पिछले कुछ समय से भारतीय रुपये पर लगातार दबाव देखने को मिल रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने सरकार, कारोबारियों और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जब भी रुपया कमजोर होता है, उसका असर सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं रहता बल्कि पेट्रोल-डीजल, इलेक्ट्रॉनिक सामान, विदेश यात्रा और कई जरूरी चीजों की कीमतों पर भी पड़ता है।
इसी बीच चर्चा तेज हो गई है कि क्या सरकार और Reserve Bank of India रुपये की गिरावट रोकने के लिए रेपो रेट बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं? रिपोर्ट्स के मुताबिक आर्थिक हालात और विदेशी निवेश के दबाव को देखते हुए इस विकल्प पर चर्चा हो रही है।
आखिर रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?
रुपये की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है। अगर डॉलर की मांग ज्यादा बढ़ जाती है और विदेशी निवेश कम होने लगता है तो रुपया कमजोर पड़ने लगता है।
फिलहाल दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका की ब्याज दरें, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक तनाव जैसे कई कारण भारतीय मुद्रा पर असर डाल रहे हैं।
भारत तेल का बड़ा आयातक देश है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे भी रुपये पर दबाव बढ़ता है।
रेपो रेट क्या होती है?
रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है। जब रेपो रेट बढ़ती है तो बैंकों के लिए पैसा महंगा हो जाता है और वे भी लोन महंगे कर देते हैं।
इसका असर होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन तक पर पड़ता है। दूसरी तरफ जब रेपो रेट घटती है तो बाजार में पैसा सस्ता होता है और खर्च बढ़ने लगता है।यही वजह है कि रेपो रेट को अर्थव्यवस्था का बेहद अहम हथियार माना जाता है।
रुपये को बचाने में रेपो रेट कैसे मदद करती है?
जब किसी देश की ब्याज दरें बढ़ती हैं तो विदेशी निवेशकों को वहां निवेश करना ज्यादा आकर्षक लगने लगता है। क्योंकि उन्हें बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद होती है।
अगर भारत में रेपो रेट बढ़ती है तो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में पैसा लगा सकते हैं। इससे डॉलर का प्रवाह बढ़ता है और रुपये को सहारा मिल सकता है। इसी वजह से कई बार केंद्रीय बैंक मुद्रा को स्थिर रखने के लिए ब्याज दरों में बदलाव करते हैं।
आम लोगों पर भी पड़ेगा असर
अगर रेपो रेट बढ़ती है तो उसका असर सीधे आम लोगों पर भी दिखाई देता है। होम लोन की ईएमआई बढ़ सकती है, कार लोन महंगे हो सकते हैं और बिजनेस के लिए कर्ज लेना कठिन हो सकता है।
यानी एक तरफ सरकार रुपये को संभालने की कोशिश करेगी, लेकिन दूसरी तरफ लोगों की जेब पर बोझ बढ़ सकता है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यही वजह है कि आरबीआई ब्याज दरों पर फैसला लेते समय बहुत सावधानी बरतता है।
महंगाई भी बड़ी चिंता
रुपये की कमजोरी का एक बड़ा असर महंगाई पर पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है तो विदेश से आने वाला सामान महंगा हो जाता है।
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी इसका असर दिखाई देता है क्योंकि तेल आयात डॉलर में होता है। इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं।
अगर महंगाई बढ़ती है तो आम लोगों का घरेलू बजट प्रभावित होता है। यही वजह है कि सरकार और आरबीआई दोनों रुपये को ज्यादा कमजोर नहीं होने देना चाहते।
क्या पहले भी ऐसा हो चुका है?
भारत में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा जब रुपये पर दबाव बढ़ा हो। पहले भी कई बार आरबीआई ने मुद्रा को स्थिर रखने के लिए कदम उठाए हैं।
कभी डॉलर बेचकर बाजार में दखल दिया जाता है, तो कभी ब्याज दरों में बदलाव किया जाता है। कई बार सरकार आयात-निर्यात नीतियों में भी बदलाव करती है ताकि विदेशी मुद्रा का दबाव कम हो। एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी भी देश की मुद्रा पूरी तरह स्थिर नहीं रहती। वैश्विक हालात के हिसाब से उसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं।
शेयर बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
अगर रेपो रेट बढ़ती है तो शेयर बाजार में भी हलचल बढ़ सकती है। क्योंकि महंगे कर्ज का असर कंपनियों के कारोबार पर पड़ता है।
खासकर रियल एस्टेट, ऑटो और बैंकिंग सेक्टर पर इसका सीधा असर देखा जाता है। हालांकि विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना बाजार को कुछ राहत भी दे सकती है। यानी बाजार के लिए यह स्थिति थोड़ी मिली-जुली हो सकती है।
आम लोगों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर किसी ने फ्लोटिंग रेट पर लोन लिया है तो उसे आने वाले समय में ईएमआई बढ़ने की संभावना के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके अलावा निवेशकों को भी जल्दबाजी में फैसले लेने से बचने की सलाह दी जाती है। क्योंकि आर्थिक हालात समय-समय पर बदलते रहते हैं।
सरकार के सामने संतुलन की चुनौती
सरकार और आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे अर्थव्यवस्था, महंगाई और रुपये – तीनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें।
अगर ब्याज दरें ज्यादा बढ़ाई जाती हैं तो आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ सकती हैं। वहीं अगर दरें नहीं बढ़ाई जातीं और रुपया लगातार गिरता है तो महंगाई बढ़ सकती है। यही वजह है कि हर फैसला काफी सोच-समझकर लिया जाता है।
वैश्विक हालात भी करेंगे असर तय
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसकी मुद्रा दबाव में हो। दुनिया के कई देशों की करेंसी पर अमेरिकी डॉलर की मजबूती का असर पड़ा है।
अगर आने वाले समय में वैश्विक हालात सुधरते हैं और विदेशी निवेश फिर से बढ़ता है तो रुपये को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव और अनिश्चितता बनी रहती है तो दबाव जारी रह सकता है।
आने वाले महीनों पर सबकी नजर
फिलहाल बाजार और निवेशकों की नजर आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति बैठक पर टिकी हुई है। लोग जानना चाहते हैं कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला लेता है।
अगर रेपो रेट में बदलाव होता है तो उसका असर सिर्फ बैंकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम लोगों की जेब से लेकर पूरे बाजार तक दिखाई देगा। यानी आने वाले कुछ महीने भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये, दोनों के लिए काफी अहम साबित हो सकते हैं।









