Holika Dahan Ki Katha: हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा को पूरा देश रंगों में डूब जाता है। गली-मोहल्लों में ढोल की थाप गूंजती है, बच्चे-बड़े सब एक-दूसरे पर रंग और गुलाल डालते हैं और घरों में गुजिया और ठंडाई की खुशबू फैल जाती है। होली का यह जश्न सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, इसके पीछे एक ऐसी कहानी है जो हजारों साल पुरानी है और आज भी उतनी ही जरूरी है जितनी पहले थी। यह कहानी है भक्त प्रह्लाद, उनके पिता हिरण्यकशिपु और होलिका की, जो हमें सिखाती है कि सच और भक्ति के सामने कोई भी ताकत टिक नहीं सकती।
होली सिर्फ इसलिए नहीं मनाई जाती कि यह परंपरा है। इसके पीछे एक गहरा धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक मतलब छुपा है। जब हम होलिका दहन की आग के सामने खड़े होते हैं तो दरअसल हम उस सच को याद कर रहे होते हैं जो सदियों पहले साबित हुआ था, कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर हो, एक दिन जरूर जलती है।
Holika Dahan Ki Katha: प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कहानी
प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक राक्षस राजा था जो खुद को भगवान से भी बड़ा समझता था। उसने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से एक ऐसा वरदान मांगा था जिससे वह लगभग अमर हो गया था। उसे न दिन में मारा जा सकता था न रात में, न घर के अंदर न बाहर, न जमीन पर न आकाश में, न किसी इंसान से न किसी जानवर से और न किसी हथियार से। इस वरदान ने उसके अंदर इतना घमंड भर दिया कि उसने अपने पूरे राज्य में यह ऐलान करवा दिया कि अब से केवल उसकी पूजा होगी, भगवान विष्णु की नहीं।
लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकशिपु का अपना बेटा प्रह्लाद जन्म से ही विष्णु भक्त था। छोटी सी उम्र में भी वह दिन-रात भगवान का नाम जपता रहता था। यह देखकर हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया। उसने अपने ही बेटे को भगवान विष्णु की भक्ति छोड़ने के लिए मजबूर करने की हर कोशिश की। पहले समझाया, फिर धमकाया, फिर तरह-तरह की यातनाएं दीं। प्रह्लाद को पहाड़ से फेंका गया, जहरीले सांपों के बीच छोड़ा गया, हाथियों से कुचलवाने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने अपने भक्त की रक्षा की और प्रह्लाद बच निकला।
Holika Dahan Ki Katha: होलिका दहन की असली कहानी

जब हिरण्यकशिपु की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो उसने अपनी बहन होलिका की मदद लेने का फैसला किया। होलिका को भगवान से एक खास वरदान मिला हुआ था। उसके पास एक ऐसी चुनरी थी जिसे ओढ़कर वह आग में बैठ सकती थी और उसे कुछ नहीं होता था। हिरण्यकशिपु ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर धधकती आग में बैठ जाए ताकि प्रह्लाद जलकर राख हो जाए।
होलिका ने यही किया। वह प्रह्लाद को लेकर जलती चिता पर बैठ गई। लेकिन जो हुआ वह देखकर सब हैरान रह गए। जैसे ही आग भड़की, तेज हवा का एक झोंका आया और होलिका की वह चुनरी उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ गई। होलिका उस आग में जलकर भस्म हो गई जबकि प्रह्लाद बिल्कुल सुरक्षित बाहर आ गया। भगवान ने अपने भक्त की लाज एक बार फिर रख ली।
यही वह पल था जिसकी याद में आज भी होलिका दहन किया जाता है। हर साल होली से एक रात पहले होलिका दहन होता है जो इसी घटना का प्रतीक है।
होलिका दहन का असली मतलब क्या है?
बहुत से लोग होलिका दहन को बस एक रस्म समझते हैं जहां लकड़ियां और उपले जलाए जाते हैं। लेकिन इसका मतलब इससे कहीं ज्यादा गहरा है। होलिका दहन दरअसल हमें यह याद दिलाने का मौका है कि हमारे अंदर भी होलिका जैसी बहुत सी बुराइयां बसती हैं। घमंड, गुस्सा, जलन, नफरत, लालच और झूठ, ये सब वो होलिकाएं हैं जो हमें अंदर से खोखला करती रहती हैं।
जब हम होलिका दहन की आग के सामने खड़े होते हैं तो यह वक्त होता है उन सभी बुरी आदतों और नकारात्मक सोच को मन में ही जला देने का। जिस तरह होलिका आग में भस्म हुई उसी तरह हमारे अहंकार और बुराइयां भी इस आग में जल जाएं, यही असली होलिका दहन है। जो इंसान इस भावना के साथ होलिका दहन करता है वह सच में इस त्योहार का असली मतलब समझता है।
रंगों वाली होली का संदेश
होलिका दहन के अगले दिन जो रंगों वाली होली खेली जाती है उसका भी एक खास मतलब है। जिंदगी में हम सब कभी न कभी किसी से नाराज हो जाते हैं, किसी से मन में गिला हो जाता है या किसी रिश्ते में कड़वाहट आ जाती है। होली वह मौका है जब हम इन सारी पुरानी बातों को भूलकर एक-दूसरे पर रंग डालकर फिर से दोस्ती की शुरुआत कर सकते हैं।
गुलाल का वह रंग जो हम किसी के गालों पर लगाते हैं दरअसल यह कहता है कि तुमसे जो भी शिकायत थी वह आज से खत्म। यही वजह है कि होली को प्रेम और सौहार्द का त्योहार भी कहा जाता है। इस दिन अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, ऊंच-नीच सब एक ही रंग में रंग जाते हैं और यही बात इसे बाकी त्योहारों से अलग बनाती है।
होली हमें यह भी बताती है कि जिस तरह रंग मिलने पर एक-दूसरे से अलग नहीं रहते, उसी तरह इंसान को भी आपस में मिलजुलकर रहना चाहिए। प्रह्लाद की कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि सच्चाई और अच्छाई की राह पर चलने वाले इंसान को दुनिया की कोई भी ताकत नहीं रोक सकती और बुराई का अंत एक न एक दिन जरूर होता है।









