देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में शामिल एयरटेल इन दिनों अपनी नई सर्विस को लेकर जबरदस्त चर्चा में है। कंपनी ने हाल ही में ‘प्रायोरिटी पोस्टपेड’ नाम की नई सुविधा शुरू की है। एयरटेल का दावा है कि इस सर्विस से पोस्टपेड ग्राहकों को ज्यादा बेहतर और स्थिर फाइव-जी नेटवर्क मिलेगा। लेकिन इसी दावे ने अब नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब पैसे ज्यादा देने वालों को बेहतर इंटरनेट मिलेगा और बाकी यूजर्स को कमजोर नेटवर्क झेलना पड़ेगा। यही वजह है कि अब ट्राई और सरकार भी इस मामले पर नजर बनाए हुए हैं।

दरअसल एयरटेल ने अपनी नई सर्विस में ‘फाइव-जी स्लाइसिंग टेक्नोलॉजी’ का इस्तेमाल किया है। कंपनी का कहना है कि इससे नेटवर्क को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर कुछ यूजर्स को ज्यादा बेहतर नेटवर्क एक्सपीरियंस दिया जा सकता है। कंपनी के मुताबिक भीड़भाड़ वाली जगहों पर भी पोस्टपेड यूजर्स को स्मूद इंटरनेट मिलेगा। लेकिन मामला सिर्फ बेहतर इंटरनेट तक सीमित नहीं है। असली बहस ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को लेकर शुरू हुई है। आसान भाषा में समझें तो नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब होता है कि इंटरनेट पर सभी यूजर्स और सभी सर्विस को बराबरी का ट्रीटमेंट मिले। कोई कंपनी पैसे लेकर किसी को तेज इंटरनेट और किसी को धीमा इंटरनेट नहीं दे सकती। अब एयरटेल की नई सर्विस के बाद यही सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या पोस्टपेड यूजर्स को अलग फायदा देकर बाकी लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। 

 

क्या है फाइव-जी स्लाइसिंग टेक्नोलॉजी?

फाइव-जी स्लाइसिंग को समझना थोड़ा जरूरी है क्योंकि पूरा विवाद इसी के आसपास घूम रहा है। आमतौर पर जब हम इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं तो सभी यूजर्स एक ही नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन स्लाइसिंग टेक्नोलॉजी में नेटवर्क को वर्चुअल हिस्सों में बांट दिया जाता है। यानी किसी खास यूजर या खास सर्विस के लिए नेटवर्क का अलग हिस्सा रिजर्व किया जा सकता है। 

मान लीजिए किसी स्टेडियम में हजारों लोग एक साथ इंटरनेट चला रहे हैं। ऐसे में नेटवर्क स्लो हो जाता है। एयरटेल का कहना है कि उसकी नई तकनीक पोस्टपेड ग्राहकों को ऐसी भीड़भाड़ वाली जगहों पर भी बेहतर स्पीड देगी। कंपनी का दावा है कि इससे वीडियो कॉल, ऑनलाइन मीटिंग, स्ट्रीमिंग और गेमिंग का एक्सपीरियंस ज्यादा अच्छा होगा। कंपनी यह भी कह रही है कि यह तकनीक सिर्फ नेटवर्क को ज्यादा स्मार्ट तरीके से मैनेज करती है और इससे बाकी यूजर्स का नुकसान नहीं होगा। एयरटेल का दावा है कि इससे पूरे नेटवर्क की क्षमता बेहतर होती है। 

 

TRAI और सरकार क्यों कर रहे हैं जांच?

एयरटेल की इस नई सर्विस के बाद टेलीकॉम रेगुलेटर ट्राई और डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशन्स यानी डीओटी ने इस पर नजर रखनी शुरू कर दी है। वजह साफ है। भारत में नेट न्यूट्रैलिटी को लेकर पहले भी बड़ी लड़ाई हो चुकी है। कुछ साल पहले फेसबुक की “फ्री बेसिक्स” सर्विस और एयरटेल जीरो को लेकर काफी विवाद हुआ था। उस समय ट्राई ने साफ कहा था कि इंटरनेट पर सभी के लिए बराबरी जरूरी है। 

अब नई चिंता यह है कि अगर पोस्टपेड यूजर्स को बेहतर नेटवर्क मिलेगा तो क्या प्रीपेड यूजर्स को खराब सर्विस मिलेगी। भारत में ज्यादातर लोग प्रीपेड प्लान इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अगर कंपनियां पैसे के हिसाब से नेटवर्क क्वालिटी बांटने लगेंगी तो बड़ा फर्क पैदा हो सकता है। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की तकनीक भविष्य में इंटरनेट के खुले और बराबरी वाले सिस्टम को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस पूरे मॉडल को लेकर जांच और बातचीत शुरू हो गई है। 

 

Airtel का क्या कहना है?

एयरटेल इस पूरे विवाद को अलग नजर से देख रही है। कंपनी का कहना है कि वह किसी ऐप या कंटेंट को प्राथमिकता नहीं दे रही, बल्कि सिर्फ कुछ ग्राहकों को बेहतर नेटवर्क एक्सपीरियंस दे रही है। कंपनी के मुताबिक यह तकनीक दुनिया के कई देशों में पहले से इस्तेमाल हो रही है और इससे नेट न्यूट्रैलिटी का उल्लंघन नहीं होता। एयरटेल का यह भी कहना है कि उसने कई हफ्तों तक इंटरनल टेस्टिंग की और पाया कि फाइव-जी स्लाइसिंग से पूरे नेटवर्क की परफॉर्मेंस बेहतर होती है। कंपनी के अनुसार पोस्टपेड यूजर्स उसके कुल मोबाइल यूजर्स का छोटा हिस्सा हैं, इसलिए बाकी ग्राहकों पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। कंपनी के अधिकारियों का मानना है कि आने वाले समय में फाइव-जी टेक्नोलॉजी के साथ इस तरह की प्रीमियम सर्विस आम हो सकती हैं। 

 

एक्सपर्ट्स की राय भी बंटी 

इस मामले पर एक्सपर्ट्स की राय भी एक जैसी नहीं है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर नेटवर्क स्लाइसिंग सिर्फ बेहतर तकनीकी मैनेजमेंट के लिए इस्तेमाल हो रही है और इसमें किसी ऐप या वेबसाइट को फायदा नहीं दिया जा रहा, तो यह नेट न्यूट्रैलिटी के खिलाफ नहीं माना जाएगा।

वहीं दूसरी तरफ कई टेक एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह शुरुआत है और आगे चलकर कंपनियां इंटरनेट को अलग-अलग कैटेगरी में बांटना शुरू कर सकती हैं। यानी जो ज्यादा पैसे देगा उसे ज्यादा तेज इंटरनेट मिलेगा। इससे इंटरनेट पर बराबरी खत्म हो सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोग मोबाइल इंटरनेट पर निर्भर हैं, वहां इस तरह की तकनीक बहुत सोच-समझकर लागू करनी चाहिए। क्योंकि यहां नेटवर्क ट्रैफिक पहले से काफी ज्यादा रहता है। 

 

क्या आने वाले समय में बदल जाएगा मोबाइल इंटरनेट?

एयरटेल की यह नई सर्विस सिर्फ एक शुरुआत मानी जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दूसरी टेलीकॉम कंपनियां भी भविष्य में ऐसी तकनीक ला सकती हैं। रिलायंस जियो भी नेटवर्क स्लाइसिंग को लेकर दिलचस्पी दिखा चुकी है। अगर रेगुलेटर इस मॉडल को मंजूरी दे देता है तो आने वाले समय में मोबाइल इंटरनेट पूरी तरह बदल सकता है। हो सकता है कि अलग-अलग जरूरत के हिसाब से अलग नेटवर्क क्वालिटी वाले प्लान मिलने लगें। जैसे गेमिंग के लिए अलग नेटवर्क, वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए अलग और बिजनेस यूजर्स के लिए अलग।

लेकिन अगर ट्राई को लगता है कि इससे नेट न्यूट्रैलिटी को खतरा है तो कंपनियों पर सख्त नियम भी लगाए जा सकते हैं। फिलहाल पूरा मामला जांच और चर्चा के दौर में है। कुल मिलाकर एयरटेल की ‘प्रायोरिटी पोस्टपेड’ सर्विस ने भारत में इंटरनेट के भविष्य को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ कंपनियां बेहतर टेक्नोलॉजी और प्रीमियम एक्सपीरियंस की बात कर रही हैं, तो दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि क्या इंटरनेट अब अमीर और आम लोगों में बंटने वाला है। आने वाले दिनों में ट्राई और सरकार का फैसला तय करेगा कि भारत में फाइव-जी इंटरनेट किस दिशा में आगे बढ़ेगा।