दुनिया इस समय विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने न केवल खाड़ी देशों में अस्थिरता पैदा की है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौतियां पेश की हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक इस क्षेत्र पर निर्भर है, इस स्थिति को लेकर बेहद सतर्क है।

 

इसी क्रम में आज, 1 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की एक उच्च स्तरीय बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण भारत पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की समीक्षा करना और भविष्य की रणनीति तैयार करना था।

 

10 दिनों में दूसरी बैठक: संकट की गंभीरता का संकेत

 

यह बैठक कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 दिनों के भीतर सीसीएस की यह दूसरी बैठक है। इससे पहले 23 मार्च को भी प्रधानमंत्री ने सुरक्षा मामलों की इस समिति के साथ चर्चा की थी। बार-बार हो रही ये बैठकें दर्शाती हैं कि भारत सरकार युद्ध के कारण होने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद है।

 

बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल सहित देश के शीर्ष नेतृत्व और अधिकारी शामिल हुए।

 

तेल, गैस और खाद्य आपूर्ति पर चर्चा

 

युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, इसका असर आम आदमी की रसोई और जेब पर भी पड़ता है। सीसीएस की इस बैठक में मुख्य रूप से तीन बड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया:

 

• पेट्रोल, डीजल और एलपीजी: पश्चिम एशिया कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का प्रमुख स्रोत है। युद्ध की वजह से सप्लाई चेन बाधित होने का खतरा बना रहता है। सरकार का लक्ष्य है कि पीएनजीऔर एलपीजी की निर्बाध आपूर्ति बनी रहे ताकि आम जनता को किल्लत का सामना न करना पड़े।

 

• खाद्य सुरक्षा और उर्वरक: बैठक में उर्वरकों की उपलब्धता का भी आकलन किया गया। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो कृषि क्षेत्र पर इसका असर पड़ सकता है, जिसे रोकने के लिए सरकार पहले से भंडारण और वैकल्पिक रास्तों पर विचार कर रही है।

 

• आर्थिक स्थिरता: वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच भारतीय बाजार और मुद्रा को सुरक्षित रखने के उपायों पर भी चर्चा की गई।

 

'मन की बात' और मोदी का संदेश

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में भी इस वैश्विक स्थिति का जिक्र किया था। उन्होंने इसे एक "चुनौतीपूर्ण स्थिति" बताते हुए देशवासियों से एकता बनाए रखने का आग्रह किया था। प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से फैलने वाली अफवाहों के प्रति सचेत रहने की सलाह दी थी। उनका स्पष्ट संदेश है कि इस संकट से निपटने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी और सतर्कता की आवश्यकता है।

 

भारत की भविष्य की रणनीति

 

भारत ने हमेशा शांति और कूटनीति का समर्थन किया है। सीसीएस की बैठक में यह भी तय किया गया कि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बहाली के प्रयासों में सक्रिय रहेगा, लेकिन साथ ही अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पी.के. मिश्रा वर्तमान हालातों पर पल-पल की नजर बनाए हुए हैं।

 

खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा बड़ी प्राथमिकता

 

इस युद्ध का एक सबसे संवेदनशील पहलू वहाँ रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा है। पश्चिम एशिया, विशेषकर इजराइल, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात में लाखों भारतीय कार्यरत हैं। सीसीएस की बैठक में इस बात पर गंभीरता से चर्चा की गई कि यदि युद्ध और भीषण रूप लेता है, तो भारतीयों को सुरक्षित निकालने के लिए 'ऑपरेशन अजय' जैसे किसी बड़े रेस्क्यू मिशन की आवश्यकता पड़ सकती है। विदेश मंत्रालय को निर्देश दिए गए हैं कि वे दूतावासों के माध्यम से नागरिकों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखें और आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर जारी करें।

 

सामरिक समुद्री मार्ग और ‘मैरीटाइम सिक्योरिटी’

 

भारत का अधिकांश व्यापार लाल सागर  और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज  के रास्ते होता है। ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण इन समुद्री रास्तों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। प्रधानमंत्री ने नौसेना प्रमुख के साथ समुद्री सुरक्षा की समीक्षा की है ताकि भारतीय मालवाहक जहाजों  को लुटेरों या युद्ध की चपेट में आने से बचाया जा सके। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह वैश्विक व्यापार मार्ग की स्वतंत्रता का पक्षधर है और इसके लिए अपनी नौसेना की गश्त को और मजबूत करेगा।

 

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

 

यह संकट भारत को एक बड़ा सबक भी देता है, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता। सरकार अब सौर ऊर्जा, हाइड्रोजन मिशन और एथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे विकल्पों पर और तेजी से काम करने की योजना बना रही है, ताकि भविष्य में खाड़ी देशों के युद्धों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कम से कम हो।

 

ईरान-इजराइल युद्ध केवल भौगोलिक संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा और व्यापार मार्ग के लिए भी खतरा है। भारत सरकार द्वारा की जा रही ये निरंतर बैठकें और समीक्षाएं एक जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान हैं।

 

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार का प्रयास है कि वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में भी भारतीय नागरिकों की बुनियादी जरूरतें प्रभावित न हों और देश की विकास दर स्थिर बनी रहे।