जब भी हम किसी अस्पताल में जाते हैं, वहां डॉक्टर के बाद जिस शख्स पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है, वह होती हैं नर्स। मरीज चाहे कितना भी परेशान क्यों न हो, एक नर्स की आवाज, उसकी देखभाल और उसका व्यवहार अक्सर मरीज को आधा ठीक कर देता है। यही वजह है कि भारत समेत कई देशों में नर्स को सिर्फ 'नर्स' नहीं बल्कि 'सिस्टर' कहकर बुलाया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर नर्स को सिस्टर क्यों कहा जाता है? इसका रिश्ता सिर्फ अस्पताल से नहीं, बल्कि इतिहास, धर्म, सेवा और इंसानियत से जुड़ा हुआ है।

आज 12 मई को पूरी दुनिया में इंटरनेशनल नर्स डे मनाया जा रहा है। यह दिन आधुनिक नर्सिंग की जनक मानी जाने वाली फ्लोरेंस नाइटिंगेल (Florence Nightingale) की जयंती पर मनाया जाता है। इसी मौके पर जानिए कि नर्स के साथ 'सिस्टर' शब्द कैसे जुड़ा और क्यों आज भी यह संबोधन सम्मान का प्रतीक माना जाता है।


धार्मिक संस्थाओं से शुरू हुई थी यह परंपरा

नर्स को 'सिस्टर' कहने की शुरुआत कई सौ साल पहले यूरोप के चर्च और धार्मिक संस्थाओं से मानी जाती है। उस समय अस्पतालों का संचालन ज्यादातर चर्च या धार्मिक संगठन करते थे। वहां बीमारों की सेवा करने वाली महिलाएं अक्सर 'नन' होती थीं। यानी वे महिलाएं जिन्होंने अपना जीवन मानव सेवा और धर्म के लिए समर्पित कर दिया था।

ईसाई धर्म में नन को 'सिस्टर' कहा जाता है। जब ये महिलाएं अस्पतालों में मरीजों की देखभाल करती थीं, तब लोग सम्मान से उन्हें 'सिस्टर' कहकर बुलाने लगे। धीरे-धीरे यह संबोधन इतना लोकप्रिय हो गया कि बाद में प्रोफेशनल नर्सिंग शुरू होने के बाद भी यह शब्द चलता रहा।


मरीजों के लिए परिवार जैसा सहारा बन जाती थीं नर्स

पुराने समय में अस्पताल आज की तरह आधुनिक नहीं थे। इलाज के साधन सीमित थे और मरीजों की हालत अक्सर गंभीर रहती थी। ऐसे समय में नर्स ही मरीजों का सबसे बड़ा सहारा बनती थीं। वे सिर्फ दवा नहीं देती थीं, बल्कि मरीज का हौसला बढ़ाती थीं, उसका ध्यान रखती थीं और हर वक्त उसके साथ रहती थीं।

धीरे-धीरे लोगों को महसूस होने लगा कि नर्स सिर्फ अस्पताल का स्टाफ नहीं, बल्कि परिवार की किसी बहन जैसी होती है। वह मरीज की तकलीफ समझती है, उसकी चिंता करती है और पूरी संवेदनशीलता के साथ उसकी देखभाल करती है। यही वजह है कि 'सिस्टर' शब्द में अपनापन और सम्मान दोनों जुड़ गए।


फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने बदली नर्सिंग की तस्वीर

जब नर्सिंग की बात होती है तो फ्लोरेंस नाइटिंगेल (Florence Nightingale) का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उन्हें आधुनिक नर्सिंग की जनक कहा जाता है। 19वीं सदी में उन्होंने नर्सिंग को एक व्यवस्थित और सम्मानजनक पेशे के रूप में स्थापित किया। क्राइमियन युद्ध के दौरान उन्होंने घायल सैनिकों की सेवा की और रात-रात भर मरीजों की देखभाल करती थीं। इसी वजह से उन्हें 'लेडी विद द लैम्प' भी कहा गया।

फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने यह साबित किया कि नर्स सिर्फ डॉक्टर की सहायक नहीं होती, बल्कि मरीज की जिंदगी बचाने में उसकी भूमिका बेहद अहम होती है। उनके काम के बाद पूरी दुनिया में नर्सिंग को नया सम्मान मिला। आज भी 12 मई को इंटरनेशनल नर्स डे उनके जन्मदिन पर ही मनाया जाता है।


भारत में भी काफी प्रचलित है सिस्टर शब्द

भारत में सरकारी और निजी अस्पतालों में आज भी नर्स को सिस्टर कहकर बुलाना आम बात है। खासकर पुराने अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में यह संबोधन ज्यादा सुनने को मिलता है। कई जगहों पर हेड सिस्टर या सिस्टर इंचार्ज जैसे पदनाम भी इस्तेमाल होते हैं।

हालांकि अब पुरुष नर्स भी बड़ी संख्या में इस पेशे में आ रहे हैं, इसलिए कई जगह नर्सिंग ऑफिसर या स्टाफ नर्स जैसे शब्दों का इस्तेमाल बढ़ा है। फिर भी आम लोगों के बीच सिस्टर शब्द आज भी सम्मान और भरोसे का प्रतीक बना हुआ है।


सिर्फ नौकरी नहीं, सेवा का दूसरा नाम है नर्सिंग

नर्सिंग को अक्सर सेवा का पेशा कहा जाता है। डॉक्टर इलाज की योजना बनाते हैं, लेकिन मरीज की दिन-रात देखभाल नर्स ही करती है। मरीज को समय पर दवा देना, उसकी हालत पर नजर रखना, मानसिक सहारा देना और मुश्किल समय में परिवार को संभालना, यह सब काम नर्स करती है।

कोरोना महामारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे नर्सों ने अपनी जान की परवाह किए बिना लाखों मरीजों की सेवा की। कई नर्स महीनों तक अपने परिवार से दूर रहीं, लेकिन मरीजों का साथ नहीं छोड़ा। उस समय लोगों को फिर महसूस हुआ कि नर्स को 'सिस्टर' क्यों कहा जाता है, क्योंकि वह सच में एक परिवार की तरह मरीज का ध्यान रखती है।


बदलते समय में भी कायम है यह सम्मान

आज मेडिकल साइंस बहुत आगे बढ़ चुका है। अस्पतालों में नई तकनीक आ गई है, इलाज के तरीके बदल गए हैं, लेकिन नर्स के लिए 'सिस्टर' शब्द का महत्व अब भी बना हुआ है। यह सिर्फ एक संबोधन नहीं, बल्कि उस भरोसे और सम्मान का प्रतीक है जो समाज नर्सों को देता है। एक मरीज जब दर्द में होता है, तब सबसे पहले जिस चेहरे पर उसे भरोसा होता है, वह अक्सर नर्स का ही होता है। शायद यही वजह है कि दुनिया बदलने के बाद भी यह परंपरा खत्म नहीं हुई।

आज इंटरनेशनल नर्स डे के मौके पर उन सभी नर्सों को सलाम, जो दिन-रात दूसरों की जिंदगी बचाने में लगी रहती हैं। क्योंकि सच कहा जाए तो अस्पतालों की असली धड़कन सिर्फ मशीनें नहीं, बल्कि वे 'सिस्टर्स' हैं जो हर मरीज के चेहरे पर उम्मीद लौटाने का काम करती हैं।