9 मई 2026 की तारीख पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गई है। कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में आयोजित एक भव्य समारोह में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार ने शपथ ली और सुवेंदु अधिकारी ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली। 

गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर यह समारोह आयोजित किया गया लेकिन इस पूरे समारोह की सबसे भावुक और चर्चा का विषय बनी तस्वीर वह थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच पर एक वयोवृद्ध व्यक्ति के पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया। वह व्यक्ति कोई मंत्री या बड़ा पदधारी नेता नहीं, बल्कि 98 वर्षीय माखनलाल सरकार थे। आखिर कौन हैं माखनलाल सरकार और क्यों प्रधानमंत्री ने एक कार्यकर्ता के सामने नस्तमस्तक होकर पूरी दुनिया को 'कार्यकर्ता सर्वोपरि' का संदेश दिया? आइए जानते हैं!

 

 

सादगी और संघर्ष की प्रतिमूर्ति माखनलाल सरकार

माखनलाल सरकार पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के रहने वाले एक साधारण लेकिन अत्यंत निष्ठावान भाजपा कार्यकर्ता हैं। 98 वर्ष की आयु में भी उनकी ऊर्जा और पार्टी के प्रति उनका समर्पण युवाओं को मात देता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन उस समय जनसंघ और बाद में भाजपा के विचार को बंगाल की मिट्टी में रोपने में लगा दिया, जब राज्य में इस विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं माना जाता था।

माखनलाल जी उन गिने-चुने जीवित कार्यकर्ताओं में से हैं, जिन्होंने बंगाल में राजनीतिक हिंसा, सामाजिक उपेक्षा और दमन के उस दौर को झेला है, जहां 'कमल' का झंडा उठाना जान जोखिम में डालने जैसा था। उन्होंने कभी हार नहीं मानी और उत्तर बंगाल के घर-घर जाकर संगठन को मजबूत किया।

 

शपथ ग्रहण समारोह का वो ऐतिहासिक और भावुक पल 

कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री मंच पर आसीन थे, तब माखनलाल सरकार को विशेष अतिथि के रूप में वहां आमंत्रित किया गया था।

जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से सभी का अभिवादन किया, तो कुर्सी ग्रहण करने से पहले उन्होंने 98 वर्षीय बुजुर्ग को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया, उन्हें गले लगाया और झुककर उनके पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद उन्होंने माखनलाल सरकार को बड़े ही प्रेम से पीएम को गले लगाया। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लाखों लोगों की आंखें चमक उठीं। यह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि देश के सर्वोच्च नेता का एक जमीन से जुड़े कार्यकर्ता के प्रति सम्मान व्यक्त करना था।

 

क्यों खास है पीएम मोदी का यह कदम?

प्रधानमंत्री मोदी का यह व्यवहार केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इसके पीछे गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक मायने हैं:

कार्यकर्ता का सम्मान: बीजेपी हमेशा से खुद को 'कैडर बेस्ड' पार्टी कहती है। पीएम मोदी ने एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के पैर छूकर यह सिद्ध किया कि पार्टी के लिए पद से बड़ा परिश्रम और वैचारिक निष्ठा होती है।

बंगाल के संघर्ष को नमन: बंगाल में बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए हजारों कार्यकर्ताओं ने अपना बलिदान दिया है। पीएम का यह कदम उन सभी अनाम बलिदानी और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को एक श्रद्धांजलि थी।

अंतिम पंक्ति का उदय: यह दृश्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'अंत्योदय' के विचार को भी चरितार्थ करता है, जहां संगठन में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को सबसे आगे लाकर सम्मानित किया गया।

 

सिलीगुड़ी की गलियों से सत्ता के शिखर तक का सफर

माखनलाल सरकार की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। सिलीगुड़ी में उन्होंने दशकों तक अपनी पुरानी साइकिल पर घूम-घूम कर पार्टी के पर्चे बांटे और दीवारों पर नारे लिखे। आर्थिक अभावों के बावजूद उन्होंने कभी किसी पद या टिकट की लालसा नहीं की। स्थानीय लोग बताते हैं कि चुनाव चाहे पंचायत के हों या लोकसभा के, माखनलाल जी की उपस्थिति और उनका मार्गदर्शन अनिवार्य होता था।

उनकी आंखों ने बंगाल में तीन दशकों का वामपंथी शासन और फिर तृणमूल कांग्रेस का दौर देखा, लेकिन उनका लक्ष्य हमेशा से बंगाल में 'आसोलो पोरिबोर्तन' (असली बदलाव) लाना था। आज जब बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो माखनलाल जी की आंखों में खुशी के आंसू उनकी वर्षों की तपस्या के सफल होने का प्रमाण थे।

 

बंगाल की राजनीति में एक बड़ा संदेश

प्रधानमंत्री मोदी के इस कदम ने बंगाल के लोगों के दिलों को भी छुआ है। बंगाल की संस्कृति में बड़ों का सम्मान और 'गुरु-शिष्य' परंपरा का बड़ा महत्व है। एक प्रधानमंत्री का सार्वजनिक मंच पर एक साधारण बंगाली वृद्ध के चरण स्पर्श करना, बंगाल के गौरव और उसकी अस्मिता के साथ जुड़ने का एक सशक्त माध्यम बन गया है। इसने उस विमर्श को भी ध्वस्त कर दिया कि भाजपा केवल सत्ता की राजनीति करती है; इसने दिखाया कि यह पार्टी अपने मूल और अपने बुजुर्गों को कभी नहीं भूलती।

9 मई 2026 का यह दिन केवल एक नई सरकार के गठन का दिन नहीं है, बल्कि यह उस विचारधारा की जीत है जिसे माखनलाल सरकार जैसे समर्पित लोगों ने अपने खून-पसीने से सींचा है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा एक 90 वर्षीय कार्यकर्ता को दिया गया यह सम्मान इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। यह घटना हमें सिखाती है कि राजनीति में धैर्य और निष्ठा का फल मीठा होता है। माखनलाल सरकार आज बंगाल के हर उस कार्यकर्ता के प्रतीक बन गए हैं, जिनकी निस्वार्थ सेवा ने आखिरकार 'सोनार बांग्ला' के सपने की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाया है। आज पूरा बंगाल और देश पूछ रहा है, 'कौन हैं माखनलाल सरकार?' और जवाब में मिलता है, ‘वह उस संघर्ष का चेहरा हैं, जो कभी थका नहीं, कभी झुका नहीं।’