वर्तमान में पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी अनिश्चितता के द्वार खोल दिए हैं। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापारिक मार्गों के लिए काफी हद तक इस क्षेत्र पर निर्भर है, इस संघर्ष के प्रतिकूल प्रभावों से अछूता नहीं है। EY की 'इकोनॉमी वॉच' रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में 1% तक की गिरावट आ सकती है और खुदरा मुद्रास्फीति अनुमान से 1.5% अधिक बढ़ सकती है।
जीडीपी वृद्धि दर पर ब्रेक: 7% से 6% का गिरता ग्राफ
भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी हुई है। सरकार और विभिन्न रेटिंग एजेंसियों ने वित्त वर्ष 2027 तक भारत की विकास दर 7% के आसपास रहने का अनुमान लगाया था। हालांकि, पश्चिम एशिया के संघर्ष ने इन सुनहरे अनुमानों पर काले बादल मंडरा दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अग यह तनाव वित्त वर्ष 2027 तक जारी रहता है, तो भारत की जीडीपी विकास दर घटकर 6% के करीब रह सकती है।
इस गिरावट का मुख्य कारण निवेश में कमी और उत्पादन लागत में वृद्धि है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनिश्चितता बढ़ती है, तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों जैसे सोना या अमेरिकी डॉलर में लगाने लगते हैं। इसके अलावा, संघर्ष के कारण वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने से कच्चा माल महंगा हो जाता है, जिससे घरेलू उद्योगों की उत्पादन क्षमता और प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित होती है। अगर विकास दर में 1% की भी कमी आती है, तो इसका सीधा असर रोजगार सृजन और बुनियादी ढांचे के विकास पर पड़ता है।
महंगाई की मार: तेल की कीमतें और आम आदमी की जेब
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85-90% आयात करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। किसी भी प्रकार का क्षेत्रीय संघर्ष तेल की कीमतों में उछाल लाता है। ईवाई रिपोर्ट का अनुमान है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) 4% के स्तर पर रखने का लक्ष्य रखता है, बढ़कर 5.5% तक पहुंच सकती है। जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो डीजल और पेट्रोल महंगे हो जाते हैं।
चूंकि भारत में माल ढुलाई का एक बड़ा हिस्सा सड़कों के जरिए होता है, इसलिए ईंधन महंगा होने से फल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। इसके साथ ही, उर्वरक और रसायनों जैसे पेट्रो-केमिकल आधारित उद्योगों की लागत बढ़ने से खेती और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर दोहरी मार पड़ती है। महंगाई बढ़ने का मतलब है कि आम आदमी की क्रय शक्ति कम हो जाएगी, जिससे बाजार में मांग घटेगी और आखिरकार अर्थव्यवस्था का पहिया धीमा हो जाएगा।
आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और व्यापारिक चुनौतियां
पश्चिम एशिया केवल तेल का स्रोत नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक गलियारा भी है। लाल सागर और स्वेज नहर के माध्यम से होने वाला व्यापार इस संघर्ष के कारण पहले ही प्रभावित हो रहा है। मालवाहक जहाजों को अब लंबे रास्तों का चुनाव करना पड़ रहा है, जिससे न केवल समय अधिक लग रहा है बल्कि समुद्री माल ढुलाई की दरों में भी भारी वृद्धि हुई है। भारत के निर्यात क्षेत्र, विशेष रूप से कृषि उत्पाद, रत्न और आभूषण, और इंजीनियरिंग सामान, इस बढ़ी हुई लागत के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो रहे हैं।
अगर व्यापारिक मार्ग असुरक्षित रहते हैं, तो भारत के निर्यात लक्ष्य प्रभावित होंगे, जिससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं जो भारत को भारी मात्रा में प्रेषण भेजते हैं। वहां अस्थिरता होने पर इन प्रवासियों की सुरक्षा और उनके द्वारा भेजे जाने वाले धन में कमी आने की आशंका भी बनी रहती है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज कैसे बनी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा?
पश्चिम एशिया के संघर्ष में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) की भूमिका सबसे संवेदनशील है। ओमान और ईरान के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण 'ऑयल चोकपॉइंट' है। वैश्विक कच्चे तेल के कुल व्यापार का लगभग 20% से 25% हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। भारत के लिए इसकी अहमियत और भी अधिक है क्योंकि हमारे तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है।
अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आना तय है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मार्ग के बंद होने या असुरक्षित होने की स्थिति में कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकते हैं।
भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है, यह स्थिति विनाशकारी हो सकती है। इससे न केवल देश का व्यापार घाटा बढ़ेगा, बल्कि रुपये की कीमत में भी भारी गिरावट आएगी। मालभाड़े और बीमा लागत में वृद्धि से घरेलू स्तर पर हर आवश्यक वस्तु महंगी हो जाएगी, जिससे EY द्वारा अनुमानित 1.5% की अतिरिक्त मुद्रास्फीति की आशंका और भी प्रबल हो जाती है।
पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक चुनौती नहीं बल्कि एक गंभीर आर्थिक चेतावनी भी है। 1% जीडीपी का नुकसान और 1.5% अतिरिक्त महंगाई भारतीय मध्यम वर्ग और गरीब तबके के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती है। भारत को इस स्थिति से निपटने के लिए अपनी ऊर्जा निर्भरता में विविधता लाने, रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत करने और वैकल्पिक व्यापार मार्गों पर तेजी से काम करने की आवश्यकता है। आने वाले समय में वैश्विक शांति ही भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के सपने को सुरक्षित रख सकती है।









