संकट मोचन बजरंग बली का जन्मोत्सव आज, यानि 2 अप्रैल को श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। हनुमान जयंती के अवसर पर भक्तों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। सुबह से मंदिरों में भक्तों की लंबी लाइनें लग रही हैं। घरों में भी विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। कहीं सुंदरकांड का पाठ हो रहा है, तो कहीं संगीतमय हनुमान चालीसा गायी जा रही है।
चैत्र पूर्णिमा के दिन हनुमान जी की विधिपूर्वक पूजा के साथ व्रत रखने का महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ हनुमान जी का पूजन करने से स्वास्थ्य, दोष और भय से निजात मिल सकता है।
आज हनुमान जयंती के पावन अवसर पर, उस अद्भुत कथा के बारे में जानिए जो किसी चमत्कार से कम नहीं था. यह कथा पवित्र रामायणकाल की है, जब भगवान हनुमान ने भरी सभा में अपना सीना चीर कर दिखाया था, और यह प्रमाणित किया की उनके हृदय में राम और सीता बसते हैं
शास्त्रों के अनुसार, हनुमान शाश्वत और अमर हैं। रामायण में हनुमान जी के बारे में बहुत विस्तार से जानकारी दी गई है। हर किसी को वह छंद याद है, जिसमें श्री राम भक्त हनुमान ने अपने सीने को चीरकर यह सिद्ध कर दिया कि रामचंद्र जी से बड़ा भक्त कोई नहीं है। अब जानते हैं कि हनुमान जी को अपना सीना चीरने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
माता सीता ने हनुमान को दिया अनमोल उपहार
जब भगवान राम चौदह वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या लौटकर राजाभिषेक कर रहे थे, तब दरबार में सभी उपस्थित जनों को उपहार दिए जा रहे थे। इसी अवसर पर माता सीता ने हनुमान जी को एक बहुमूल्य माला भेंट की, जो रत्नों से जड़ी हुई थी। हनुमान जी ने खुशी-खुशी वह माला स्वीकार की, लेकिन थोड़ी दूरी पर जाकर उन्होंने उसे अपने दांतों से तोड़कर ध्यान से देखने लगे। इसके बाद, अपने मन में उदासी लिए उन्होंने सारे मोती एक-एक कर तोड़कर फेंक दिए, जिसे देख सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।
हनुमान पर लक्ष्मण को आया क्रोध
जब हनुमान जी मोती फेंक रहे थे, तब लक्ष्मण जी ने इसे भगवान राम का अपमान समझा और उन पर क्रोधित हो गए। उन्होंने प्रभु राम से कहा कि माता सीता ने हनुमान को बहुमूल्य रत्नों की माला दी थी, और उन्होंने उसे तोड़कर फेंक दिया। इस पर भगवान राम ने उत्तर दिया कि हनुमान के इस कृत्य का कारण केवल उसे ही पता है, इसलिए इसका उत्तर भी वही देगा।
राम नाम के बिना सब चीज़ें निरर्थक
इस पर हनुमान जी ने कहा कि उनके लिए हर वस्तु अर्थहीन है, जिसमें राम का नाम न हो। उन्होंने यह हार अनमोल समझकर लिया था, लेकिन जब देखा तो पाया कि उसमें राम का नाम नहीं है। आगे उन्होंने कहा कि उनके अनुसार, श्री राम के नाम के बिना कोई भी वस्तु अमूल्य नहीं हो सकती, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए।
पूरा सभा रह गया हैरान
यह सुनकर लक्ष्मण ने कहा कि आपके शरीर पर भी तो राम का नाम नहीं है, फिर इस शरीर को क्यों रखा है? इस शरीर को भी त्याग दो। लक्ष्मण की बात सुनकर हनुमान जी ने अपने नाखूनों से अपने छाती को चीरकर सबको दिखाया, जिसमें श्री राम और माता सीता की छवि दर्शाई दे रही थी। यह देखकर लक्ष्मण हैरान रह गए और अपनी गलती के लिए हनुमान जी से क्षमा मांगी।
हनुमान जी द्वारा अपने सीने को चीरकर भगवान श्री राम और माता सीता का दर्शन कराने की घटना केवल रामायण का एक चमत्कारी किस्सा नहीं है, बल्कि यह भक्ति, वफादारी और आत्मज्ञान का गहरा प्रतीक है। यह कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि शरीर तो नाशवान है, लेकिन आत्मा और उसमें स्थित परमात्मा का स्वरूप अमर है। इस महत्वपूर्ण प्रसंग के पीछे गहरा भावार्थ है
1. इस कथा की शुरुआत तब होती है जब माता सीता, हनुमान जी की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें एक अनमोल मोतियों की माला प्रदान करती हैं। हनुमान जी उस माला के हर मोती को तोड़कर उसे सूंघते और फेंकने लगते हैं। जब दरबार में उपस्थित लोगों ने इसका कारण पूछा, तो हनुमान जी ने सरलता से उत्तर दिया—"जिस वस्तु में मेरे प्रभु श्री राम का नाम नहीं है, वह मेरे लिए निरर्थक है।"
यह हमें बताता है कि दुनिया की सबसे कीमती चीज़ें (हीरे-मोती) भी आध्यात्मिक शांति और ईश्वर की भक्ति के सामने बेमतलब हैं। हनुमान जी के लिए 'मूल्य' का माप भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक था।
2. गहन भक्ति का प्रतीक जब किसी ने सभा में मज़ाक करते हुए पूछा, "क्या तुम्हारे अंदर भी राम मौजूद हैं? " तब हनुमान जी ने बिना किसी संकोच के अपने नाखूनों से अपने सीने को चीर दिया और वहाँ उपस्थित सभी ने उनके दिल के भीतर श्री राम और माता सीता का दर्शन किया।
यह कार्य 'गहन भक्ति' का संकेत है। इसका अर्थ यह है कि एक सच्चा भक्त अपने आराध्य से कभी अलग नहीं होता। भक्त का हृदय एक मंदिर में बदल जाता है, जहाँ परमात्मा हमेशा निवास करते हैं।
3. हनुमान जी द्वारा सीने को चीरने का कार्य प्रतीकात्मक रूप से अपने 'अहं' (अहंकार) को समाप्त करने का संदेश देता है। जब तक मनुष्य के भीतर 'मैं' (अहंकार) का बसना जारी है, तब तक वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता। हनुमान जी ने स्पष्ट किया कि उनके भीतर 'मैं' के लिए कोई स्थान नहीं है, वहां केवल 'राम' विद्यमान हैं। यह समर्पण की चरम सीमा है, जहाँ भक्त पूरी तरह से अपने अस्तित्व को ईश्वर में विलीन कर देता है।
4. आज के युग में हम ईश्वर को मंदिरों, तीर्थ स्थलों, और बाहरी अनुष्ठानों में खोजते हैं। हनुमान जी की यह कथा हमें आंतरिकता की ओर प्रेरित करती है। इसका संदेश यह है कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने हृदय (आत्मा) में निवास करता है। अगर हम भक्ति और पवित्रता के साथ अपने भीतर झांके, तो हमें परमात्मा का दर्शन वहीं मिलेगा।
5. हनुमान जी को 'महावीर' कहा जाता है, परंतु उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी 'दास्य भक्ति' (सेवक भावना) थी। सीने को चीरने की घटना यह दर्शाती है कि सेवा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आत्मा से होती है। इससे यह भाग निकलता है कि जो लोग निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं, वे स्वयं ही ईश्वर का रूप धारण कर लेते हैं।
हनुमान जी की यह छवि हमें बताती है कि भक्ति का रास्ता तर्क के बजाय अनुभव और विश्वास पर आधारित है। अपने सीने को फाड़कर प्रभु को प्रस्तुत करना यह संकेत देता है कि हमारे जीवन, विचार और क्रियाएं इतनी शुद्ध होनी चाहिए कि जब कोई हमारे अंदर झांकता है, तो उसे केवल सच्चाई और ईश्वर का प्रकाश दिखे।
यह कथा आज के समय में भी महत्वपूर्ण है, जो हमें यह सिखाती है कि बाहरी दिखावे को छोड़कर हमें अपने चरित्र और मन को प्रभु के लिए योग्य बनाना चाहिए।









