देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों में शामिल एम्स दिल्ली इन दिनों एक अलग वजह से चर्चा में है। जिस संस्थान को कभी देश के टॉप डॉक्टरों का सपना माना जाता था, वहां से कई वरिष्ठ डॉक्टरों और विभागाध्यक्षों यानी एचओडी के जाने की खबरें सामने आ रही हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि दशकों तक एम्स में सेवा देने वाले डॉक्टर भी अब संस्थान छोड़ने का फैसला ले रहे हैं।
एम्स दिल्ली सिर्फ एक अस्पताल नहीं बल्कि भारत की मेडिकल शिक्षा, रिसर्च और इलाज व्यवस्था का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। यहां काम करना डॉक्टरों के लिए प्रतिष्ठा की बात रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों में वरिष्ठ फैकल्टी के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
कौन-कौन से बड़े डॉक्टर छोड़ चुके हैं एम्स?
रिपोर्ट्स के अनुसार, 2023 से 2025 के बीच एम्स दिल्ली के कई वरिष्ठ डॉक्टरों ने संस्थान छोड़ा। इनमें कुछ ऐसे नाम भी शामिल हैं जो अपने-अपने विभागों के प्रमुख रह चुके थे। कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी विभाग के प्रमुख रहे डॉक्टर शिव कुमार चौधरी ने 2024 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली। इसी तरह ऑर्थोपेडिक्स, न्यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजी जैसे बड़े विभागों के वरिष्ठ डॉक्टर भी एम्स से अलग हुए। इनमें से कई डॉक्टरों के पास रिटायरमेंट में कुछ साल बाकी थे, फिर भी उन्होंने समय से पहले संस्थान छोड़ने का फैसला किया।
क्या सिर्फ ज्यादा सैलरी की वजह से जा रहे हैं डॉक्टर?
आमतौर पर माना जाता है कि डॉक्टर निजी अस्पतालों में ज्यादा पैसे की वजह से जाते हैं। इसमें कुछ सच्चाई जरूर है, क्योंकि प्राइवेट हेल्थ सेक्टर में अनुभवी डॉक्टरों को बेहतर आर्थिक पैकेज मिल सकते हैं। लेकिन एम्स से जुड़े कई डॉक्टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि मामला सिर्फ पैसे का नहीं है।
इसके पीछे काम का दबाव, प्रशासनिक जिम्मेदारियां, रिसर्च के लिए कम समय और फैसले लेने की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं। वरिष्ठ डॉक्टर के अनुसार, पहले एम्स में डॉक्टर का मुख्य फोकस इलाज, पढ़ाई और रिसर्च पर होता था, लेकिन समय के साथ प्रशासनिक काम बढ़ गया है। इससे डॉक्टरों को अपने मूल काम के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
प्रशासनिक काम का बढ़ता बोझ
एम्स जैसे संस्थान में डॉक्टरों की जिम्मेदारी सिर्फ मरीज देखना नहीं होती। उन्हें पढ़ाना, रिसर्च करना, नई तकनीकों पर काम करना और प्रशासनिक फैसलों में भी शामिल होना पड़ता है। कई डॉक्टरों की शिकायत रही है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं काफी लंबी हो गई हैं। उपकरण खरीदने, संसाधन जुटाने या किसी निर्णय को लागू करने में देरी का असर अस्पताल के कामकाज पर पड़ता है। जब एक सीनियर डॉक्टर का ज्यादा समय कागजी कामों में जाने लगता है तो इसका असर मरीजों और रिसर्च दोनों पर पड़ सकता है।
क्या एम्स में फैकल्टी की कमी बढ़ रही है?
डॉक्टरों के जाने के साथ एक और बड़ी चिंता फैकल्टी की कमी को लेकर है। सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, 2022 से 2024 के बीच देश के 20 एम्स संस्थानों से कुल 429 डॉक्टरों के इस्तीफे हुए। इनमें एम्स दिल्ली से 52 डॉक्टरों के जाने की जानकारी सामने आई थी। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि कई एम्स संस्थानों में करीब एक तिहाई फैकल्टी पद खाली हैं। इससे मेडिकल शिक्षा और मरीजों की सेवाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
निजी अस्पताल क्यों आकर्षित कर रहे हैं?
प्राइवेट अस्पतालों में जाने का एक बड़ा कारण बेहतर सुविधाएं और काम करने की आजादी भी बताई जाती है। कई वरिष्ठ डॉक्टरों के लिए निजी क्षेत्र में उन्हें अपने अनुभव के अनुसार काम करने का मौका मिलता है। इसके अलावा प्रशासनिक बाधाएं कम होने और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से भी कुछ डॉक्टर वहां जाना पसंद करते हैं। हालांकि एम्स जैसी संस्था में मिलने वाली प्रतिष्ठा और मरीजों की विविधता निजी अस्पतालों में हमेशा नहीं मिलती।
क्या यह सिर्फ एम्स दिल्ली की समस्या है?
यह समस्या सिर्फ एम्स दिल्ली तक सीमित नहीं है। देश के कई बड़े सरकारी मेडिकल संस्थानों में डॉक्टरों की कमी और विशेषज्ञों को रोकने की चुनौती सामने आती रही है। नए खुले कई एम्स संस्थानों में भी विशेषज्ञ डॉक्टरों और फैकल्टी की कमी की बात सामने आती रही है।
मरीजों पर क्या असर पड़ सकता है?
एम्स में देशभर से मरीज इलाज के लिए आते हैं। यहां जटिल बीमारियों का इलाज होता है, इसलिए अनुभवी डॉक्टरों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर वरिष्ठ डॉक्टर लगातार संस्थान छोड़ते हैं तो इसका असर सिर्फ अस्पताल पर नहीं बल्कि मेडिकल छात्रों की ट्रेनिंग और रिसर्च पर भी पड़ सकता है। हालांकि एम्स में अभी भी बड़ी संख्या में विशेषज्ञ डॉक्टर काम कर रहे हैं और संस्थान की पहचान मजबूत बनी हुई है।
सरकार और संस्थान के सामने क्या चुनौती है?
अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि एम्स जैसे संस्थानों में डॉक्टरों को लंबे समय तक बनाए रखा जाए। इसके लिए सिर्फ भर्ती करना काफी नहीं होगा, बल्कि काम का माहौल, रिसर्च सुविधाएं, प्रशासनिक व्यवस्था और करियर ग्रोथ पर भी ध्यान देना होगा। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर देश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल संस्थान में ही विशेषज्ञों को रोकना मुश्किल हो रहा है तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए सोचने वाली बात है।
हमारी राय
एम्स दिल्ली से बड़े डॉक्टरों का जाना सिर्फ एक संस्थान का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। डॉक्टरों को रोकने के लिए सिर्फ सम्मान या प्रतिष्ठा काफी नहीं होती, उन्हें बेहतर काम का माहौल, रिसर्च की सुविधा और फैसले लेने की स्वतंत्रता भी चाहिए। एम्स जैसी संस्था भारत की मेडिकल पहचान है। इसलिए जरूरी है कि यहां से जुड़े संकट को समय रहते समझा जाए और ऐसे कदम उठाए जाएं जिससे देश के बेहतरीन डॉक्टर लंबे समय तक इस संस्थान से जुड़े रहें।









