कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के कई खिलाड़ी पदक की उम्मीद जगाए हुए हैं। इनमें एक नाम ऐसा भी है, जिसकी कहानी सिर्फ खेल तक सीमित नहीं है, बल्कि संघर्ष, हिम्मत और कभी हार न मानने के जज्बे की मिसाल है। यह नाम है भारतीय पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार का।
बिहार के रहने वाले झंडू कुमार आज भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। आर्थिक तंगी, परिवार की जिम्मेदारियां और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा। हालात ऐसे भी आए जब उन्हें अपनी ट्रेनिंग जारी रखने के लिए ई-रिक्शा चलाना पड़ा और बाद में उसी ई-रिक्शा को बेचकर खेल का खर्च उठाया। आज उसी मेहनत का नतीजा है कि झंडू कुमार ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए पहला पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। उन्होंने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग प्रतियोगिता में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया और भारत का मेडल खाता खोला।
बिहार के छोटे शहर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक
झंडू कुमार बिहार के नालंदा जिले के हरनौत इलाके से आते हैं। साधारण परिवार में जन्मे झंडू बचपन से ही चुनौतियों का सामना करते रहे। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन खेलों के प्रति उनका जुनून हमेशा बना रहा। पैरा पावरलिफ्टिंग में उन्होंने अपना करियर बनाने का फैसला किया और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनानी शुरू की।
जब परिवार चलाने के लिए चलाया ई-रिक्शा
साल 2021 में कोरोना महामारी के दौरान हालात और मुश्किल हो गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परिवार की सब्जी की दुकान बंद हो गई थी। ऐसे में घर चलाने की जिम्मेदारी बढ़ गई। मजबूरी में झंडू कुमार ने ई-रिक्शा चलाना शुरू किया ताकि परिवार की मदद कर सकें और अपनी ट्रेनिंग भी किसी तरह जारी रख सकें।
सपने के लिए बेच दिया ई-रिक्शा
कुछ समय बाद जब ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं का खर्च बढ़ा, तो झंडू कुमार ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपना ई-रिक्शा बेच दिया ताकि उस पैसे से ट्रेनिंग, यात्रा और प्रतियोगिताओं का खर्च उठा सकें। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि वही उनकी कमाई का जरिया भी था। लेकिन उनके लिए देश के लिए खेलने का सपना सबसे बड़ा था।
मेहनत रंग लाई
लगातार मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। झंडू कुमार ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और पैरा पावरलिफ्टिंग में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी अपने नाम किया और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका हासिल किया।
कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट
शानदार प्रदर्शन के दम पर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई। उनका सिलेक्शन सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि बिहार और पूरे देश के लिए गर्व की बात है। ग्लासगो में होने वाले इन खेलों में उनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है।
सिर्फ मेडल नहीं, बड़ी सोच भी
झंडू कुमार कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ एक प्रतियोगिता तक सीमित नहीं है। वे अपनी ताकत और प्रदर्शन को लगातार बेहतर बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि उन्होंने प्रतियोगिता में 206 किलो वजन उठाया है और ट्रेनिंग के दौरान 210 किलो तक लिफ्ट कर चुके हैं। उनका आखिरी सपना 2028 लॉस एंजिलिस पैरालंपिक में देश के लिए पदक जीतना है।
पैरा खिलाड़ियों के लिए बन गए प्रेरणा
झंडू कुमार की कहानी उन खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है जो आर्थिक तंगी या दूसरी परेशानियों की वजह से अपने सपने छोड़ने का सोचते हैं। उन्होंने साबित किया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो मुश्किल हालात भी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकते। आज उनकी मेहनत लाखों युवाओं को यह संदेश दे रही है कि सफलता के लिए सुविधाओं से ज्यादा जरूरी जुनून और लगातार मेहनत है।
भारत को उनसे क्यों हैं उम्मीदें?
भारत ने पिछले कुछ सालों में पैरा खेलों में शानदार प्रदर्शन किया है। पैरालंपिक, एशियन पैरा गेम्स और दूसरी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों ने कई पदक जीते हैं। अब कॉमनवेल्थ गेम्स में भी झंडू कुमार जैसे खिलाड़ी इस उम्मीद को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी ताकत, अनुशासन और लगातार बेहतर प्रदर्शन उन्हें भारत के प्रमुख दावेदारों में शामिल करता है।
पैरा पावरलिफ्टिंग क्या होती है?
पैरा पावरलिफ्टिंग में खिलाड़ी बेंच प्रेस के जरिए अधिकतम वजन उठाते हैं। इस खेल में शरीर के ऊपरी हिस्से की ताकत, संतुलन और तकनीक सबसे ज्यादा मायने रखती है। दुनिया के सबसे कठिन शक्ति-आधारित खेलों में इसकी गिनती होती है। खिलाड़ियों को महीनों तक कड़ी ट्रेनिंग करनी पड़ती है और हर लिफ्ट के दौरान पूरी एकाग्रता बनाए रखनी होती है।
संघर्ष की कहानी से मिली नई पहचान
आज झंडू कुमार सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि संघर्ष की मिसाल बन चुके हैं। जिस खिलाड़ी ने कभी परिवार चलाने के लिए ई-रिक्शा चलाया, वही आज भारत की जर्सी पहनकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतरने जा रहा है। यह सफर बताता है कि सपनों की कीमत मेहनत से चुकानी पड़ती है और जो हार नहीं मानते, वही इतिहास लिखते हैं।
हमारी राय
झंडू कुमार की कहानी खेल से कहीं बड़ी है। यह कहानी बताती है कि आर्थिक तंगी, संसाधनों की कमी और मुश्किल हालात किसी इंसान के सपनों को नहीं रोक सकते, अगर उसके भीतर आगे बढ़ने का जज्बा हो। ई-रिक्शा चलाने से लेकर उसे बेचकर ट्रेनिंग का खर्च उठाने तक का उनका सफर लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। अब पूरे देश को गर्व है कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में झंडू कुमार ने अपने संघर्ष को एक पदक के साथ यादगार बना दिया।









