जब भी बात इस्लाम की होती है तो हमारे दिमाग में पहले से एक सोच जो बचपन से विकसित है कि ये धर्म आदेशों और पाबंदियों वाला धर्म है। नमाज, रोजा और जकात- दरअसल, दूर से देखने पर ये सिर्फ हमें धार्मिक मान्यता भर लगती हैं। लेकिन आज हम इसे धार्मिक मान्यता से हटकर psychology के एंगल से देखेंगे। ऐसा करने पर इस्लाम धर्म की एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। आप सबके मन में ये सवाल होंगे कि ये सारे नियम क्यों, इस्लाम में इन नियमों का इतनी कठोरता से पालन क्यों किया जाता है आदि। आज इस आर्टिकल में हम आपके हर सवालों का जवाब देंगे। आज हम बिना किसी धर्म के प्रचार, बिना धर्म की तुलना किए हुए और सिर्फ सोच और समझ के आधार पर इन बातों का विष्लेषण करने वाले हैं। 

 

बिना किसी नियमित रोजमर्रा के कैसी होगी जिंदगी 

 

दरअसल, इस्लाम धर्म में नमाज, रोजा और जकात ये रोजमर्रा की जिंदगी का एक नियम बना दिया जाता है। ये लोगों को अल्लाह से जोड़ने में बेहद मददगार साबित होता है। अच्छा सोचने, अच्छा काम करने, लोगों की मदद करने के लिए अग्रसर रखता है। अगर आपकी दिनचर्या में कोई नियम-कानून नहीं है तो आपका दिल और दिमाग बेचैन हो जाएगा। आपकी जिंदगी लक्ष्यहीन हो जाएगी...यानि न तो जिंदगी का कोई उद्देश्य रहेगा न ही जिंदगी में कुछ पाने की चाह। जब आपका दिमाग कुछ नया नहीं सोचेगा तो ऐसे में आप धीरे-धीरे मानसिक असंतुलन का शिकार हो जाएंगे जो न तो आपके लिए सही है न ही आपके परिवार वालों के लिए। ये आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी बाधा बनकर रह जाएगी। यदि आप इस चीज से नहीं निकल पाएंगे तो जिंदगी में बहुच पीछे रह जाएंगे। इस्लाम धर्म में नमाज, रोजा और जकात ये तीनों रोजमर्रा के कामों में अनुशासन से करने की सीख देता है, मन को शांत रखता है। 

 

नमाज से मिलती है मानसिक शांति

 

इस्लाम धर्म में हर रोज नमाज अदा करने की परंपरा है। नमाज पढ़ने से मानसिक शांति मिलती है। यदि आपका मन शांत रहेगा तो ही आप वास्तविक तौर पर खुश रह पाएंगे। इस्लाम धर्म में दिन में 5 बार नमाज अदा करने की परंपरा है। दूसरे धर्म के लोगों को ये बहुत ज्यादा ही पाबंदी नजर आती है। लेकिन psychology के एंगल से देखें तो नमाज हमारे दिनचर्या को छोटे-छोटे mental checkpoints में बांट देती है। इसका ये फायदा होता है कि आपके जिंदगी में भार कम हो जाता है। इंसान को बार-बार रुककर सोचने का मौका देती है। ऐसे में तनाव, गुस्सा और अहंकार को नमाज खत्म करने में मददगार साबित होती है।

 

रोजा से मिलता है सेल्फ कंट्रोल

 

                                                                       Image Credit: Canva 

इस्लाम में रोजे को बहुत ही पवित्र माना जाता है। इसका एक अपना खास महत्व होता है। psychology कहती है कि रोजे से आप खुद को सेल्फ कंट्रोल करने में सक्षम हो पाते हैं। psychology के मुताबिक, इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है Impulse Control की कमी। जो मन में आया खा लेते हैं, जब गुस्सा आया फूट पड़ता है, दिल और दिमाग पर कंट्रोल नहीं और न ही अपनी दिनचर्या में किसी चीज पर कंट्रोल रह पाता है। लेकिन इस्लाम में रोजा इसी impulsive nature को खत्म करने में मददगार साबित होता है। रोजे के दौरान ये हमें अधिक खाने से रोकता है जिससे हम अपने कामों में ज्यादा फोकस होकर ध्यान दे पाते हैं। हल्का पेट दिमाग को तंदरुस्त रखता है। साथ ही साथ रोजा हमारे आंतरिक गुस्से को कम करता है। तुरंत फैसला लेने की क्षमता विकसित करता है, साथ ही साथ बुरी आदतों को छुड़वा देता है जिससे हमारा तन और मन दोनों पवित्र हो जाता है। इस तरह, रोजा रखकर जब हम अपने शरीर को 1 महीने के लिए इस तरह तैयार कर लेते हैं तो हमारी जिंदगी काफी हद तक सकारात्मकता की ओर बढ़ने लगती है, हम आध्यात्म की ओर आकर्षित होते हैं। यहीं वजह है कि इस्लाम में बच्चे से लेकर बुजुर्ग सभी रोजा करते हैं। उन्हें बचपन से ही रोजा रखने की सलाह दी जाती है। इन लोगों में कई क्षमताएं विकसित हो जाती हैं। जैसे ये emotionally strong होते हैं, addiction से बाहर निकलना उनके लिए बहुत आसान हो जाता है, decision-making की क्षमता बेहतर हो जाती है। 

 

जकात से मिलती है मानसिक शांति

 

इस्लाम में जकात को भी काफी अहम माना जाता है। आखिर ये जकात है क्या और इसके क्या फायदे हैं आइए psychology के एंगल से इसका पता लगाते हैं। आजकल पैसा ही इंसान की सबसे बड़ी चिंता है, पैसे का डर ही लोगों के अंदर सबसे बड़ा डर है और पैसों के प्रति यहीं आकर्षण लोगों को मानसित और शारीरिक रूप से तनाव देता है। लेकिन इस्लाम में जकात यहीं चीज को तोड़ने में मदद करती है। जकात लोगों को satisfied और emotionally stable बनाने में मददगार होता है। जकात इंसान को सिखाता है कि पैसा मालिक नहीं है बल्कि जिम्मेदारियों को पूरा करने का जरिया मात्र है। ये बस जरूरत है...अगर आवश्यकता से अधिक है तो एक-दूसरे की मदद करो। ये पुण्य और इंसानियत के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है। दुनिया में अमन-चैन कायम करने की सीख देता है। 

 

इस्लाम जो Guilt नहीं, Balance पर आधारित सिस्टम है

 

नमाज, रोजा और जकात की अहमियत को जानकर आप भी यहीं कहेंगे कि psychology के एंगल से देखें तो इस्लाम Guilt नहीं, Balance पर आधारित सिस्टम है जो हमें एक संतुलित और आध्यात्मिक जीवन जीने का तरीका बताती है। हर दिन कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित करती है। खुद को आध्यात्म के साथ जोड़े रखने में मददगार होती है। खुशहाल जिंदगी जीने और गुस्से को नियंत्रित करने में इस्लाम धर्म अहम भूमिका निभाती है। इस्लाम कहता है कि अपनी गलती को स्वीकारो और फिर उसे सुधार लो। कोई भी इंसान perfect नहीं होता बल्कि responsible होना जरूरी है।