अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई थीं कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते यानी पीस डील को लेकर सहमति बन गई है और जल्द ही एक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन खबरों को ही खारिज कर दिया है। ट्रंप का कहना है कि ईरान की ओर से सामने आ रही डील की शर्तें और दावे पूरी तरह गलत हैं और इन्हें ‘फेक न्यूज’ की तरह पेश किया जा रहा है।
ट्रंप के इस बयान के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच बनने वाली शांति की उम्मीदें टूट सकती हैं? साथ ही यह भी आशंका बढ़ गई है कि मौजूदा युद्धविराम या संघर्ष विराम पर भी इसका असर पड़ सकता है।
आखिर विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
दरअसल, पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में खबरें चल रही थीं कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि दोनों पक्ष एक ऐसे समझौते के करीब पहुंच गए हैं जिसमें परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति बन सकती है।
ईरानी मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि समझौते के तहत ईरान को कुछ आर्थिक राहत मिल सकती है और उसके जमे हुए फंड्स को आंशिक रूप से जारी किया जा सकता है। हालांकि अमेरिका की ओर से इन दावों को लेकर अलग तस्वीर पेश की गई।
ट्रंप ने क्यों कहा 'फेक न्यूज'?
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ईरान की ओर से जो शर्तें और समझौते की बातें सामने लाई जा रही हैं, वे सही नहीं हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो जानकारी सार्वजनिक की जा रही है, वह वास्तविक बातचीत को नहीं दर्शाती।
ट्रंप का कहना है कि किसी भी तरह की आर्थिक राहत या प्रतिबंधों में ढील प्रदर्शन आधारित होगी। यानी अमेरिका तभी कोई राहत देगा जब ईरान अपनी कुछ प्रमुख प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगा। दूसरी तरफ ईरानी सूत्रों का दावा है कि बातचीत का मसौदा कुछ अलग शर्तों पर आधारित है। यही विरोधाभास पूरे विवाद की जड़ बन गया है।
ईरान ने भी नहीं मानी पूरी सहमति
दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ ट्रंप ही नहीं, ईरान की ओर से भी यह कहा गया है कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि बातचीत जारी है लेकिन समझौते को लेकर अभी अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। यानी एक तरफ ट्रंप कह रहे हैं कि ईरान के दावे गलत हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान यह कह रहा है कि अभी तक कोई अंतिम समझौता हुआ ही नहीं है। ऐसे में पूरी स्थिति और अधिक उलझी हुई नजर आ रही है।
युद्धविराम पर क्यों बढ़ गया खतरा?
विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी शांति समझौते को लेकर दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हों तो विश्वास का संकट पैदा हो जाता है। यही कारण है कि मौजूदा युद्धविराम पर भी सवाल उठने लगे हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ महीनों में कई बार तनाव बढ़ा और कम हुआ है। कई मौकों पर दोनों देशों ने एक-दूसरे पर संघर्ष विराम के उल्लंघन का आरोप भी लगाया। अगर शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ती है तो क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ सकता है।
विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री मार्ग को लेकर स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है।
अमेरिका की क्या हैं प्रमुख मांगें?
रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे, संवेदनशील परमाणु सामग्री को नष्ट करे और क्षेत्रीय उग्रवादी संगठनों को समर्थन देना बंद करे। अमेरिका यह भी चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों में जहाजों की आवाजाही सामान्य बनी रहे। दूसरी ओर ईरान लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में फंसी अपनी संपत्तियों तक पहुंच की मांग करता रहा है। इन मुद्दों पर अभी भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
दुनिया की नजरें इन बातचीतों पर क्यों टिकी हैं?
अमेरिका और ईरान के रिश्ते सिर्फ दो देशों का मामला नहीं हैं। इनका असर पूरे पश्चिम एशिया, वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। जब भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतों से लेकर शेयर बाजार तक प्रभावित हो जाते हैं। इसी वजह से दुनिया भर के देश इन वार्ताओं पर नजर बनाए हुए हैं। अगर समझौता होता है तो क्षेत्र में स्थिरता बढ़ सकती है, जबकि बातचीत विफल होने पर तनाव फिर भड़क सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि बातचीत अभी जारी है और आने वाले दिनों में किसी मसौदे पर सहमति बन सकती है। वहीं ट्रंप का सख्त रुख और ईरान के अलग दावे यह संकेत भी दे रहे हैं कि अभी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जब तक दोनों पक्ष एक जैसी शर्तों पर सहमत नहीं होते, तब तक किसी स्थायी शांति समझौते की घोषणा मुश्किल दिखाई देती है।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते को लेकर जिस तरह के विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं, उससे साफ है कि मामला अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। हमारी राय में किसी भी समझौते की सफलता के लिए सबसे जरूरी चीज पारदर्शिता और आपसी भरोसा है। अगर दोनों पक्ष अलग-अलग दावे करते रहेंगे तो शांति प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। दुनिया फिलहाल यही उम्मीद कर रही है कि बातचीत जारी रहे और पश्चिम एशिया को एक और बड़े टकराव की ओर बढ़ने से रोका जा सके।









