कुछ साल पहले तक अगर कोई कहता कि अब बॉयफ्रेंड भी किराए पर मिलेंगे, तो शायद लोग इसे मजाक समझते। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जिस तरह लोग कैब, ट्यूटर या फिटनेस ट्रेनर बुक करते हैं, उसी तरह अब कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ग्रुप्स पर कुछ घंटों के लिए ‘बॉयफ्रेंड’ या 'कंपैनियन' बुक करने का ट्रेंड तेजी से चर्चा में है। पहले यह चलन जापान तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब इसकी झलक भारत में भी देखने को मिल रही है। फेसबुक ग्रुप्स, इंस्टाग्राम पेज और कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लोग खुद को मूवी पार्टनर, शॉपिंग बडी, कॉफी कंपैनियन या इवेंट पार्टनर के तौर पर पेश कर रहे हैं। 

 

आखिर क्या होता है 'रेंट-ए-बॉयफ्रेंड'?

नाम सुनते ही कई लोगों के मन में गलत धारणा बन सकती है, लेकिन ज्यादातर प्लेटफॉर्म इसे डेटिंग या यौन सेवा के रूप में पेश नहीं करते। इसका मकसद किसी इंसान को कुछ समय के लिए साथ देना होता है। मान लीजिए किसी लड़की को अकेले फिल्म देखने में असहज महसूस होता है, किसी शादी में अकेले नहीं जाना चाहती, शॉपिंग के दौरान साथ चाहिए या अस्पताल जाने के लिए कोई साथी नहीं है, तो वह कुछ घंटों के लिए किसी कंपैनियन को बुक कर सकती है। इसके बदले तय शुल्क लिया जाता है। कई प्लेटफॉर्म सार्वजनिक जगहों पर मिलने और मर्यादा के साथ व्यवहार करने जैसी शर्तें भी रखते हैं। 

 

जापान से कैसे शुरू हुई यह कहानी?

रेंट-ए-बॉयफ्रेंड का कॉन्सेप्ट अचानक पैदा नहीं हुआ। इसकी शुरुआत जापान की ‘रेंटल पर्सन’ इंडस्ट्री से हुई थी। वहां लोग अलग-अलग सामाजिक भूमिकाओं के लिए लोगों को किराए पर लेते थे। किसी को शादी में साथ ले जाना हो, परिवार के सामने पार्टनर दिखाना हो या किसी मुश्किल समय में सिर्फ बात करने वाला इंसान चाहिए हो, तो ऐसी सेवाएं उपलब्ध थीं। धीरे-धीरे यही मॉडल ‘रेंटल गर्लफ्रेंड’ और ‘रेंटल बॉयफ्रेंड’ के रूप में लोकप्रिय हो गया। जापान में अकेले रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ना, लंबे वर्किंग आवर्स और सामाजिक दूरी जैसी वजहों ने इस सर्विस को बढ़ावा दिया। 

 

सोशल मीडिया ने ट्रेंड को और बढ़ा दिया

पहले यह सर्विस सिर्फ कुछ एजेंसियों तक सीमित थी, लेकिन यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक ने इसे पूरी दुनिया तक पहुंचा दिया। कई कंटेंट क्रिएटर्स ने "मैंने एक दिन के लिए बॉयफ्रेंड किराए पर लिया" जैसे वीडियो बनाए, जिन्हें लाखों लोगों ने देखा। इन वीडियोज में लोग साथ में खाना खाते, शॉपिंग करते, घूमते और बातचीत करते दिखाई दिए। इसके बाद यह ट्रेंड सिर्फ जापान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दूसरे देशों में भी इसकी चर्चा होने लगी। 

 

भारत में कैसे पहुंचा यह ट्रेंड?

भारत में अभी जापान जैसी बड़ी एजेंसियां नहीं हैं, लेकिन सोशल मीडिया ने इस ट्रेंड को यहां भी जगह दे दी है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक पर कई ऐसे ग्रुप मौजूद हैं, जहां लोग खुद को "रेंटेड बॉयफ्रेंड" के रूप में प्रमोट कर रहे हैं। पोस्ट में शहर का नाम, उपलब्ध समय और किस तरह की कंपनी देंगे, इसकी जानकारी भी दी जाती है। इसके अलावा कुछ वेबसाइट और प्लेटफॉर्म भी प्रोफेशनल सोशल सपोर्ट या कंपैनियनशिप सर्विस के नाम पर ऐसी सुविधाएं दे रहे हैं। 

 

कितनी होती है फीस?

कुछ प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग गतिविधियों के हिसाब से अलग चार्ज तय किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी के साथ घूमने के लिए लगभग 1500 रुपये प्रति घंटा, जबकि मूवी देखने, शॉपिंग या क्लबिंग जैसी गतिविधियों के लिए करीब 2000 रुपये प्रति घंटा तक फीस बताई गई है। मेडिकल सपोर्ट जैसी सेवाओं के लिए भी अलग रेट तय हैं। हालांकि अलग-अलग शहर और प्लेटफॉर्म के हिसाब से यह कीमत बदल सकती है। 

 

आखिर लोग ऐसी सर्विस क्यों ले रहे हैं?

इस सवाल का जवाब सिर्फ प्यार या रोमांस नहीं है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बहुत से लोग अकेले रहते हैं। नए शहर में नौकरी करने वाले, हाल ही में ब्रेकअप से गुजरे लोग, सामाजिक रूप से झिझक महसूस करने वाले या ऐसे लोग जिनके पास दोस्त या परिवार नहीं है, वे कुछ घंटों के लिए किसी साथी की तलाश करते हैं। कई बार किसी इवेंट में अकेले जाना लोगों को असहज लगता है। ऐसे में यह सर्विस उनके लिए एक अस्थायी साथी का काम करती है। कुछ लोग सिर्फ बातचीत करने या अपनी बातें साझा करने के लिए भी ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। 

 

क्या यह सिर्फ महिलाओं के लिए है?

नहीं। कई प्लेटफॉर्म पुरुषों और महिलाओं दोनों को कंपैनियन बनने और कंपैनियन बुक करने की सुविधा देते हैं। हालांकि सोशल मीडिया पर ‘रेंट-ए-बॉयफ्रेंड’ शब्द ज्यादा वायरल हुआ है, लेकिन कई जगह ‘रेंट-ए-फ्रेंड’ या ‘सोशल कंपैनियन’ जैसे नाम भी इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ वेबसाइट खुद को सिर्फ सोशल सपोर्ट सर्विस बताती हैं और डेटिंग सर्विस कहने से बचती हैं। 

 

क्या इसमें कोई जोखिम भी है?

जहां किसी भी ऑनलाइन सर्विस के फायदे हैं, वहीं कुछ खतरे भी हो सकते हैं। क्योंकि इसमें अनजान लोगों से मुलाकात होती है, इसलिए सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। अगर किसी प्लेटफॉर्म पर सही वेरिफिकेशन न हो, तो धोखाधड़ी या गलत इरादों वाले लोग भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए ऐसी किसी भी सर्विस का इस्तेमाल करने से पहले प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता, पहचान की पुष्टि और सुरक्षा नियमों को अच्छी तरह समझना जरूरी है। सार्वजनिक जगह पर मिलना और अपनी जानकारी सोच-समझकर साझा करना भी बेहद जरूरी माना जाता है। 

 

बदलते समाज की नई तस्वीर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रेंड सिर्फ एक बिजनेस मॉडल नहीं बल्कि बदलती सामाजिक जरूरतों का भी संकेत है। पहले लोग अपने परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों के साथ ज्यादा समय बिताते थे, लेकिन अब बड़े शहरों की तेज रफ्तार जिंदगी में अकेलापन बढ़ता जा रहा है। ऐसे में कुछ लोग अस्थायी साथ पाने के लिए पैसे खर्च करने को भी तैयार हो जाते हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भारत में यह ट्रेंड कितना बड़ा बनेगा, लेकिन सोशल मीडिया की वजह से इसकी चर्चा लगातार बढ़ रही है। 

 

हमारी राय

रेंट-ए-बॉयफ्रेंड जैसी सेवाएं आज के समय की बदलती सामाजिक जरूरतों और बढ़ते अकेलेपन को जरूर दिखाती हैं। अगर कोई प्लेटफॉर्म पूरी तरह कानूनी नियमों, पारदर्शिता और सुरक्षा के साथ सिर्फ कंपैनियनशिप की सेवा देता है, तो इसे हर किसी के लिए गलत कहना भी ठीक नहीं होगा। लेकिन दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि लोग भावनात्मक जरूरतों के नाम पर किसी तरह के शोषण, धोखाधड़ी या असुरक्षित स्थिति में न फंसें। किसी भी ऑनलाइन सर्विस का इस्तेमाल करने से पहले उसकी विश्वसनीयता जांचना, सुरक्षा को प्राथमिकता देना और अपनी निजी जानकारी साझा करने में सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। आखिरकार, कुछ घंटों का साथ खरीदा जा सकता है, लेकिन भरोसा, दोस्ती और सच्चे रिश्ते आज भी पैसे से नहीं खरीदे जा सकते।