मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ईरान और पश्चिम एशिया के हालात का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी दिखाई देने लगा है। इसी बीच भारत सरकार भी पूरी तरह सतर्क नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक हाई लेवल बैठक की, जिसमें देश की ऊर्जा सुरक्षा, जरूरी सामान की सप्लाई और सप्लाई चेन को लेकर विस्तार से समीक्षा की गई। 

सरकार की तरफ से साफ संदेश दिया गया है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन हालात पर लगातार नजर रखी जा रही है। बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि अगर मिडिल ईस्ट का संकट और बढ़ता है तो भारत की अर्थव्यवस्था, तेल आपूर्ति और आम लोगों की जिंदगी पर उसका क्या असर पड़ सकता है।

 

पीएम मोदी की अपील के बाद सरकार और सतर्क

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में लोगों से पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करने की अपील की थी। उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने, कार पूलिंग करने और जरूरत पड़ने पर वर्क फ्रॉम होम जैसे विकल्पों पर जोर दिया था। 

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए देश को ईंधन की बचत और विदेशी मुद्रा संरक्षण यानी Forex Reserves पर ध्यान देना होगा। उन्होंने गैरजरूरी विदेशी यात्राओं और अनावश्यक सोने की खरीद से बचने की सलाह भी दी थी। अब पीएम की इसी अपील के बाद केंद्र सरकार ने हालात की समीक्षा और तैयारियों को तेज कर दिया है।

 

राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बड़ी बैठक

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को अंतर-मंत्रालयी समूह यानी IGoM की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में ऊर्जा आपूर्ति, जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता और सप्लाई चेन से जुड़े जोखिमों पर चर्चा हुई। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समूह में गृह मंत्रालय, वित्त मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और दूसरे महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं। सरकार का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत फैसले लिए जा सकें और आम जनता पर कम से कम असर पड़े।  बैठक के दौरान यह भी समीक्षा की गई कि अगर वैश्विक तेल सप्लाई और ज्यादा प्रभावित होती है तो भारत के पास वैकल्पिक इंतजाम कितने मजबूत हैं।

 

ऊर्जा आपूर्ति सबसे बड़ी चिंता

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में किसी भी तरह का बड़ा तनाव सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। अगर यहां स्थिति बिगड़ती है तो तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है और भारत जैसे देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इसी वजह से सरकार लगातार ईंधन सप्लाई और स्टॉक की निगरानी कर रही है।

 

जरूरी सामान की सप्लाई पर भी नजर

बैठक में सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं बल्कि जरूरी वस्तुओं की सप्लाई को लेकर भी चर्चा हुई। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अगर वैश्विक संकट गहराता है तो भारत में खाद्य सामग्री, गैस और दूसरी जरूरी चीजों की उपलब्धता प्रभावित न हो। मीडिया सूत्रों के मुताबिक सरकार ने सप्लाई चेन को मजबूत रखने के लिए अलग-अलग मंत्रालयों को जरूरी निर्देश दिए हैं। इसके अलावा बंदरगाहों और समुद्री मार्गों की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है ताकि आयात-निर्यात प्रभावित न हो।

 

सरकार की लोगों से घबराने से बचने की अपील

बैठक के बाद सरकार की तरफ से लोगों से शांत रहने और अफवाहों से बचने की अपील की गई। राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार हालात पर लगातार नजर रखे हुए है और जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने यह भी साफ किया कि फिलहाल देश में किसी तरह की ईंधन या जरूरी वस्तुओं की कमी नहीं है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक तनाव बना रहता है तो आने वाले दिनों में वैश्विक बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।

 

पहले भी बना था विशेष समूह

यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने मिडिल ईस्ट संकट को लेकर बड़ा कदम उठाया हो। इससे पहले भी मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने एक अंतर-मंत्रालयी समूह बनाया था, जो पश्चिम एशिया के हालात पर नजर रख रहा है। उस समय भी सरकार ने कहा था कि ऊर्जा सुरक्षा, सप्लाई चेन और जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता को लेकर लगातार निगरानी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब पहले की तुलना में ऐसे वैश्विक संकटों के लिए ज्यादा तैयार रहने की कोशिश कर रहा है।

 

वैश्विक बाजारों पर दिख रहा असर

मिडिल ईस्ट संकट का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी दिखाई दे रहा है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ गया है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। भारत में भी आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।

 

विपक्ष भी सरकार के कदमों पर नजर रखे हुए

मिडिल ईस्ट संकट को लेकर विपक्ष भी सरकार की रणनीति पर नजर बनाए हुए है। संसद और राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को लेकर चर्चा लगातार जारी है।हालांकि सरकार का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है और देश के हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।

 

आने वाले दिनों में और अहम हो सकती हैं बैठकें

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है तो सरकार को आगे और बड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं। ऊर्जा बचत, वैकल्पिक सप्लाई और आर्थिक रणनीति को लेकर आने वाले दिनों में और अहम बैठकें हो सकती हैं। 

फिलहाल केंद्र सरकार लगातार हालात की समीक्षा कर रही है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि वैश्विक संकट का असर भारत पर कम से कम पड़े। इतना जरूर साफ है कि मिडिल ईस्ट का यह संकट सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर भी दिखाई देने लगा है।