दिल्ली घूमने जाने वाले ज्यादातर लोग लाल किला, इंडिया गेट और कुतुब मीनार जरूर देखते हैं। इन्हीं मशहूर जगहों में एक नाम जंतर-मंतर का भी आता है। हालांकि, बहुत से लोग इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत समझते हैं, जबकि हकीकत में यह कोई महल या किला नहीं, बल्कि सैकड़ों साल पुरानी एक खगोलीय वेधशाला (Astronomical Observatory) है।

आज जब हमारे पास सैटेलाइट, कंप्यूटर और आधुनिक टेलीस्कोप हैं, तब भी जंतर-मंतर लोगों को हैरान कर देता है। वजह है इसकी सटीक गणनाएं और उस समय की अद्भुत वैज्ञानिक सोच। यही कारण है कि जंतर-मंतर को भारत की सबसे अनोखी वैज्ञानिक धरोहरों में गिना जाता है।

 

आखिर जंतर-मंतर का मतलब क्या होता है?

'जंतर' शब्द संस्कृत के 'यंत्र' से बना है, जिसका मतलब होता है उपकरण या मशीन। वहीं 'मंतर' शब्द 'मंत्रणा' या 'गणना' से जुड़ा माना जाता है। आसान भाषा में कहें तो जंतर-मंतर ऐसे विशेष यंत्रों का समूह है, जिनकी मदद से समय, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, सूर्य की दिशा और कई दूसरी खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। यह कोई जादू या रहस्यमयी जगह नहीं है, बल्कि पूरी तरह विज्ञान और गणित पर आधारित संरचना है।

 

किसने बनवाया था जंतर-मंतर?

जंतर-मंतर का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। वे सिर्फ एक शासक ही नहीं, बल्कि गणित, ज्योतिष और खगोल विज्ञान में भी गहरी रुचि रखते थे। उन्हें लगा कि उस समय इस्तेमाल हो रहे खगोलीय उपकरण पूरी तरह सटीक नहीं थे। इसलिए उन्होंने बड़े-बड़े पत्थरों और विशेष ज्यामितीय आकारों की मदद से ऐसे यंत्र बनवाए, जिनसे ज्यादा सही गणनाएं की जा सकें। इसी सोच के साथ उन्होंने अलग-अलग शहरों में जंतर-मंतर बनवाए, ताकि आकाशीय गतिविधियों का अध्ययन किया जा सके।

 

भारत में कितने जंतर-मंतर हैं?

बहुत से लोगों को लगता है कि जंतर-मंतर सिर्फ दिल्ली में है, लेकिन ऐसा नहीं है। महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने भारत के पांच शहरों में जंतर-मंतर बनवाए थे। ये दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में बनाए गए थे। हालांकि, मथुरा वाला जंतर-मंतर अब लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुका है। आज दिल्ली, जयपुर, उज्जैन और वाराणसी के जंतर-मंतर ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद हैं।

 

जयपुर का जंतर-मंतर सबसे खास क्यों माना जाता है?

अगर सबसे बड़े और सबसे अच्छी तरह सुरक्षित जंतर-मंतर की बात करें, तो जयपुर का नाम सबसे पहले आता है। यहां कई विशाल खगोलीय यंत्र मौजूद हैं, जिनकी मदद से समय, ग्रहों की स्थिति, राशि परिवर्तन और कई दूसरी खगोलीय गणनाएं की जाती थीं।

इसी ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए जयपुर के जंतर-मंतर को यूनेस्को विश्व धरोहर (UNESCO World Heritage Site) का दर्जा भी दिया गया है। यह भारत की वैज्ञानिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

 

यहां मौजूद यंत्र कैसे काम करते हैं?

जंतर-मंतर में कई तरह के विशाल यंत्र बनाए गए हैं और हर यंत्र का अलग काम है। इनमें सबसे प्रसिद्ध सम्राट यंत्र है। इसे दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की सूर्य घड़ी माना जाता है। इसकी मदद से समय का पता लगाया जाता था। इसके अलावा जय प्रकाश यंत्र, राम यंत्र, मिश्र यंत्र और कई अन्य उपकरण भी हैं, जिनका इस्तेमाल ग्रहों की स्थिति, सूर्य की ऊंचाई, दिशा और दूसरे खगोलीय आंकड़े मापने के लिए किया जाता था। आज भी वैज्ञानिक इन यंत्रों की बनावट और सटीकता की सराहना करते हैं।

 

उस समय बिना कंप्यूटर इतनी सटीक गणना कैसे होती थी?

यही बात जंतर-मंतर को खास बनाती है। करीब 300 साल पहले न कंप्यूटर थे, न डिजिटल घड़ियां और न ही आधुनिक टेलीस्कोप। इसके बावजूद उस समय के विद्वानों ने गणित, ज्यामिति और खगोल विज्ञान की मदद से ऐसे यंत्र बनाए जो बेहद सटीक परिणाम देते थे। यह उस दौर की वैज्ञानिक सोच, अध्ययन और तकनीकी समझ का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।

 

क्या आज भी इसका इस्तेमाल होता है?

आज खगोलीय गणनाओं के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए रोजमर्रा के वैज्ञानिक कामों में जंतर-मंतर का उपयोग नहीं होता।हालांकि, यह आज भी वैज्ञानिक इतिहास, शिक्षा और शोध के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। देश-विदेश से हजारों पर्यटक और शोधकर्ता यहां आते हैं और उस समय की वैज्ञानिक उपलब्धियों को करीब से समझते हैं।

 

पर्यटकों के बीच भी है खास आकर्षण

अगर आप दिल्ली या जयपुर घूमने जाएं, तो जंतर-मंतर जरूर देखना चाहिए। यह सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि उस दौर की वैज्ञानिक सोच का जीवंत उदाहरण है। यहां जाकर समझ आता है कि भारत में सदियों पहले भी विज्ञान और गणित कितने विकसित थे। स्कूल और कॉलेज के छात्र भी यहां आकर खगोल विज्ञान से जुड़ी कई रोचक बातें सीखते हैं।

 

भारतीय विज्ञान की पहचान है जंतर-मंतर

आज दुनिया अंतरिक्ष में नई-नई खोज कर रही है। भारत भी चंद्रयान और आदित्य एल-1 जैसे मिशनों के जरिए अपनी वैज्ञानिक क्षमता दिखा चुका है। ऐसे समय में जंतर-मंतर हमें यह याद दिलाता है कि भारत में खगोल विज्ञान की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। यह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि हमारी वैज्ञानिक विरासत का प्रतीक है।

 

हमारी राय

जंतर-मंतर इस बात का शानदार उदाहरण है कि भारत में सदियों पहले भी विज्ञान, गणित और खगोलशास्त्र का स्तर बेहद ऊंचा था। आधुनिक तकनीक आने के बाद भले ही इन यंत्रों का व्यावहारिक उपयोग कम हो गया हो, लेकिन इनका ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व आज भी उतना ही बड़ा है। हमें ऐसी धरोहरों को सिर्फ घूमने की जगह नहीं, बल्कि अपनी ज्ञान परंपरा और वैज्ञानिक सोच की पहचान के रूप में देखना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को भी इनके बारे में जानकारी देना उतना ही जरूरी है, ताकि वे समझ सकें कि भारत की वैज्ञानिक विरासत कितनी समृद्ध रही है।