हर माता-पिता का बच्चों को पालने का स्टाइल अलग-अलग होता है। कोई बहुत सख्ती से रखता है, कोई पूरी छूट देता है। लेकिन जब ये बैलेंस बिगड़ जाता है और पेरेंट्स का बिहेवियर टॉक्सिक हो जाता है, तो इसका प्रभाव सिर्फ बचपन तक नहीं रहता।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि शुरुआती सालों में जो अनुभव मिलते हैं, वो इंसान के पूरे जीवन और उसके पर्सनैलिटी पर गहरा असर डालते हैं। टॉक्सिक पेरेंटिंग से बच्चे बड़े होकर कई समस्याओं का सामना करते हैं। ये समस्याएं उनके रिश्तों, करियर और मेंटल हेल्थ को प्रभावित करती हैं। आइए देखते हैं कि गलत परवरिश वयस्कता में कैसे अपना रंग दिखाती है।
भावनाओं को व्यक्त करने में मुश्किल
बचपन में अगर माता-पिता टॉक्सिक थे, तो बच्चे बड़े होकर अपनी फीलिंग्स को सही से एक्सप्रेस नहीं कर पाते। जैसे गुस्सा, खुशी या दुख – ये सब उन्हें महसूस करने में दिक्कत होती है। ब्रेन बचपन के दर्द से बचने के लिए खुद को प्रोटेक्ट करता है। ऐसे लोग अक्सर इमोशनली डिटैच्ड हो जाते हैं। वे रोना या हंसना भी नॉर्मल तरीके से नहीं कर पाते। उदाहरण के लिए, अगर बचपन में हर छोटी बात पर डांट मिली हो, तो बड़ा होकर वे अपनी बात रखने से पहले सोचते हैं कि कहीं कोई बुरा न मान जाए।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये आदत ब्रेन के इमोशनल सेंटर को प्रभावित करती है। नतीजा ये होता है कि ऐसे लोग रिश्तों में ठंडे पड़ जाते हैं। दोस्त या पार्टनर सोचते हैं कि वो इंटरेस्ट नहीं लेते, लेकिन असल में ये बचपन का डर है जो उन्हें रोकता है। कई स्टडीज में पाया गया है कि बचपन की ट्रॉमा से लोग इमोशनल नंबनेस का शिकार हो जाते हैं। इससे डिप्रेशन या एंग्जायटी बढ़ सकती है। ऐसे लोग थेरेपी में जाते हैं तो धीरे-धीरे अपनी फीलिंग्स को पहचानना सीखते हैं। लेकिन अगर अनट्रीटेड छोड़ दिया जाए, तो जीवन भर ये समस्या बनी रहती है। परिवार में भी ये लोग अपनी बात नहीं कह पाते, जिससे गलतफहमियां बढ़ती हैं।
रिश्तों में प्यार स्वीकार करने की समस्या
टॉक्सिक पेरेंटिंग से गुजरे लोग रिश्तों में प्यार को एक्सेप्ट करने में हिचकते हैं। उन्हें लगता है कि कोई उन्हें बिना शर्त प्यार नहीं कर सकता। बचपन में अगर प्यार कंडीशनल था, जैसे अच्छा बर्ताव करो तभी प्यार मिलेगा, तो बड़ा होकर ये लोग खुद को लायक नहीं समझते। इससे असुरक्षा बढ़ती है। या तो वे रिश्तों से दूर भागते हैं या फिर पार्टनर से बहुत चिपक जाते हैं, एंग्जायटी की वजह से। मनोवैज्ञानिक इसे अटैचमेंट इश्यू कहते हैं। बचपन में अगर माता-पिता ने इग्नोर किया या क्रिटिसाइज किया, तो वयस्कता में ट्रस्ट बिल्ड नहीं होता।
ऐसे लोग डेटिंग में जल्दी ब्रेकअप कर लेते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि पार्टनर छोड़ देगा। कई केस में ये लोग टॉक्सिक रिलेशनशिप में फंस जाते हैं क्योंकि उन्हें नॉर्मल लगता है। थेरेपिस्ट कहते हैं कि ऐसे लोगों को सेल्फ-लव सीखना पड़ता है। पहले खुद को वैल्यू दें, तब दूसरों से प्यार एक्सेप्ट कर पाएं। ये समस्या करियर में भी असर डालती है, क्योंकि कॉन्फिडेंस कम होता है। दोस्ती में भी ये लोग क्लोज नहीं हो पाते, हमेशा दूरी बनाए रखते हैं।
परिवार बनाने और जिम्मेदारी से डर
जिन लोगों ने बचपन में टॉक्सिक एनवायरमेंट देखा, वे शादी या बच्चे जैसी जिम्मेदारियों से डरते हैं। उन्हें लगता है कि कहीं वे भी अपने पेरेंट्स जैसा बर्ताव न करने लगें। ये डर इतना गहरा होता है कि वे सिंगल रहना पसंद करते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये ट्रॉमा का साइकल है। बचपन की पीड़ा को अगली जेनरेशन तक नहीं ले जाना चाहते। ऐसे लोग मैरिज प्रपोजल रिजेक्ट कर देते हैं या रिश्तों को सीरियस नहीं लेते। कई बार वे फैमिली प्लानिंग से बचते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अच्छे पेरेंट नहीं बन पाएंगे।
स्टडीज में पाया गया है कि टॉक्सिक पेरेंटिंग से लोग कमिटमेंट फोबिया का शिकार हो जाते हैं। इससे उनकी लाइफ में अकेलापन बढ़ता है। थेरेपी में ये लोग अपने डर को फेस करते हैं और सीखते हैं कि वे अलग हो सकते हैं। लेकिन अगर नहीं हैंडल किया तो जीवन भर रिग्रेट रहता है। सोसाइटी में भी ये लोग आउटसाइडर फील करते हैं क्योंकि फैमिली न होने से सोशल प्रेशर बढ़ता है।
अपनी उपस्थिति छिपाने की आदत
बचपन में अगर बच्चे को बार-बार टोका गया या नीचा दिखाया गया, तो बड़ा होकर वे अपनी राय रखने से घबराते हैं। पब्लिक प्लेस में खुद को बैकग्राउंड में रखते हैं। अपनी अचीवमेंट्स पर बात नहीं करते। इससे करियर ग्रोथ रुक जाती है। मनोवैज्ञानिक इसे लो सेल्फ-एस्टिम कहते हैं।
ऐसे लोग मीटिंग में चुप रहते हैं, प्रोमोशन मिस कर जाते हैं। दोस्तों में भी अपनी ओपिनियन नहीं देते। ये आदत बचपन से आती है जब पेरेंट्स ने उनकी बात नहीं सुनी। इससे कॉन्फिडेंस कम होता है। कई लोग थेरेपी से इसे ठीक करते हैं, लेकिन बिना हेल्प के जीवन भर संघर्ष करते रहते हैं। सोशल लाइफ भी प्रभावित होती है क्योंकि लोग उन्हें इग्नोर करने लगते हैं।
झगड़े से बचने के लिए झूठ का सहारा
टॉक्सिक पेरेंटिंग से गुजरे लोग कॉन्फ्लिक्ट से बचने के लिए झूठ बोलते हैं। बचपन में छोटी गलतियों पर सजा मिली तो सच बोलने से डर लगता है। घर में पीस बनाए रखने के लिए असत्य कहते हैं। इससे रिश्तों में ट्रस्ट कम होता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये आदत मेंटल हेल्थ को खराब करती है। ऐसे लोग गिल्ट फील करते हैं लेकिन रोक नहीं पाते। सोशल सर्कल में भी प्रॉब्लम होती है क्योंकि लोग झूठ पकड़ लेते हैं। थेरेपी से ट्रुथफुलनेस सीखी जा सकती है। लेकिन अनट्रीटेड छोड़ने से रिलेशनशिप ब्रेक होते हैं।
दूसरों पर भरोसा करने में परेशानी
अगर पेरेंट्स ने बच्चे पर बेवजह शक किया, तो बड़ा होकर ट्रस्ट इश्यू होता है। हर व्यक्ति को डाउट से देखते हैं। रिश्तों में धोखे की आशंका रहती है। मनोवैज्ञानिक इसे पैरानॉइड थिंकिंग कहते हैं। ऐसे लोग फ्रेंड्स या पार्टनर पर शक करते रहते हैं। इससे रिलेशनशिप टूटते हैं। थेरेपी में ट्रस्ट बिल्डिंग एक्सरसाइज की जाती है। लेकिन बिना हेल्प के जीवन में अकेलापन बढ़ता है।
बचपन की यादें भूलने की कोशिश
कष्टदायक बचपन वाले लोग यादों को दबा देते हैं। बचपन की बात पर टॉपिक चेंज कर देते हैं। ब्रेन का ये सेफ्टी मैकेनिज्म है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इससे आगे नहीं बढ़ पाते। थेरेपी से यादों को फेस करना सीखते हैं। अनदेखा करने से डिप्रेशन बढ़ता है। ऐसे लोग दूसरों को खुश रखने में अपनी एनर्जी लगाते हैं।
अपनी जरूरतें इग्नोर करते हैं। 'नो' नहीं कह पाते। इससे मेंटल हेल्थ खराब होती है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये सेल्फ-नेग्लेक्ट है। थेरेपी से बैलेंस सीखते हैं। लेकिन बिना चेंज के बर्नआउट होता है। बचपन की सजा का डर बना रहता है। छोटी मिस्टेक पर पैनिक हो जाते हैं। हमेशा वर्स्ट केस सोचते हैं। इससे एंग्जायटी डिसऑर्डर होता है। थेरेपी से इसे कंट्रोल करते हैं। लेकिन अनट्रीटेड छोड़ने से जीवन तनावपूर्ण रहता है।









