मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच 

 

अस्थायी सीजफायर (युद्धविराम) की दिशा में सहमति बनती दिखाई दे रही है। इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बना है ईरान का 10-पॉइंट के प्रस्ताव, जिसे अमेरिका ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, लेकिन बातचीत के आधार के रूप में देखा जा रहा है।

 

डोनाल्ड ट्रंप ने इस सीजफायर को “महत्वपूर्ण कदम” बताया है, जबकि विशेषज्ञ इसे एक अस्थायी राहत मान रहे हैं, न कि स्थायी समाधान।

 

क्या है पूरा मामला?

 

पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष लगातार तेज हो रहा था। इस दौरान अमेरिका ने ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर उसने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को नहीं खोला, तो बड़े स्तर पर हमले किए जाएंगे।

 

इसी दबाव के बीच ईरान ने अमेरिका के प्रस्ताव को ठुकराते हुए अपना 10-पॉइंट प्लान पेश किया, जिसमें उसने युद्ध समाप्त करने की शर्तें रखीं।

 

ईरान का 10-पॉइंट का प्रस्ताव क्या है?

 

ईरान द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव में कई अहम मांगें शामिल हैं। इसमें सबसे प्रमुख मांगें हैं: 

 

  1. युद्ध का स्थायी अंत
  2. अमेरिका द्वारा सभी प्रतिबंधों को हटाना
  3. क्षेत्रीय संघर्षों को खत्म करना
  4. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोला जाएगा
  5. सुरक्षा और नियंत्रण को लेकर शर्तें तय की जाएंगी
  6. अमेरिका द्वारा फ्रीज किए गए फंड्स जारी हों 
  7. सैन्य हमला पूरी तरह रोकना होगा 
  8. भविष्य में हमले न करने की गारंटी
  9. युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा
  10. यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार बरकरार रहेगा

 

इन सभी शर्तों में सबसे विवादित मुद्दा परमाणु कार्यक्रम को लेकर है, जिसमें ईरान ने यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार बरकरार रखने की मांग की है।

 

क्या अमेरिका मान गया है प्रस्ताव?

 

अमेरिका ने ईरान के इस प्रस्ताव को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने इसे “वर्केबल बेसिस” यानी बातचीत की शुरुआत के लिए उपयुक्त बताया है।

 

अमेरिका ने फिलहाल 2 हफ्तों के लिए बड़े हमलों को रोकने का फैसला लिया है, ताकि बातचीत को आगे बढ़ाया जा सके।

 

इस दौरान दोनों पक्षों ने सीमित स्तर पर सैन्य गतिविधियों को रोकने पर सहमति जताई है, हालांकि पूरी तरह शांति अभी दूर नजर आती है।

 

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर खुलने की संभावना

 

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम मुद्दा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जो दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार के लिए जरूरी है।

 

सीजफायर की शर्तों के तहत इस जलमार्ग को आंशिक रूप से फिर से खोलने पर सहमति बनी है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई में सुधार की उम्मीद है। हालांकि, इस पर नियंत्रण और सुरक्षा को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए हैं।

 

तेल और बाजार पर प्रभाव

 

सीजफायर की खबर के बाद वैश्विक बाजारों में कुछ राहत देखने को मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, तेल की कीमतों में करीब 14% तक की गिरावट आई है, जो पहले तेजी से बढ़ रही थीं।

 

इसके साथ ही, शेयर बाजारों में भी सुधार के संकेत मिले हैं, क्योंकि निवेशकों को उम्मीद है कि तनाव कम होगा।

 

क्या यह स्थायी शांति की शुरुआत है?

 

हालांकि यह सीजफायर एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन विशेषज्ञ इसे बेहद नाजुक मान रहे हैं।

 

दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी भी गहरे मतभेद हैं, जैसे:

 

• परमाणु कार्यक्रम

• क्षेत्रीय प्रभाव

• सैन्य उपस्थिति

• प्रतिबंध हटाने का मुद्दा

 

इन सभी मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा।

 

पाकिस्तान और अन्य देशों की भूमिका

 

इस सीजफायर में पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देशों ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। खासतौर पर पाकिस्तान के जरिए ही ईरान का 10-पॉइंट प्रस्ताव अमेरिका तक पहुंचाया गया।

 

आगे की बातचीत भी इसी तरह के कूटनीतिक प्रयासों के जरिए आगे बढ़ने की उम्मीद है।

 

क्या फिर भड़क सकता है युद्ध?

 

फिलहाल तनाव कुछ कम हुआ है, लेकिन हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। अगर बातचीत असफल रहती है या कोई पक्ष शर्तों का उल्लंघन करता है, तो यह युद्ध फिर से भड़क सकता है।

 

डोनाल्ड ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका फिर से कड़े कदम उठा सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष में 10-पॉइंट प्रस्ताव और अस्थायी सीजफायर एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि यह पूरी तरह शांति का संकेत नहीं है, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि दोनों देश अब बातचीत के रास्ते पर आने को तैयार हैं।

 

अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह बातचीत स्थायी समाधान तक पहुंचेगी या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी विराम बनकर रह जाएगी।