पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़ा राजनीतिक विषय बन गया है। राज्य के मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari ने हाल ही में बड़ा बयान देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में सीएए को पूरी तरह लागू किया जा रहा है और जिन लोगों को अवैध घुसपैठिया माना जाएगा, उन्हें पकड़कर बीएसएफ के हवाले किया जाएगा। इसके बाद राज्य की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है।
दरअसल, पश्चिम बंगाल लंबे समय से बांग्लादेश सीमा से सटे होने की वजह से घुसपैठ के मुद्दे पर राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। भाजपा लगातार आरोप लगाती रही है कि सीमा पार से बड़ी संख्या में लोग अवैध तरीके से राज्य में प्रवेश करते हैं और इसका असर सुरक्षा, जनसंख्या संतुलन और चुनावी राजनीति पर पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देखता रहा है।
शुभेंदु अधिकारी ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सीएए के दायरे में आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई समुदाय के लोगों को नई व्यवस्था के तहत संरक्षण मिलेगा। लेकिन जिन लोगों की पहचान अवैध घुसपैठिया के रूप में होगी, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने साफ कहा कि ऐसे लोगों को पुलिस पकड़कर बीएसएफ को सौंपेगी और फिर उन्हें डिपोर्ट किया जाएगा।
उन्होंने ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ यानी पहचान करो, रिकॉर्ड से हटाओ और फिर निर्वासित करो वाली नीति का भी जिक्र किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार का दावा है कि घुसपैठियों की पहचान और रिकॉर्ड से हटाने का काम शुरू हो चुका है और अब अगला चरण डिपोर्टेशन का होगा।
आखिर CAA है क्या?
नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA को केंद्र सरकार ने साल 2019 में पारित किया था। इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न की वजह से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया।
हालांकि इस कानून को लेकर देशभर में बड़ा विवाद भी हुआ था। कई लोगों और संगठनों ने आरोप लगाया कि यह कानून धर्म के आधार पर नागरिकता तय करता है। वहीं केंद्र सरकार का कहना रहा कि यह कानून किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता छीनने के लिए नहीं बल्कि पीड़ित अल्पसंख्यकों को राहत देने के लिए बनाया गया है।
पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा इतना बड़ा क्यों?
पश्चिम बंगाल की सीमा बांग्लादेश से लगती है और कई जिलों में सीमा बेहद संवेदनशील मानी जाती है। भाजपा लंबे समय से दावा करती रही है कि राज्य में अवैध घुसपैठ एक गंभीर समस्या है। चुनावों के दौरान भी यह मुद्दा बार-बार उठाया जाता रहा है।
अब जब भाजपा की सरकार बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने हैं तो माना जा रहा है कि वह इस मुद्दे पर आक्रामक रणनीति अपना रहे हैं। हाल ही में सरकार ने सीमा क्षेत्रों में बीएसएफ को जमीन हस्तांतरित करने और बॉर्डर फेंसिंग तेज करने का फैसला भी लिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य सरकार ने कहा है कि सीमा सुरक्षा से जुड़े कामों को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि अवैध आवाजाही रोकी जा सके।
विपक्ष क्या कह रहा है?
हालांकि विपक्ष इस पूरे मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि भाजपा बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है। कई नेताओं ने कहा कि सीएए और घुसपैठ के नाम पर आम लोगों में डर का माहौल बनाया जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस पहले भी सीएए और एनआरसी का विरोध करती रही है। पार्टी का कहना रहा है कि इससे गरीब और दस्तावेजहीन लोगों को परेशानी हो सकती है। हालांकि नई सरकार बनने के बाद राज्य की राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल चुका है।
BSF की भूमिका क्यों अहम?
इस पूरे मामले में बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। क्योंकि बांग्लादेश सीमा की निगरानी बीएसएफ ही करती है। शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि जिन लोगों की पहचान घुसपैठिया के रूप में होगी, उन्हें बीएसएफ को सौंपा जाएगा।
दरअसल, किसी भी अवैध विदेशी नागरिक को वापस भेजने की प्रक्रिया में सीमा सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी भूमिका होती है। इसमें पहचान, दस्तावेज और दूसरे देशों के साथ समन्वय जैसे कई चरण शामिल होते हैं। यही कारण है कि यह प्रक्रिया कानूनी और प्रशासनिक रूप से काफी जटिल मानी जाती है।
बंगाल में बदलती राजनीति का संकेत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी की नई घोषणाएं सिर्फ प्रशासनिक फैसले नहीं बल्कि बड़े राजनीतिक संदेश भी हैं। भाजपा लंबे समय से बंगाल में कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार और घुसपैठ जैसे मुद्दों को उठाती रही है। अब सत्ता में आने के बाद पार्टी इन्हीं वादों को लागू करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
हाल के दिनों में शुभेंदु अधिकारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आयोग बनाने, पुलिस सुधार और हिंसा पर सख्त कार्रवाई जैसे कई बड़े ऐलान किए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में 'सिस्टमेटिक चेंज' यानी व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाया जाएगा। यही वजह है कि उनकी सरकार के शुरुआती फैसलों को भाजपा समर्थक निर्णायक कार्रवाई के तौर पर देख रहे हैं, जबकि विपक्ष इन्हें राजनीतिक एजेंडा बता रहा है।
क्या शुरू हो सकती है नई कानूनी बहस?
CAA और डिपोर्टेशन को लेकर एक बार फिर कानूनी और संवैधानिक बहस तेज हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति को अवैध घुसपैठिया घोषित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। सिर्फ संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसके अलावा डिपोर्टेशन प्रक्रिया में केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय नियमों की भी भूमिका होती है। यही कारण है कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर अदालतों और राजनीतिक मंचों दोनों पर बहस बढ़ सकती है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
सीमा से लगे इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे सुरक्षा के लिहाज से जरूरी कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ लोगों को डर है कि कहीं असली भारतीय नागरिकों को भी परेशान न होना पड़े। हालांकि सरकार का दावा है कि CAA के तहत आने वाले समुदायों को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी और कार्रवाई सिर्फ अवैध घुसपैठियों के खिलाफ होगी।
फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल में CAA और घुसपैठ का मुद्दा आने वाले महीनों में और ज्यादा राजनीतिक गर्मी पैदा कर सकता है। शुभेंदु अधिकारी सरकार के इस नए रुख ने साफ संकेत दे दिए हैं कि राज्य की राजनीति अब पूरी तरह नए दौर में प्रवेश कर चुकी है।









