वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ रही है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल आयात करते हैं, उनके लिए यह स्थिति सीधे अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर असर डाल सकती है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की अपील की। उन्होंने लोगों से अनावश्यक यात्रा से बचने, ईंधन बचाने और इलेक्ट्रिक वाहनों यानी ईवी को अपनाने पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या आने वाले समय में भारत में ईवी की मांग तेजी से बढ़ सकती है? क्या ऑटोमोबाइल सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा? और अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ती हैं तो बाजार पर उसका क्या असर पड़ सकता है?


आखिर क्यों बढ़ी है चिंता?

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर वेस्ट एशिया में तनाव बढ़ता है या तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा होता है, तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इसका असर सिर्फ वाहन चलाने वालों पर नहीं, बल्कि ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स, खेती और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि सरकार अब लंबे समय से वैकल्पिक ईंधन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है।


पीएम की अपील का क्या पड़ा असर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पेट्रोल-डीजल बचाने और ईवी अपनाने वाली अपील का असर अब बाजार में भी दिखने लगा है। पिछले दो दिनों में शेयर बाजार में कई सेक्टर्स में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। खासकर ईवी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और रेलवे से जुड़े शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है, जबकि एयरलाइन, ज्वेलरी और कुछ कंज्यूमर सेक्टर के शेयरों पर दबाव देखने को मिला।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पीएम मोदी की अपील के बाद निवेशकों ने यह मानना शुरू कर दिया कि अगर वेस्ट एशिया तनाव लंबा चला और कच्चा तेल महंगा हुआ, तो सरकार इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और फ्यूल सेविंग पॉलिसियों को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा सकती है। इसी वजह से ईवी और वैकल्पिक ट्रांसपोर्ट सेक्टर के शेयरों में खरीदारी बढ़ी।


भारत में पहले से बढ़ रही है ईवी की मांग

पिछले कुछ वर्षों में भारत में इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर और कारों की बिक्री तेजी से बढ़ी है। पहले जहां ईवी को सिर्फ भविष्य की तकनीक माना जाता था, अब लोग इसे रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए भी अपनाने लगे हैं। Tata Motors, Mahindra & Mahindra, MG Motor और BYD जैसी कंपनियां लगातार नए इलेक्ट्रिक मॉडल लॉन्च कर रही हैं।

वहीं टू वीलर बाजार में Ola Electric, Ather Energy और TVS Motor Company जैसी कंपनियां तेजी से अपनी पकड़ मजबूत कर रही हैं। अब अगर सरकार की तरफ से ईवी को लेकर और जोर दिया जाता है, तो यह सेक्टर और तेजी पकड़ सकता है।


पेट्रोल महंगा हुआ तो क्या बदल जाएगा?

ऑटो सेक्टर एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में ईवी की सबसे बड़ी चुनौती अभी तक शुरुआती कीमत रही है। बहुत से लोग ईवी खरीदना चाहते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि इसकी शुरुआती लागत ज्यादा है। लेकिन अगर पेट्रोल और डीजल लगातार महंगे होते हैं, तो लोगों का फोकस कुल खर्च यानी 'रनिंग कॉस्ट' पर ज्यादा जाएगा। ऐसे में ईवी सस्ते विकल्प की तरह नजर आने लगेंगे।

उदाहरण के तौर पर, जहां पेट्रोल कार चलाने में प्रति किलोमीटर खर्च ज्यादा आता है, वहीं इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटरों में यह खर्च काफी कम हो सकता है। यही वजह है कि शहरों में डेली कम्यूट करने वाले लोग तेजी से ईवी की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।


ऑटो कंपनियां भी बदल रही हैं स्ट्रेटजी

प्रधानमंत्री की अपील और वैश्विक हालात को देखते हुए ऑटो कंपनियां भी अपनी स्ट्रेटजी बदल सकती हैं। आने वाले समय में कंपनियां इलेक्ट्रिक मॉडल्स पर ज्यादा फोकस कर सकती हैं।

कई कंपनियां पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि अगले कुछ वर्षों में वे पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में ज्यादा ईवी लॉन्च करेंगी। कुछ कंपनियां तो पूरी तरह इलेक्ट्रिक ब्रांड बनने की दिशा में भी काम कर रही हैं। अगर सरकार की तरफ से अतिरिक्त प्रोत्साहन, टैक्स राहत या सब्सिडी मिलती है, तो ईवी बाजार में और तेजी आ सकती है।


चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि ईवी की मांग बढ़ने की संभावना जरूर दिख रही है, लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अभी भी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर मानी जाती है। मेट्रो शहरों में धीरे-धीरे चार्जिंग स्टेशन बढ़ रहे हैं, लेकिन छोटे शहरों और हाईवे पर अभी भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। बहुत से लोग इसी वजह से ईवी खरीदने में हिचकिचाते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में ईवी क्रांति चाहती है, तो उसे चार्जिंग नेटवर्क पर तेजी से काम करना होगा। क्योंकि बिना मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के सिर्फ अपील से बड़ा बदलाव लाना मुश्किल होगा।


क्या ऑटो बाजार में बड़ा बदलाव आएगा?

ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का मानना है कि आने वाले पांच से दस वर्षों में भारतीय बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। पेट्रोल और डीजल वाहन पूरी तरह खत्म तो नहीं होंगे, लेकिन ईवी का हिस्सा तेजी से बढ़ सकता है।

खासकर शहरी इलाकों में इलेक्ट्रिक स्कूटर और छोटी इलेक्ट्रिक कारें ज्यादा लोकप्रिय हो सकती हैं। वहीं लॉजिस्टिक्स कंपनियां और कैब सर्विसेज भी इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने लग सकती हैं ताकि ईंधन खर्च कम किया जा सके।


आम लोगों की सोच भी बदल रही

कुछ साल पहले तक लोग ईवी को लेकर संशय में रहते थे। उन्हें बैटरी लाइफ, चार्जिंग और परफॉर्मेंस को लेकर चिंता होती थी। लेकिन अब तकनीक बेहतर हुई है और लोगों का भरोसा भी बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी खासकर इलेक्ट्रिक वाहनों को 'फ्यूचर मोबिलिटी' के रूप में देख रही है। वहीं बढ़ती पेट्रोल कीमतों ने भी लोगों को वैकल्पिक विकल्पों के बारे में सोचने पर मजबूर किया है। अगर प्रधानमंत्री की अपील के बाद सरकार और कंपनियां मिलकर जागरूकता अभियान चलाती हैं, तो यह बदलाव और तेज हो सकता है।


सिर्फ बाजार नहीं, पर्यावरण पर भी असर

ईवी को बढ़ावा देने के पीछे सिर्फ तेल बचाना ही कारण नहीं है। इसके जरिए प्रदूषण कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की कोशिश भी की जा रही है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कई बड़े शहर पहले से ही प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहनों को भविष्य के समाधान के तौर पर देखा जा रहा है।


आने वाले समय में क्या हो सकता है?

अगर वेस्ट एशिया का तनाव लंबा चलता है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत में ईवी सेक्टर को बड़ा फायदा मिल सकता है। सरकार भी इस मौके का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को और तेजी से आगे बढ़ाने में कर सकती है।

संभव है कि आने वाले समय में और ज्यादा सब्सिडी, नए चार्जिंग स्टेशन और ईवी फ्रेंडली नीतियां देखने को मिलें। ऑटो कंपनियां भी तेजी से नए मॉडल लॉन्च कर सकती हैं। यानी प्रधानमंत्री की यह अपील सिर्फ ईंधन बचाने की सलाह भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत के ऑटोमोबाइल सेक्टर में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है।