भारत ने रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक और बड़ा कदम उठा लिया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने देश का पहला स्वदेशी 350 किलोग्राम थ्रस्ट क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन तैयार कर लिया है। यह सिर्फ एक इंजन नहीं, बल्कि भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
इस इंजन को DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने विकसित किया है। खास बात यह है कि इसके निर्माण और असेंबली में भारतीय निजी कंपनी की भी अहम भूमिका रही है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इंजन को सफलतापूर्वक तैयार कर GTRE को सौंप दिया गया है।
आखिर टर्बोजेट इंजन होता क्या है?
अगर आसान भाषा में समझें तो टर्बोजेट इंजन ऐसा इंजन होता है जो हवा को अंदर खींचता है, उसमें ईंधन मिलाकर जलाता है और तेज गति से गैस बाहर निकालता है। इसी ताकत से मिसाइल, ड्रोन या विमान को आगे बढ़ने की स्पीड मिलती है। अब तक भारत कई ऐसे इंजन या उनकी तकनीक के लिए विदेशों पर निर्भर रहा है। लेकिन अब इस स्वदेशी इंजन के आने से यह निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
किस काम आएगा यह नया इंजन?
यह इंजन खास तौर पर उन सिस्टम्स के लिए बनाया गया है जो एक बार इस्तेमाल होते हैं। यानी इसे क्रूज़ मिसाइलों, लंबी दूरी तक उड़ने वाले ड्रोन और दूसरे रक्षा प्लेटफॉर्म में लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में इससे भारत की मिसाइल और मानवरहित हवाई प्रणालियों (UAV) की क्षमता और मजबूत होगी।
क्यों मानी जा रही है बड़ी उपलब्धि?
रक्षा क्षेत्र में इंजन बनाना सबसे मुश्किल तकनीकों में से एक माना जाता है। मिसाइल या लड़ाकू विमान बनाना जितना चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्यादा कठिन उसका इंजन विकसित करना होता है। इंजन को बेहद ऊंचे तापमान, तेज दबाव और लगातार प्रदर्शन के हिसाब से डिजाइन करना पड़ता है। यही वजह है कि दुनिया के बहुत कम देशों के पास इस तरह की तकनीक मौजूद है। अब भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
निजी कंपनी ने भी निभाई अहम भूमिका
इस परियोजना में हैदराबाद की Azad Engineering ने निर्माण साझेदार के रूप में काम किया। कंपनी ने इंजन के निर्माण और असेंबली में योगदान दिया। सरकार का मानना है कि रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ने से देश का रक्षा उद्योग और मजबूत होगा।
आत्मनिर्भर भारत को मिलेगा बड़ा सहारा
पिछले कुछ सालों में सरकार लगातार ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पर जोर दे रही है। रक्षा क्षेत्र में इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। अब देश में मिसाइल, तोप, रडार, ड्रोन और कई आधुनिक हथियारों का निर्माण पहले के मुकाबले ज्यादा हो रहा है।इस नए टर्बोजेट इंजन को भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पहले किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
भारत लंबे समय से स्वदेशी इंजन विकसित करने की कोशिश कर रहा है। कावेरी इंजन परियोजना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हालांकि शुरुआती दौर में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं और इंजन को लड़ाकू विमान में इस्तेमाल नहीं किया जा सका। लेकिन उन अनुभवों से मिली सीख ने नई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में काफी मदद की। आज GTRE कई नई इंजन तकनीकों पर काम कर रहा है।
आने वाले समय में क्या होगा फायदा?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत इंजन तकनीक में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाता है तो कई बड़े फायदे होंगे। सबसे पहले विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी। दूसरे, जरूरत के मुताबिक इंजन में बदलाव करना आसान होगा। तीसरे, उत्पादन लागत पर बेहतर नियंत्रण रहेगा और भविष्य में निर्यात के अवसर भी बढ़ सकते हैं। इसके अलावा किसी भी आपात स्थिति में विदेशी सप्लाई रुकने का खतरा भी काफी कम हो जाएगा।
मिसाइल और ड्रोन तकनीक होगी मजबूत
आज के दौर में आधुनिक युद्ध का बड़ा हिस्सा ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों पर निर्भर होता जा रहा है। अगर इन प्लेटफॉर्म के लिए इंजन भी देश में बनने लगें तो उनकी उपलब्धता बढ़ेगी और विकास की रफ्तार भी तेज होगी। यही वजह है कि इस उपलब्धि को सिर्फ एक इंजन का विकास नहीं, बल्कि पूरे रक्षा इकोसिस्टम की मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है।
आगे की राह क्या है?
DRDO अभी कई और बड़े इंजन कार्यक्रमों पर काम कर रहा है। इनमें भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए हाई-थ्रस्ट इंजन विकसित करने की योजना भी शामिल है। सरकार चाहती है कि आने वाले वर्षों में भारत ऐसी तकनीकों में भी आत्मनिर्भर बने, जिनके लिए अब तक विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था।
देश के लिए क्यों है अहम खबर?
रक्षा तकनीक सिर्फ सेना को मजबूत नहीं बनाती, बल्कि देश की वैज्ञानिक क्षमता और औद्योगिक विकास को भी आगे बढ़ाती है। जब देश में ऐसी हाई-टेक तकनीक विकसित होती है तो उससे हजारों इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और निजी कंपनियों को भी नए अवसर मिलते हैं। साथ ही भारत वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ता है।
हमारी राय
DRDO का पहला स्वदेशी 350 किलोग्राम थ्रस्ट टर्बोजेट इंजन भारत की रक्षा तकनीक के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे न सिर्फ मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रमों को मजबूती मिलेगी, बल्कि विदेशी तकनीक पर निर्भरता भी कम होगी। आने वाले समय में अगर भारत इसी तरह इंजन तकनीक में लगातार प्रगति करता रहा, तो रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का लक्ष्य और तेजी से हासिल किया जा सकेगा।









