आज जब भी कॉमनवेल्थ गेम्स का नाम आता है तो भारत को मजबूत दावेदारों में गिना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब भारत को इन खेलों में सिर्फ एक मेडल मिला था? आज वही भारत 564 पदकों के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में सबसे सफल देशों में शामिल है। ग्लासगो 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भारत का यह सफर सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों की मेहनत, संघर्ष और लगातार बेहतर होते प्रदर्शन की मिसाल भी है।
1934 में मिला था पहला मेडल
भारत ने पहली बार 1934 के कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया था। उस समय खेलों को ब्रिटिश एम्पायर गेम्स कहा जाता था। भारत को उस एडिशन में सिर्फ एक कांस्य पदक मिला था। यह मेडल पहलवान राशिद अनवर ने जीता था। यही भारत के कॉमनवेल्थ इतिहास की पहली उपलब्धि बनी। उस दौर में भारत का खेल ढांचा आज जैसा मजबूत नहीं था। खिलाड़ियों के पास सीमित सुविधाएं थीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव भी कम था।
धीरे-धीरे बढ़ता गया भारत का दम
पहले कुछ संस्करणों में भारत का प्रदर्शन सामान्य रहा, लेकिन समय के साथ खिलाड़ियों की संख्या बढ़ी और तैयारियां भी बेहतर होती गईं। 1958 में भारत ने दो स्वर्ण पदक जीतकर दुनिया का ध्यान खींचा। इसके बाद 1960 और 1970 के दशक में भारत ने कुश्ती, भारोत्तोलन और एथलेटिक्स जैसे खेलों में लगातार अच्छा परफॉर्म करना शुरू किया। यहीं से भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स सिर्फ भागीदारी नहीं, बल्कि मेडल जीतने का मंच बन गए।
1990 के बाद आई बड़ी छलांग
1990 के दशक से भारतीय खेलों में बड़ा बदलाव देखने को मिला। खिलाड़ियों को बेहतर ट्रेनिंग, विदेशी कोच और आधुनिक सुविधाएं मिलने लगीं। इसका असर कॉमनवेल्थ गेम्स में भी दिखा। भारत की मेडल संख्या लगातार बढ़ती गई और देश शीर्ष देशों की सूची में अपनी जगह मजबूत करने लगा।
2010 दिल्ली गेम्स रहे ऐतिहासिक
भारत के कॉमनवेल्थ इतिहास का सबसे यादगार पल 2010 में आया, जब देश ने पहली बार इन खेलों की मेजबानी की। दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 101 पदक जीते। इनमें 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य पदक शामिल थे। यह भारत का अब तक का सबसे बेस्ट परफॉर्मेंस माना जाता है। उस समय पूरे देश में खिलाड़ियों के प्रदर्शन की खूब चर्चा हुई और कई नए सितारे सामने आए।
किन खेलों ने दिलाए सबसे ज्यादा मेडल?
अगर भारत के कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड पर नजर डालें तो कुछ खेल हमेशा देश की ताकत रहे हैं। सबसे ज्यादा सफलता कुश्ती, भारोत्तोलन, निशानेबाजी और बॉक्सिंग में मिली है। इन खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने सालों तक लगातार मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया।महिला खिलाड़ियों ने भी पिछले कुछ सालों में शानदार प्रदर्शन किया है। वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, कुश्ती और बॉक्सिंग में भारतीय बेटियों ने कई स्वर्ण पदक अपने नाम किए।
अब तक 564 मेडल जीत चुका है भारत
1934 से लेकर 2022 तक भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 564 पदक जीते हैं। इनमें 203 गोल्ड, 190 सिल्वर और 171 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। इस शानदार प्रदर्शन के दम पर भारत ऑल-टाइम मेडल तालिका में चौथे स्थान पर है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि शुरुआती दौर में भारत की शुरुआत सिर्फ एक कांस्य पदक से हुई थी।
ग्लासगो 2026 में चुनौती थोड़ी अलग
इस बार ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स पहले के मुकाबले कुछ अलग होंगे। आयोजन छोटा रखा गया है और कई ऐसे खेल इस बार कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं, जिनमें भारत परंपरागत रूप से अच्छा परफॉर्म करता रहा है। क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, कुश्ती और टेबल टेनिस जैसे कुछ प्रमुख खेलों के बाहर रहने से भारत की मेडल संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ी उपलब्ध खेलों में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं।
भारत की नई पीढ़ी पर रहेंगी नजरें
ग्लासगो में इस बार कई युवा खिलाड़ियों के साथ अनुभवी सितारों से भी उम्मीदें रहेंगी। हर प्रतियोगिता भारत के लिए सिर्फ मेडल जीतने का मौका नहीं होगी, बल्कि आने वाले एशियन गेम्स और ओलंपिक की तैयारी का भी अहम हिस्सा होगी। अगर युवा खिलाड़ी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन करते हैं तो भारत का भविष्य और भी मजबूत दिखाई देगा।
2030 में फिर भारत करेगा मेजबानी
भारत के खेल प्रेमियों के लिए एक और बड़ी खुशखबरी यह है कि 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी अहमदाबाद को मिलने की तैयारी है। अगर सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार हुआ तो करीब दो दशक बाद एक बार फिर कॉमनवेल्थ गेम्स भारत की धरती पर आयोजित होंगे। इससे देश के खेल ढांचे और खिलाड़ियों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है।
सिर्फ मेडल नहीं, बदली है सोच
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की सफलता सिर्फ पदकों तक सीमित नहीं है। पिछले तीन दशकों में देश में खेलों को लेकर सोच भी बदली है। आज छोटे शहरों और गांवों से निकलकर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सरकार, खेल संस्थाएं और निजी क्षेत्र भी खिलाड़ियों को पहले से ज्यादा सहयोग दे रहे हैं। यही वजह है कि भारत अब सिर्फ हिस्सा लेने नहीं, बल्कि जीतने के इरादे से मैदान में उतरता है।
हमारी राय
1934 में एक कांस्य पदक से शुरू हुआ भारत का कॉमनवेल्थ सफर आज 564 मेडल तक पहुंच चुका है। यह उपलब्धि दिखाती है कि लगातार मेहनत, बेहतर सुविधाएं और खिलाड़ियों के प्रति बढ़ता समर्थन किस तरह किसी देश की खेल संस्कृति को बदल सकता है। ग्लासगो 2026 में भले ही भारत के पसंदीदा कुछ खेल शामिल नहीं हैं, लेकिन भारतीय खिलाड़ियों से एक बार फिर शानदार प्रदर्शन की उम्मीद रहेगी। आने वाले वर्षों में भारत का लक्ष्य सिर्फ मेडल जीतना नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे मजबूत खेल शक्तियों में अपनी जगह और पक्की करना होगा।









