आज की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में हम थके थके से रहते हैं जबकि काम पहले से कम है। नई तकनीक ने हमारे काम को आज बहुत आसान बना दिया है। इसके बावजूद न तो हम अपने परिवार वालों को टाइम दे पाते हैं न ही खुद के लिए क्वालिटी टाइम स्पेंड कर पाते हैं। कई लोग तो शारीरिक रूप से इतने अस्वस्थ हो जाते हैं कि उन्हें मनोरोग विशेषज्ञ के पास इलाज के लिए जाना पड़ जाता है। आखिर ऐसा क्या हो रहा है हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कि सारी सुख सुविधा होने के बावजूद अंदर से इतने थके थके से रहने लगे हैं। आज इस आर्टिकल में हम यही बात पता लगाने की कोशिश करेंगे।

 

आज सुबह अलार्म की आवाज से आंख खुलते ही थकान महसूस होने लगती है। दिनभर सिर्फ एक जगह सिस्टम पर बैठे रहने के बावजूद शाम तक एनर्जी वीक हो जाती है। रात को बिस्तर पर जाते वक्त यही सोचते हैं कि आज तो कुछ किया ही नहीं। आखिर इतना थकान कैस हो जाता है? ये आज की दौड़भाग भरी जिंदगी में बेहद आम चीज बनती जा रही है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब मशीनें, तकनीक और सुविधाएं हमारे काम को पहले से आसान बना चुके हैं तो फिर हम पहले से ज्यादा थके हुए क्यों रहते हैं?

 

आज मानसिक तनाव ज्यादा है

 

दरअसल, आजकल हम शारीरिक रूप से काम कम लेकिन एक जगह पर सिस्टम के सामने लंबे समय तक बैठे रहते हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है। हमारा दिमाग एक ही बात को बार बार सोचता रहता है। लंबे समय तक गहराई से सोचने के कारण हमारा सर दर्द करने लगता है। अगर आप पुरानी पीढ़ी देखेंगे तो पाएंगी कि पहले शारीरिक मेहनत बहुत थी लेकिन मानसिक थकान उतनी नहीं। लेकिन आज हम शरीर से कम काम करते हैं। ऑफिस की डेडलाइन, सोशल मीडिया, मैसेज, कॉल एंड ईमेल...इन सबके बीच हमारा दिमाग कभी शांत नहीं रहता।

 

मल्टीटास्किंग का भार

 

आज हमें ये सिखाया जाता है कि स्मार्टनेस के साथ काम करो। मल्टीटास्क करने की क्षमता ही आपको आगे ले जाएगी। दरअसल, हम खुद को हर एक इंसान से तुलना करने लग जाते हैं। हमारा टारगेट बस इतना ही होगा है कि इस इंसान से आगे निकल जाए तो हमारा करियर सेट है जबकि ये गलत बात है और इससे मानसिक थकान बढ़ता है। रिचार्ज के मुताबिक, मल्टिटास्किंग हमारे दिमाग को ज्यादा थका देती है। काम भले ही कम हो लेकिन मन बहुत जल्दी थक जाता है।

 

स्क्रीन टाइम का ज्यादा होना

 

आज तकनीकी उपकरण का उपयोग करते करते हमे इसकी लत लग गई है। जब भी हम अकेले होते हैं सिर्फ फोन या लैपटॉप यही देखते रहते हैं। फिर जब काम पर होते हैं तो ये मेंडेटरी हो जाता है क्यों इनके बिना ऑफिस का काम ही नहीं होगा। ऐसे में आपको अधिकतर समय स्क्रीन देखते रहते हैं। स्क्रीन टाइम जैसे जैसे बढ़ता जाता है वैसे वैसे हमारा नींद का सर्कल भी बिगड़ता जाता है। इस कारण हमें जल्दी नींद भी नहीं आता। जिस वजह से हमारी लाइफस्टाइल निगाह जाती है जिसका असर सीधे तौर पर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।

 

लगातार तुलना करने की बुरी आदत

 

तुम जो हो, जैसे भी हो अच्छे हो। दूसरों की तरह बनने की कोशिश मत करो। लेकिन आज हम हर छोटी बातों पर खुद kk दूसरों के साथ तुलना करने लगते हैं। हम हर रोज एक रेस में भाग रहे हैं जहां हम सभी लोगों से आगे निकलना चाहते हैं लेकिन सच तो ये है कि हमारा मुकाबला हमारे अंदर मौजूद हमारी कमियों से है न कि इन बाहरी लोगों से। जब हम लोगों से खुद की तुलना करते हैं तो हर वक्त ये हंस डिप्रेशन देता रहता है...सबसे पिछड़े होने का डर और फैल होने का डर। इस वजह से हम दबाव में जीने लगते हैं ।

 

इमोशनली वीकनेस भी है अहम कारण

 

                                                             Image Credit: Canva 

 

आज हम बहुत ज्यादा इमोशनल वीक हो चुके हैं। सिर्फ काम से नहीं बल्कि रिश्तों को निभाने का दबाव, करियर में आगे बढ़ने की चिंता, भविष्य को लेकर असुरक्षा हमें अंदर ही अंदर खाए जा रही है। कई बार हम इसे पहचान नहीं पाते लेकिन यही आगे चलकर हमें भावनात्मक रूप से कमजोर कर देता है।

 

क्या सच में काम पहले से कम हो गया है

 

आज अच्छे से देखें तो काम का स्वरूप भले बदला है लेकिन काम कम नहीं हुआ। पहले शारीरिक मेहनत ज्यादा थी आज मानसिक मेहनत ज्यादा है। दिमाग लगाकर किया जाने वाला काम ज्यादा एनर्जी लॉस्ट करता है। यहीं वजह है कि दिन के अंत में हमें लगता है कि हमने कुछ खास नहीं किया लेखक हमने सच में बहुत काम किया होता है।

 

क्या है थकान से निकालने का रास्ता

 

इस थकान से निकलने का समाधान है अपनी लाइफस्टाइल को संतुलित करना। हर समय ऑनलाइन रहने की आदत को थोड़ा कम करना चाहिए। नींद को प्राथमिकता देने से लाइफस्टाइल ठीक हो जाएगी और थकान कम हो जाएगा। याद रखें, आज की थकान सर्द शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक भी हैं। ऐसे में योग व्यायाम से लेकर मेडिटेशन करना बेहद जरूरी है। अच्छा खाना खाना और सही समय पर खाना खाना जरूरी है। स्क्रीन टाइम कम करना पड़ेगा और इनडोर या आउटडोर गेम खेलने से मन बहला रहेगा। जितना हो सके लोगों से बात करें तो बेहतर है। याद रखें, सच्ची ऊर्जा मशीनों से नहीं बल्कि संतुलित और अचेत जीवन जीने से आती है।