भारत में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहां कभी पारले-जी बिस्किट न खाया गया हो। चाय के साथ पारले-जी का रिश्ता ऐसा है कि कई लोगों की सुबह आज भी इसी से शुरू होती है। बचपन में स्कूल जाते वक्त जेब में रखी टॉफियां हों, ट्रेन के सफर में खरीदा गया बिस्किट हो या फिर बीमार होने पर दूध के साथ दिया जाने वाला पारले-जी, ये ब्रांड लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बड़े ब्रांड की शुरुआत एक छोटे दर्जी की दुकान से हुई थी।
आज जिस पारले कंपनी की गिनती देश की सबसे बड़ी FMCG कंपनियों में होती है, उसकी नींव मोहनलाल दयाल चौहान ने रखी थी। एक समय ऐसा था जब वे मुंबई में सिलाई का काम करते थे। लेकिन हालात बदले, मुश्किलें आईं और फिर उन्होंने ऐसा फैसला लिया जिसने भारतीय बाजार की तस्वीर बदल दी।
दर्जी की दुकान से शुरू हुआ सफर
मोहनलाल दयाल चौहान मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे, लेकिन काम की तलाश में मुंबई आ गए थे। उस समय मुंबई तेजी से बढ़ता शहर बन रहा था। उन्होंने विले पारले इलाके में सिलाई का काम शुरू किया। शुरुआत में सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे काम में दिक्कतें आने लगीं। कमाई उतनी नहीं हो रही थी कि परिवार आराम से चल सके। ऐसे में उन्होंने नया रास्ता चुनने का फैसला किया। उन्होंने कपड़ों का काम छोड़कर खाने-पीने के कारोबार में हाथ आजमाया। पहले एक छोटी बेकरी शुरू की, जहां ब्रेड, बन, नानखटाई और दूसरे स्नैक्स बेचे जाते थे। उस दौर में मुंबई में सस्ते बेकरी प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ रही थी और मोहनलाल ने इसी मौके को पहचान लिया।
जर्मनी जाकर सीखी टॉफी और बिस्किट बनाने की कला
मोहनलाल सिर्फ छोटा कारोबार करके खुश नहीं बैठना चाहते थे। वे कुछ बड़ा करना चाहते थे। उस समय भारत में ज्यादातर बिस्किट और टॉफियां विदेशी कंपनियों की हुआ करती थीं। भारतीय बाजार पर अंग्रेजी कंपनियों का दबदबा था। इसी दौरान देश में स्वदेशी आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था। लोगों के बीच भारतीय चीजों को अपनाने की भावना बढ़ रही थी। मोहनलाल ने इसी मौके को समझा और जर्मनी जाने का फैसला किया। वहां उन्होंने कन्फेक्शनरी यानी टॉफी और बिस्किट बनाने की तकनीक सीखी। सिर्फ सीखकर ही नहीं लौटे, बल्कि मशीनें भी खरीदकर भारत लाए। बताया जाता है कि उस दौर में उन्होंने करीब 60 हजार रुपये खर्च करके जर्मनी से मशीनें मंगवाई थीं, जो उस समय बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।
पांच बेटों के साथ मिलकर शुरू की पारले कंपनी
साल 1928-29 के आसपास मोहनलाल दयाल ने अपने पांच बेटों के साथ मिलकर कंपनी की शुरुआत की। उनके बेटों के नाम मानेकलाल, पीतांबर, नरोत्तम, कांतिलाल और जयंतीलाल थे। परिवार ने मिलकर मुंबई के विले पारले इलाके में एक छोटी फैक्ट्री शुरू की। कंपनी का नाम भी इसी इलाके के नाम पर रखा गया, पारले। शुरुआत में यहां टॉफियां, कैंडी और दूसरी मिठाइयां बनाई जाती थीं। उस समय फैक्ट्री में सिर्फ 12 लोग काम करते थे और परिवार के सदस्य खुद मशीन संभालने से लेकर पैकिंग तक हर काम करते थे।
जब अंग्रेजों के दौर में आया भारतीय बिस्किट
उस समय बिस्किट अमीर लोगों की चीज मानी जाती थी। ज्यादातर बिस्किट विदेशों से आते थे और काफी महंगे होते थे। आम भारतीय परिवार के लिए उन्हें खरीदना आसान नहीं था। मोहनलाल दयाल ने सोचा कि क्यों न ऐसा बिस्किट बनाया जाए जो आम आदमी भी खरीद सके। इसके बाद साल 1938-39 में पारले ने अपना पहला बिस्किट लॉन्च किया, जिसका नाम रखा गया पारले ग्लूको। बाद में यही पारले-जी बना। इसमें जी का मतलब पहले ग्लूकोज माना जाता था। धीरे-धीरे ये बिस्किट लोगों के घरों तक पहुंचने लगा और देखते ही देखते बेहद लोकप्रिय हो गया।
आजादी के बाद तेजी से बढ़ा कारोबार
जब देश आजाद हुआ तो लोगों के बीच भारतीय ब्रांड्स को लेकर भरोसा और बढ़ गया। पारले-जी को इसका सीधा फायदा मिला। ये सस्ता भी था और आसानी से हर दुकान पर मिल जाता था। गांव से लेकर शहर तक इसकी पहुंच बनने लगी। धीरे-धीरे कंपनी ने सिर्फ बिस्किट तक खुद को सीमित नहीं रखा। टॉफी, कैंडी, नमकीन और दूसरे प्रोडक्ट्स भी बाजार में आने लगे। मेलोडी, पॉपिन्स, मैंगो बाइट, मोनाको और क्रैकजैक जैसे प्रोडक्ट्स ने भी लोगों के दिल में जगह बना ली। खास बात ये है कि कई प्रोडक्ट्स आज भी दशकों बाद उसी लोकप्रियता के साथ बिक रहे हैं।
मेलोडी टॉफी ने फिर बना दी चर्चा
हाल ही में मेलोडी टॉफी फिर से चर्चा में आ गई। इसकी वजह बनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकात। मुलाकात के दौरान पीएम मोदी ने मेलोनी को मेलोडी टॉफी गिफ्ट की थी। इसके बाद सोशल मीडिया पर “मेलोडी” को लेकर मीम्स और मजेदार पोस्ट वायरल होने लगे। लोगों को फिर से अपने बचपन की याद आने लगी।
परिवार में बंट गया कारोबार
समय के साथ पारले परिवार का कारोबार भी अलग-अलग हिस्सों में बंट गया। बाद में पारले से तीन बड़ी कंपनियां बनीं। पारले प्रोडक्ट्स, पारले एग्रो और बिसलेरी अलग-अलग हिस्सों में चले गए।आज पारले प्रोडक्ट्स का कारोबार विजय चौहान और उनका परिवार संभाल रहा है। वहीं पारले एग्रो फ्रूटी और ऐप्पी जैसे ड्रिंक्स के लिए जाना जाता है। बिसलेरी भी इसी परिवार से जुड़ा बड़ा नाम है।
दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट में शामिल हुआ पारले-जी
पारले-जी सिर्फ भारत में ही नहीं, दुनिया भर में मशहूर हो चुका है। कई रिपोर्ट्स में इसे दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले बिस्किट ब्रांड्स में गिना गया। इसकी सबसे बड़ी ताकत रही इसकी कीमत और भरोसा। महंगाई बढ़ती रही, बाजार बदला, विदेशी कंपनियां आईं, लेकिन पारले-जी अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहा। एक समय ऐसा भी आया जब पारले-जी भारत का पहला ऐसा एफएमसीजी ब्रांड बना जिसकी सालाना रिटेल बिक्री 5 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच गई। हर महीने करोड़ों पैकेट बिकने लगे।
सिर्फ बिस्किट नहीं, लोगों की यादों का हिस्सा है पारले
पारले-जी की सबसे बड़ी खासियत यही है कि ये सिर्फ एक बिस्किट नहीं रहा, बल्कि लोगों की यादों का हिस्सा बन गया। किसी के लिए ये बचपन की याद है, किसी के लिए हॉस्टल के दिनों का सहारा और किसी के लिए चाय का सबसे भरोसेमंद साथी। मोहनलाल दयाल चौहान ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक छोटी बेकरी से शुरू हुआ उनका काम एक दिन इतना बड़ा साम्राज्य बन जाएगा। लेकिन उनकी मेहनत, दूरदर्शिता और भारतीय बाजार की समझ ने पारले को वो पहचान दी जो आज करीब 100 साल बाद भी कायम है।









