बचपन का सबसे खूबसूरत हिस्सा दोस्तों के साथ खेलना-कूदना और मस्ती करना होता है। आज भी बच्चे स्कूल के बाद या छुट्टियों में अपने दोस्तों के घर खेलने जाना पसंद करते हैं। माता-पिता भी अक्सर सोचते हैं कि इससे बच्चों का सामाजिक विकास होता है और उनका सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ता है। लेकिन बदलते समय के साथ बच्चों की सुरक्षा को लेकर सतर्क रहना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
अक्सर माता-पिता यह मान लेते हैं कि अगर बच्चा किसी जान-पहचान वाले परिवार के घर जा रहा है तो वहां पूरी तरह सुरक्षित होगा। हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को सिर्फ घर से बाहर जाने की अनुमति देना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें कुछ जरूरी सुरक्षा नियम भी सिखाने चाहिए। ये बातें बच्चे को किसी भी असहज या जोखिम भरी स्थिति से बचाने में मदद कर सकती हैं।
बच्चे को बताएं कि हर बड़े की बात मानना जरूरी नहीं
अक्सर बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है कि बड़ों की बात माननी चाहिए। यह बात सही है, लेकिन हर परिस्थिति में नहीं। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि अगर कोई बड़ा व्यक्ति ऐसी बात कहे या ऐसा काम करने को कहे जिससे उन्हें असहज महसूस हो, तो उसे मना करना बिल्कुल गलत नहीं है।
कई बार बच्चे सिर्फ इसलिए कुछ नहीं बोलते क्योंकि उन्हें लगता है कि बड़े लोगों की बात टालना गलत है। माता-पिता को बच्चों को यह भरोसा देना चाहिए कि अगर कभी उन्हें कोई बात ठीक न लगे तो वे साफ मना कर सकते हैं और तुरंत अपने माता-पिता को बता सकते हैं।
बिना बताए कहीं और न जाएं
जब बच्चा किसी दोस्त के घर खेलने जाए तो उसे पहले से यह नियम समझा देना चाहिए कि वह बिना जानकारी दिए किसी दूसरी जगह नहीं जाएगा। कई बार बच्चे खेलते-खेलते पड़ोस के घर, पार्क या किसी दूसरी जगह चले जाते हैं और माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं होती।
ऐसी स्थिति में परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए बच्चे को साफ शब्दों में समझाएं कि अगर उसे कहीं और जाना है तो पहले दोस्त के माता-पिता और अपने घरवालों को इसकी जानकारी देनी होगी। इससे किसी भी आपात स्थिति में बच्चे का पता लगाना आसान रहेगा।
अपनी निजी सीमाओं के बारे में जरूर बताएं
बच्चों को कम उम्र से ही ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में जानकारी देना बहुत जरूरी माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को यह समझना चाहिए कि उनके शरीर पर उनका अधिकार है और कोई भी व्यक्ति उनकी इच्छा के खिलाफ उन्हें छू नहीं सकता।
अगर कोई व्यक्ति ऐसा व्यवहार करता है जिससे बच्चा असहज महसूस करे, तो उसे तुरंत वहां से हट जाना चाहिए और किसी भरोसेमंद बड़े व्यक्ति को इसकी जानकारी देनी चाहिए। बच्चों को यह भी बताना जरूरी है कि ऐसी बात छिपाने की जरूरत नहीं होती और वे बिना डरे अपने माता-पिता से सब कुछ साझा कर सकते हैं।
इमरजेंसी में किसे फोन करना है, यह याद होना चाहिए
आजकल अधिकांश बच्चों के पास मोबाइल नहीं होता या वे हमेशा फोन अपने साथ नहीं रखते। ऐसे में बच्चे को कम से कम अपने माता-पिता का मोबाइल नंबर याद होना चाहिए।
इसके अलावा उसे यह भी पता होना चाहिए कि किसी समस्या की स्थिति में किसे कॉल करना है। कई विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों को घर का पता, माता-पिता का नाम और जरूरी संपर्क नंबर याद करवाने चाहिए। इससे किसी भी अप्रत्याशित स्थिति में मदद मिल सकती है।
कोई बात गलत लगे तो तुरंत बताएं
बच्चों की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण नियम है खुला संवाद। बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि वह किसी भी बात के लिए अपने माता-पिता से खुलकर बात कर सकता है।
कई बार बच्चे किसी घटना के बारे में इसलिए नहीं बताते क्योंकि उन्हें डर होता है कि उन्हें डांट पड़ेगी या उनकी बात पर विश्वास नहीं किया जाएगा। माता-पिता को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जहां बच्चा बिना झिझक अपनी हर बात साझा कर सके। अगर बच्चा दोस्त के घर से लौटकर किसी व्यक्ति, घटना या व्यवहार को लेकर असहज महसूस होने की बात कहता है तो उसे गंभीरता से सुनना चाहिए।
सिर्फ बच्चों को नहीं, माता-पिता को भी रहना होगा सतर्क
सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ बच्चे की नहीं होती। माता-पिता को भी कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। जिस घर में बच्चा खेलने जा रहा है, वहां के परिवार को जानना जरूरी है। यह पता होना चाहिए कि घर में कौन-कौन लोग मौजूद रहेंगे और बच्चों की निगरानी कौन करेगा।
अगर बच्चा पहली बार किसी दोस्त के घर जा रहा है तो बेहतर होगा कि माता-पिता पहले उस परिवार से मिल लें। इससे भरोसा बढ़ता है और बच्चे की सुरक्षा को लेकर चिंता भी कम होती है।
जरूरत से ज्यादा डराना भी सही नहीं
कई माता-पिता सुरक्षा के नाम पर बच्चों को इतना डरा देते हैं कि वे लोगों से मिलने-जुलने या बाहर जाने से ही घबराने लगते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को डराने के बजाय जागरूक बनाना ज्यादा जरूरी है। उन्हें आसान भाषा में सुरक्षा नियम समझाएं और बताएं कि ये नियम उनकी सुरक्षा के लिए हैं। जब बच्चे नियमों के पीछे की वजह समझते हैं तो वे उन्हें बेहतर तरीके से अपनाते हैं।
डिजिटल दौर में नई चुनौतियां भी मौजूद
आजकल बच्चे सिर्फ घर में खेलते ही नहीं, बल्कि मोबाइल, टैबलेट और इंटरनेट का भी इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में माता-पिता को यह भी समझाना चाहिए कि वे किसी अनजान व्यक्ति से ऑनलाइन बातचीत न करें और अपनी निजी जानकारी किसी के साथ साझा न करें। कई बार दोस्त के घर पर भी बच्चे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए डिजिटल सुरक्षा के नियम भी उतने ही जरूरी हैं जितने वास्तविक दुनिया की सुरक्षा के नियम।
भरोसा और जागरूकता सबसे बड़ा सुरक्षा कवच
विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को हर समय अपने साथ रखना संभव नहीं है। लेकिन उन्हें सही जानकारी और आत्मविश्वास देकर कई संभावित खतरों से बचाया जा सकता है।
जब बच्चा यह जानता है कि उसे क्या करना है, किससे मदद लेनी है और किस स्थिति में मना करना है, तो वह खुद को बेहतर तरीके से सुरक्षित रख सकता है। यही कारण है कि आज बच्चों को सुरक्षा के बारे में सिखाना उतना ही जरूरी माना जाता है जितना पढ़ाई-लिखाई सिखाना।
हमारी राय
बच्चों को दोस्तों के घर खेलने भेजना गलत नहीं है। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, दोस्ती मजबूत होती है और सामाजिक विकास भी होता है। लेकिन इसके साथ सुरक्षा के बुनियादी नियम सिखाना बेहद जरूरी है। हमारी राय में माता-पिता को बच्चों को डराने के बजाय जागरूक बनाना चाहिए। अगर बच्चा अपनी सीमाओं को समझता है, गलत और सही में फर्क कर सकता है और माता-पिता से खुलकर बात करने में सहज महसूस करता है, तो उसकी सुरक्षा काफी हद तक सुनिश्चित की जा सकती है। छोटी-छोटी सावधानियां ही बच्चों को बड़े खतरों से बचाने का सबसे प्रभावी तरीका हैं।









