देश में जब भी किसी बेटी की शादी होती है, तो घरवाले यही सपना देखते हैं कि उसकी नई जिंदगी खुशहाल हो। लेकिन कई बार यही शादी कुछ महीनों या सालों बाद दर्दनाक खबर में बदल जाती है। हाल के दिनों में सामने आए दीपिका और ट्विशा जैसे मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक भारत में भी दहेज की मानसिकता खत्म नहीं हुई? तकनीक, शिक्षा और आर्थिक प्रगति के दौर में भी अगर बेटियों की जान दहेज की वजह से जा रही है, तो यह सिर्फ कानून की नहीं बल्कि पूरे समाज की विफलता मानी जाएगी।

 

हर साल हजारों महिलाओं की जाती है जान

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में दहेज से जुड़ी मौतें आज भी बेहद गंभीर समस्या बनी हुई हैं। National Crime Records Bureau के आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल करीब 6,500 से 7,000 के बीच महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज होती है। यानी औसतन हर दिन लगभग 18 से 20 महिलाओं की जान चली जाती है। कई मामलों में यह संख्या और ज्यादा मानी जाती है क्योंकि हर केस पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाता। NCRB की हालिया रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में दहेज मृत्यु के मामले लगातार ज्यादा दर्ज किए जाते रहे हैं।

 

कानून होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रहीं मौतें?

भारत में दहेज प्रथा रोकने के लिए कानून नया नहीं है।1961 में ही Dowry Prohibition Act लागू किया गया था। इसके अलावा भारतीय दंड संहिता की धारा 304B और 498A के तहत दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या पर सख्त सजा का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह है कि इतने कानूनों के बावजूद हालात क्यों नहीं बदल रहे?

विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सबसे बड़ी वजह सामाजिक मानसिकता है। आज भी कई परिवार दहेज को 'रिवाज' या 'स्टेटस' का हिस्सा मानते हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले खुलकर मांग होती थी, अब उसे ‘गिफ्ट’, ‘सेटअप’ या ‘सपोर्ट’ जैसे शब्दों में छिपा दिया जाता है।

 

पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज क्यों जिंदा है?

अक्सर लोग मानते हैं कि दहेज सिर्फ गांवों या कम पढ़े-लिखे समाज की समस्या है। लेकिन हाल के कई मामलों ने यह धारणा गलत साबित कर दी। आईटी सेक्टर, मेडिकल प्रोफेशन, सरकारी नौकरी और बड़े शहरों में भी दहेज की मांग के मामले सामने आते रहते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई परिवार बेटे की नौकरी और सामाजिक स्थिति को 'मार्केट वैल्यू' की तरह देखने लगे हैं। यही वजह है कि इंजीनियर, डॉक्टर या सरकारी अफसर लड़कों के लिए लाखों-करोड़ों रुपये तक की मांग की खबरें सामने आती हैं।

 

शादी अब रिश्ता कम, आर्थिक सौदा ज्यादा?

सोशललिस्ट के अनुसार दहेज की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह शादी को भावनात्मक रिश्ते से हटाकर आर्थिक लेन-देन में बदल देता है। कई परिवार बेटी की शादी के लिए सालों तक कर्ज लेते हैं। कुछ माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी की बचत खर्च कर देते हैं। इसके बावजूद अगर ससुराल पक्ष की मांगें पूरी न हों, तो मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना शुरू हो जाती है। यही प्रताड़ना कई बार आत्महत्या या हत्या तक पहुंच जाती है।

 

दहेज से मौत के पीछे छिपी चुप्पी भी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि कई महिलाएं लंबे समय तक अत्याचार सहती रहती हैं, लेकिन खुलकर शिकायत नहीं कर पातीं। इसके पीछे परिवार की बदनामी का डर, शादी टूटने का भय और सामाजिक दबाव बड़ी वजह बनता है। कई बार लड़की के मायके वाले भी उसे ‘समझौता’ करने की सलाह देते हैं। यही चुप्पी धीरे-धीरे स्थिति को खतरनाक बना देती है।

 

सोशल मीडिया और आधुनिकता के बावजूद क्यों नहीं बदली सोच?

आज का भारत डिजिटल हो चुका है। लोग अंतरिक्ष से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक की बात कर रहे हैं। लेकिन शादी के मामले में कई जगह सोच अब भी पुरानी बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार समस्या सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा की भी है। कई परिवार शादी को दिखावे और स्टेटस का मंच बना देते हैं। महंगी गाड़ियां, कैश, फ्लैट और लग्जरी गिफ्ट्स को सफलता का प्रतीक माना जाने लगा है। यही सोच दहेज संस्कृति को खत्म होने नहीं देती।

 

क्या सिर्फ लड़कों वाले परिवार जिम्मेदार हैं?

सोशललिस्ट मानते हैं कि दहेज की समस्या के लिए सिर्फ एक पक्ष को दोष देना काफी नहीं होगा। कई बार लड़की वाले परिवार भी सामाजिक दबाव में खुद बढ़-चढ़कर दहेज देते हैं ताकि समाज में ‘इज्जत’ बनी रहे। धीरे-धीरे यही चीज एक सामाजिक प्रतिस्पर्धा बन जाती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक समाज सामूहिक रूप से 'दहेज नहीं देंगे और नहीं लेंगे' की मानसिकता नहीं अपनाएगा, तब तक बदलाव मुश्किल रहेगा।

 

समाज को क्या करना होगा?

विशेषज्ञों के अनुसार दहेज रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है। सबसे पहले परिवारों को बेटियों को आर्थिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा। शिक्षा और आत्मनिर्भरता महिलाओं को गलत रिश्तों के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत देती है। इसके साथ ही लड़कों के परिवारों को भी खुलकर दहेज विरोधी सोच अपनानी होगी। शादी को आर्थिक लाभ का जरिया मानने वाली मानसिकता बदलनी होगी। स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी दहेज विरोधी जागरूकता जरूरी मानी जा रही है।

 

पुलिस और न्याय व्यवस्था में क्या बदलाव जरूरी?

विशेषज्ञों का कहना है कि दहेज मामलों में तेज जांच और त्वरित न्याय बेहद जरूरी है। कई मामलों में सालों तक केस चलते रहते हैं, जिससे पीड़ित परिवार टूट जाता है। महिलाओं के लिए सुरक्षित शिकायत व्यवस्था और काउंसलिंग सिस्टम को भी मजबूत करने की जरूरत है।

 

असली बदलाव कानून से नहीं, सोच से आएगा

भारत में दहेज विरोधी कानून दशकों से मौजूद हैं। फिर भी हर साल हजारों महिलाओं की मौत यह बताती है कि समस्या अब भी गहरी है। दीपिका और ट्विशा जैसे मामले सिर्फ खबरें नहीं हैं। वे उस समाज का आईना हैं, जहां कई बेटियां आज भी शादी के बाद सुरक्षित नहीं हैं।

जब तक शादी को ‘लेन-देन’ नहीं बल्कि बराबरी और सम्मान का रिश्ता नहीं माना जाएगा, तब तक दहेज की यह त्रासदी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। असल बदलाव तब आएगा जब समाज बेटियों को बोझ नहीं, बराबरी का इंसान समझना शुरू करेगा।