॉनसून को आगे बढ़ाने के लिए समुद्र की सतह का तापमान, हवा की दिशा और नमी की मात्रा बेहद अहम होती है।
जब अरब सागर और हिंद महासागर से पर्याप्त नमी वाली हवाएं भारतीय तटों की ओर नहीं बढ़ पातीं, तब मॉनसून की गति धीमी हो जाती है। इस साल यही स्थिति कुछ समय के लिए देखने को मिली, जिससे मॉनसून के आगे बढ़ने की प्रक्रिया प्रभावित हुई। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री तापमान में मामूली बदलाव भी हजारों किलोमीटर तक मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।
ऊपरी स्तर की हवाएं क्यों बनीं परेशानी?
मॉनसून केवल बारिश का नाम नहीं है, बल्कि यह हवाओं की एक जटिल प्रणाली है। इसके लिए निचले स्तर की नमी वाली हवाओं के साथ-साथ ऊपरी वायुमंडल में भी अनुकूल परिस्थितियां जरूरी होती हैं।
इस बार भारतीय मौसम विभाग ने बताया कि मॉनसून को मजबूती देने वाली ऊपरी स्तर की तेज हवाएं अपेक्षित ताकत नहीं दिखा रही थीं। यही वजह रही कि मॉनसून की आधिकारिक घोषणा में देरी हुई। विशेषज्ञों के अनुसार जब तक ये हवाएं पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं होतीं, तब तक मॉनसून की प्रगति धीमी रह सकती है।
एल नीनो का खतरा भी बढ़ा रहा है चिंता
मौसम वैज्ञानिक इस साल एल नीनो की संभावनाओं पर भी नजर बनाए हुए हैं। एल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है।
विश्व मौसम संगठन (WMO) ने जून से अगस्त 2026 के बीच एल नीनो बनने की संभावना काफी अधिक बताई है। भारत के लिए यह चिंता की बात इसलिए है क्योंकि कई बार एल नीनो के दौरान मॉनसून कमजोर पड़ जाता है या बारिश का वितरण असंतुलित हो जाता है। हालांकि मौसम विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सिर्फ एल नीनो के आधार पर पूरे मॉनसून का आकलन नहीं किया जा सकता। कई अन्य समुद्री और वायुमंडलीय कारक भी इसकी दिशा तय करते हैं।
IMD ने क्या कहा है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) लगातार मॉनसून की स्थिति पर नजर रख रहा है। विभाग का कहना है कि मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां धीरे-धीरे अनुकूल हो रही हैं और जून के शुरुआती दिनों में इसके और क्षेत्रों में पहुंचने की संभावना है।
IMD की लंबी अवधि की भविष्यवाणी के अनुसार 2026 में देश में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका जताई गई है। विभाग ने अनुमान लगाया है कि इस बार मॉनसून दीर्घकालिक औसत का लगभग 92 प्रतिशत रह सकता है। यानी मॉनसून पूरी तरह कमजोर होगा, ऐसा नहीं कहा जा रहा, लेकिन बारिश सामान्य से कुछ कम रहने की संभावना जरूर व्यक्त की गई है।
किसानों की चिंता क्यों बढ़ी?
भारत की लगभग आधी कृषि अब भी मॉनसून पर निर्भर है। ऐसे में मॉनसून की शुरुआत में देरी किसानों की चिंता बढ़ा देती है।
कई राज्यों में किसान बुआई की तैयारी कर चुके हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश का इंतजार कर रहे हैं। अगर बारिश और ज्यादा देर से आती है तो फसलों की बुआई का समय प्रभावित हो सकता है। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि मॉनसून सीजन अभी शुरू ही हुआ है और आने वाले हफ्तों में स्थिति बदल सकती है।
क्या गर्मी और बढ़ सकती है?
मॉनसून में देरी का सबसे बड़ा असर तापमान पर पड़ता है। जिन इलाकों में बारिश नहीं पहुंचती वहां गर्म हवाएं और हीटवेव जैसी स्थितियां लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
देश के कई हिस्सों में मई और जून की शुरुआत में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून के आगे बढ़ने तक कुछ क्षेत्रों में गर्मी लोगों को परेशान करती रह सकती है। यही वजह है कि लोग बेसब्री से मॉनसून की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
क्या आने वाले दिनों में राहत मिलेगी?
ताजा मौसम पूर्वानुमानों के अनुसार आने वाले दिनों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के ऊपर स्थितियां अधिक अनुकूल हो सकती हैं। इससे मॉनसून को आगे बढ़ने में मदद मिलने की उम्मीद है।
मौसम विभाग का मानना है कि जून के पहले सप्ताह में मॉनसून की प्रगति तेज हो सकती है। हालांकि अंतिम स्थिति मौसम प्रणालियों के वास्तविक विकास पर निर्भर करेगी।
हमारी राय
2026 में मॉनसून की देरी सिर्फ एक मौसमीय घटना नहीं बल्कि कई जटिल समुद्री और वायुमंडलीय प्रक्रियाओं का परिणाम है। हिंद महासागर में नमी और हवाओं की स्थिति, ऊपरी स्तर की कमजोर पवनें और एल नीनो की बढ़ती आशंकाएं मिलकर मॉनसून की रफ्तार को प्रभावित कर रही हैं। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा मॉनसून खराब रहेगा, लेकिन शुरुआती संकेत मौसम वैज्ञानिकों को सतर्क जरूर कर रहे हैं।
भारत जैसे देश में जहां खेती, जल संसाधन और करोड़ों लोगों की आजीविका मॉनसून पर निर्भर करती है, वहां इसके हर बदलाव पर नजर रखना बेहद जरूरी है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि मॉनसून सामान्य रफ्तार पकड़ता है या फिर 2026 का मानसून सचमुच चुनौतीपूर्ण साबित होता है।









