सावन का महीना भगवान शिव और माता पार्वती की भक्ति के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इसी महीने आने वाली हरियाली तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं और अविवाहित कन्याओं के लिए बेहद खास होता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित लड़कियां मनचाहे जीवनसाथी की कामना के साथ माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। हरियाली तीज को हरियाली, प्रेम, सौभाग्य और प्रकृति के उत्सव के रूप में भी देखा जाता है। 

 

हरियाली तीज 2026 कब मनाई जाएगी?

हिंदू पंचांग के अनुसार, हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। साल 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती का वर्षों का कठिन तप सफल हुआ था और भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। यही कारण है कि यह दिन वैवाहिक सुख और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। 

 

हरियाली तीज का धार्मिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कई जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। उनके अटूट समर्पण और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की याद में हर साल हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है और परिवार में सुख-शांति आती है। 

 

हरियाली तीज की व्रत कथा

धार्मिक कथा के अनुसार, पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। लेकिन माता पार्वती मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं। उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। कहा जाता है कि उन्होंने 107 जन्मों तक तप किया और 108वें जन्म में भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। तभी से हरियाली तीज का व्रत अखंड सौभाग्य और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए किया जाता है। 

 

कैसे की जाती है हरियाली तीज की पूजा?

हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और नए या हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं। इसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर उनकी विधिपूर्वक पूजा की जाती है। पूजा में बेलपत्र, फल, फूल, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और मिठाई अर्पित की जाती है। कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं, जबकि कुछ फलाहार के साथ व्रत करती हैं। पूजा के बाद हरियाली तीज की कथा सुनी जाती है और भगवान शिव-पार्वती से सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मांगा जाता है। 

 

क्यों पहनते हैं हरे रंग के कपड़े?

हरियाली तीज का नाम ही हरियाली से जुड़ा है। सावन के महीने में चारों तरफ हरियाली छा जाती है, इसलिए इस दिन हरे रंग का विशेष महत्व माना जाता है। महिलाएं हरी साड़ी, हरी चूड़ियां, मेहंदी और सोलह श्रृंगार करती हैं। हरा रंग खुशहाली, समृद्धि, प्रेम और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि इस दिन महिलाओं के श्रृंगार में हरे रंग की विशेष झलक देखने को मिलती है। 

 

झूले और लोकगीतों की भी है खास परंपरा

हरियाली तीज सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं बल्कि उत्सव का भी प्रतीक है। इस दिन कई जगहों पर पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं। महिलाएं और युवतियां झूला झूलती हैं, पारंपरिक लोकगीत गाती हैं और एक-दूसरे को तीज की शुभकामनाएं देती हैं। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और तीज मेले भी आयोजित किए जाते हैं। 

 

ससुराल से मायके आने की भी है परंपरा

हरियाली तीज पर कई परिवारों में विवाहित बेटियों को मायके बुलाने की परंपरा भी है। मायके से बेटी को कपड़े, चूड़ियां, मेहंदी, मिठाइयां और श्रृंगार का सामान भेजा जाता है, जिसे कई जगहों पर 'सिंदारा' कहा जाता है। यह परंपरा प्रेम, अपनापन और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने का प्रतीक मानी जाती है। 

 

व्रत करते समय किन बातों का रखें ध्यान?

अगर आप हरियाली तीज का व्रत रख रहे हैं तो पूजा पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ करें। व्रत रखने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी ध्यान रखें। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही निर्जला व्रत करना चाहिए। पूजा के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए सकारात्मक भावना रखना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

हमारी राय

हरियाली तीज सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारिवारिक रिश्तों का उत्सव भी है। यह त्योहार हमें भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और धैर्य की सीख देता है। व्रत और पूजा तभी सार्थक माने जाते हैं, जब उनके साथ श्रद्धा, सद्भाव और अच्छे कर्म भी जुड़े हों। अगर इस पर्व को उसकी परंपराओं और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए मनाया जाए, तो यह न सिर्फ आध्यात्मिक शांति देता है बल्कि परिवार में प्रेम और खुशियों का माहौल भी बनाता है।