अक्सर जब हम सिख धर्म की पहचान की बात करते हैं, तो हमारे ज़हन में सबसे पहले पगड़ी या दस्तार की छवि उभरती है। आमतौर पर लोग इसे सिख पुरुषों से जोड़कर देखते हैं, लेकिन बीते कुछ वर्षों में एक और तस्वीर तेज़ी से उभरकर सामने आई है—सिख महिलाएं भी गर्व के साथ दस्तार बांधती हैं। यह सिर्फ़ एक पहनावा नहीं, बल्कि आस्था, आत्मसम्मान और बराबरी का प्रतीक है। 

 

आखिर कई सिख महिलाएं पगड़ी क्यों पहनती हैं? 

 

क्या यह परंपरा है, धार्मिक आदेश है या फिर किसी सोच का प्रतीक? दस्तार: सिर्फ़ कपड़ा नहीं, पहचान का ताज है। सिख धर्म में दस्तार को सिर्फ़ सिर ढकने का साधन नहीं माना जाता। यह सम्मान, आत्म-गौरव और ज़िम्मेदारी का प्रतीक है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने जब खालसा पंथ की स्थापना की, तब उन्होंने सिखों को पांच ककार दिए—केश, कंघा, कड़ा, कछेरा और कृपाण। इनमें केश (बिना कटे बाल) और उन्हें सम्मान के साथ ढकने के लिए दस्तार का महत्व बेहद खास है। सिख धर्म में स्त्री और पुरुष के बीच कोई भेद नहीं किया गया। यही वजह है कि दस्तार पहनना सिर्फ़ पुरुषों तक सीमित नहीं है। सिख महिलाएं जब पगड़ी पहनती हैं, तो वह इस बराबरी की भावना को खुले तौर पर स्वीकार और प्रदर्शित करती हैं।

 

1.धर्म में बराबरी की भावना 

 

सिख धर्म शुरू से ही लैंगिक समानता की बात करता है। गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी तक, हर गुरु ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर सम्मान दिया। दस्तार पहनकर सिख महिलाएं यह संदेश देती हैं कि आस्था में कोई जेंडर भेद नहीं। 

 

2.आत्मसम्मान और आत्मविश्वास 

 

कई सिख महिलाओं के लिए दस्तार पहनना आत्मविश्वास की पहचान है। यह उन्हें याद दिलाता है कि वे किसी से कम नहीं हैं। आज की सिख महिलाएं कहती हैं कि पगड़ी उन्हें मजबूत महसूस कराती है—भीड़ में अलग, लेकिन गर्व के साथ। 

 

3.केश की मर्यादा 

 

जो महिलाएं केश रखती हैं, उनके लिए दस्तार एक सम्मानजनक तरीका है अपने बालों को संभालने और ढकने का। यह उनकी धार्मिक आस्था से जुड़ा निजी फैसला होता है। 

 

पगड़ी पहनना परंपरा या व्यक्तिगत चुनाव? 

 

यह समझना ज़रूरी है कि हर सिख महिला दस्तार नहीं पहनती, और न ही यह किसी पर थोपी गई परंपरा है। सिख धर्म में ज़बरदस्ती का कोई स्थान नहीं है। कई महिलाएं चुननी, दुपट्टा या सिर्फ़ खुले बालों के साथ भी अपनी आस्था निभाती हैं। जो महिलाएं दस्तार पहनती हैं, वह अक्सर अपनी मर्ज़ी, समझ और सोच से यह फैसला लेती हैं। यही बात इस परंपरा को और भी सशक्त बनाती है। आज के दौर में दस्तार और सिख महिलाएं आज सोशल मीडिया और बदलती सोच के दौर में सिख महिलाओं की दस्तार एक नई पहचान बन चुकी है। कॉलेजों, कॉर्पोरेट ऑफिसों, खेल के मैदानों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दस्तार पहनी सिख महिलाएं अब आम नज़ारा बन रही हैं। कई युवा सिख महिलाएं कहती हैं कि पहले लोग हैरानी से देखते थे, सवाल पूछते थे, लेकिन अब वही दस्तार उनकी ताकत बन चुकी है। 

 

                                            Image Credit: gemini 

 

यह सिर्फ़ धर्म की बात नहीं, बल्कि अपनी पहचान को बिना झिझक स्वीकार करने का साहस है। समाज की सोच और चुनौतियां हालांकि रास्ता आसान नहीं रहा। दस्तार पहनने वाली सिख महिलाओं को कई बार गलतफहमियों, तानों और सवालों का सामना करना पड़ा है। लोग पूछते हैं—“क्या ये ज़रूरी है?”, “क्या ये मर्दों वाली चीज़ नहीं?” लेकिन इन्हीं सवालों के जवाब में सिख महिलाएं कहती हैं— दस्तार किसी की जागीर नहीं, यह सम्मान का प्रतीक है। धीरे-धीरे समाज की सोच भी बदल रही है। लोग अब इसे फैशन या अजीब परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और आत्मसम्मान का चुनाव मानने लगे हैं। 

 

दस्तार: जिम्मेदारी का एहसास भी

 

सिख परंपरा में दस्तार पहनने का मतलब सिर्फ़ पहचान नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी है। दस्तारधारी व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह सच, साहस और सेवा के रास्ते पर चले। सिख महिलाएं जब दस्तार पहनती हैं, तो वे भी इस जिम्मेदारी को अपनाती हैं—चाहे वह समाज में सही के लिए खड़े होना हो या दूसरों की मदद करना। क्यों खास है सिख महिलाओं की दस्तार? क्योंकि यह सिर्फ़ धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक सशक्त संदेश है— कि आस्था में बराबरी है, पहचान में गर्व है और चुनाव में आज़ादी। आज की सिख महिला दस्तार के ज़रिए यह साबित कर रही है कि परंपरा और आधुनिकता एक साथ चल सकती हैं। वह अपनी जड़ों से जुड़ी है, लेकिन अपने फैसलों में स्वतंत्र भी। 

 

सिख महिलाएं जब सिर पर दस्तार सजाती हैं, तो वह सिर्फ़ कपड़ा नहीं बांधतीं— वे इतिहास, आस्था, आत्मसम्मान और बराबरी की सोच को अपने साथ लेकर चलती हैं। दस्तार उनके लिए पहचान भी है और ज़िम्मेदारी भी। और शायद यही वजह है कि आज यह सवाल सिर्फ़ “क्यों पहनती हैं?” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कितने गर्व के साथ पहनती हैं, में बदल चुका है। दस्तार और नई पीढ़ी की सोच आज की युवा सिख महिलाएं दस्तार को सिर्फ़ धार्मिक पहचान के तौर पर नहीं देखतीं, बल्कि इसे आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम मानती हैं। उनके लिए पगड़ी पहनना किसी दबाव या परंपरा का बोझ नहीं, बल्कि एक सचेत चुनाव है। कॉलेज कैंपस, वर्कप्लेस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दस्तार पहनी सिख महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि आस्था और आधुनिक जीवनशैली एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। 

 

कई युवतियां बताती हैं कि जब उन्होंने पहली बार दस्तार बांधी, तो लोगों की निगाहें बदलीं, सवाल भी आए। लेकिन समय के साथ वही दस्तार उनकी पहचान बन गई। यह बदलाव सिर्फ़ उनके अंदर नहीं आया, बल्कि समाज की सोच में भी धीरे-धीरे जगह बनाने लगा। आज दस्तार को देखकर जिज्ञासा के साथ सम्मान भी जुड़ने लगा है। दस्तार: परंपरा से आगे एक सामाजिक संदेश सिख महिलाओं की दस्तार एक शांत लेकिन मजबूत सामाजिक संदेश भी देती है—कि महिलाएं अपनी पहचान खुद तय कर सकती हैं। यह संदेश उन रूढ़ियों को चुनौती देता है, जो सदियों से महिलाओं के पहनावे और भूमिका को सीमाओं में बांधती आई हैं। दस्तार पहनी सिख महिलाएं यह दिखाती हैं कि सम्मान किसी पोशाक से नहीं, बल्कि सोच और कर्म से जुड़ा होता है। यही वजह है कि आज दस्तार सिर्फ़ गुरुद्वारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सामाजिक बराबरी और आत्मसम्मान की एक जीवित मिसाल बन चुकी है।