देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले समय में ईंधन और महंगा हो सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर पेट्रोल-डीजल की कीमत में सिर्फ 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है, तो रोज कार से ऑफिस आने-जाने वाले लोगों का मासिक खर्च काफी बढ़ सकता है।

आज के समय में बड़े शहरों में लाखों लोग रोजाना कार से सफर करते हैं। ऐसे में ईंधन की कीमत में छोटी बढ़ोतरी भी सीधे घरेलू बजट पर असर डालती है। खासकर उन लोगों पर ज्यादा दबाव पड़ सकता है जो लंबी दूरी तय करके ऑफिस या बिजनेस के लिए रोज यात्रा करते हैं।

 

आखिर कितना बढ़ सकता है खर्च?

मान लीजिए कोई व्यक्ति रोज 30 से 40 किलोमीटर कार चलाता है। अगर उसकी कार औसतन 15 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती है, तो रोज करीब 2 से 3 लीटर पेट्रोल खर्च होता है।

ऐसे में अगर पेट्रोल की कीमत 3 रुपये प्रति लीटर है, तो रोज का खर्च 6 से 9 रुपये तक बढ़ सकता है। पहली नजर में यह रकम छोटी लग सकती है, लेकिन महीनेभर में यही खर्च 250 से 300 रुपये या उससे ज्यादा तक पहुंच सकता है। जो लोग रोज लंबी दूरी तय करते हैं या बड़ी एसयूवी कार इस्तेमाल करते हैं, उनके लिए यह अतिरिक्त खर्च और ज्यादा हो सकता है।

 

सिर्फ कार मालिक ही नहीं, हर आदमी प्रभावित होता है

पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर सिर्फ निजी वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे बाजार पर दिखाई देता है। दरअसल ट्रक, बस, टैक्सी और माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा डीजल पर निर्भर करता है। जब डीजल महंगा होता है, तो ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ जाती है। इसके बाद फल-सब्जी से लेकर रोजमर्रा के सामान तक की कीमतें प्रभावित होने लगती हैं। यानी ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सीधे आम आदमी की जेब तक पहुंचता है।

 

पश्चिम एशिया का तनाव क्यों बढ़ा रहा चिंता?

विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भू-राजनीतिक हालात से काफी प्रभावित होती हैं। इन दिनों पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का असर घरेलू बाजार पर भी दिखाई देता है। अगर वैश्विक स्तर पर तेल सप्लाई प्रभावित होती है, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।

 

रोजाना यात्रा करने वालों की मुश्किल बढ़ी

मेट्रो शहरों में नौकरी करने वाले लोग पहले से ही ट्रैफिक, टोल और पार्किंग खर्च से परेशान रहते हैं। अब ईंधन की कीमत बढ़ने से उनकी परेशानी और बढ़ सकती है।एक्सपर्ट्स का कहना है कि जिन परिवारों का मासिक बजट पहले से सीमित है, उन्हें सबसे ज्यादा दबाव महसूस हो सकता है। कई लोग अब कार पूलिंग, मेट्रो और पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तरफ भी रुख कर रहे हैं ताकि ईंधन खर्च कम किया जा सके।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ अनुमानित आंकड़े हैं। असली खर्च कार के माइलेज, ट्रैफिक और शहर के हिसाब से अलग हो सकता है। लेकिन इतना तय है कि लगातार बढ़ती ईंधन कीमतें घरेलू बजट को प्रभावित करती हैं।

 

इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ बढ़ रहा झुकाव

पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी EV की मांग तेजी से बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। जब भी ईंधन महंगा होता है, लोग वैकल्पिक विकल्पों की तरफ देखने लगते हैं। यही वजह है कि कई ऑटो कंपनियां अब तेजी से इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर लॉन्च कर रही हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने और इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की अपील की थी। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही, तो EV बाजार को और बड़ा फायदा मिल सकता है।

 

छोटी कारें फिर बन सकती हैं पहली पसंद

एसयूवी कारों का क्रेज तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन अब ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के कारण लोग दोबारा छोटी और ज्यादा माइलेज देने वाली कारों की तरफ लौट सकते हैं। ऑटो एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले समय में हाई माइलेज और हाइब्रिड तकनीक वाली गाड़ियों की मांग बढ़ सकती है। कई कंपनियां पहले से ही ऐसे मॉडल्स पर काम कर रही हैं जो कम ईंधन में ज्यादा दूरी तय कर सकें।

 

शेयर बाजार पर भी पड़ता है असर

ईंधन की कीमतों का असर सिर्फ आम आदमी पर नहीं, बल्कि शेयर बाजार पर भी पड़ता है। जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो ऑटोमोबाइल, एविएशन और लॉजिस्टिक्स कंपनियों पर दबाव बढ़ जाता है। दूसरी तरफ तेल कंपनियों और ऊर्जा सेक्टर के शेयरों में हलचल देखने को मिल सकती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि निवेशक अब पश्चिम एशिया के हालात और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

 

क्या सरकार कीमतें नियंत्रित कर सकती है?

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई फैक्टर्स पर निर्भर करती हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, टैक्स और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति शामिल होती है। सरकार कुछ मामलों में एक्साइज ड्यूटी कम करके राहत देने की कोशिश करती है। पहले भी कई बार केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स घटाकर लोगों को राहत दी है। हालांकि अगर वैश्विक बाजार में तेल लगातार महंगा होता है, तो सरकार के लिए लंबे समय तक कीमतों को नियंत्रित रखना आसान नहीं माना जाता।

 

बदल रही है लोगों की सोच

ईंधन की बढ़ती कीमतों ने लोगों की सोच भी बदलनी शुरू कर दी है। अब सिर्फ कार खरीदना ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता, बल्कि लोग यह भी देखने लगे हैं कि गाड़ी कितना माइलेज देती है और उसका मेंटेनेंस खर्च कितना होगा। यही वजह है कि आजकल 'कॉस्ट ऑफ ओनरशिप' शब्द ऑटोमोबाइल बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

 

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात सामान्य नहीं हुए, तो आने वाले महीनों में तेल बाजार में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में रोज कार से सफर करने वालों का खर्च और बढ़ सकता है। यही कारण है कि लोग अब वैकल्पिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहन और बेहतर माइलेज वाले विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने लगे हैं। फिलहाल इतना साफ है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी आम आदमी की जेब पर बड़ा असर डाल सकती है।